प्रस्तुत 'वैदिकधात्वर्थविचार' नामक ग्रन्थ में वैदिककोश निघण्टु में पठित सभी आख्यातों को आधार बनाकर ऋग्वेद के मन्त्रों के माध्यम से उनका अर्थदर्शन किया गया है। ग्रन्थ के प्रथम अध्याय में निघण्टु, निरुक्त तथा आख्यात सम्बन्धी विशेष चर्चाएँ हैं और द्वितीय अध्याय से अष्टम अध्याय तक वैदिक कोष निघण्टु में पठित ३१५ आख्यातों का ऋग्वेद में प्रयोग देखा गया है। जिनका क्रम यह है कि प्रथम आख्यात दर्शाया गया है, पुनः लौकिक धातुपाठ में उसे किस अर्थ में स्वीकार किया गया है, वह धातु तथा उसके अर्थ गृहीत किये गये हैं, इसके लिये मुख्यतः पाणिनीय धातुपाठ का आश्रय लिया है। कतिपय धातुएँ ऐसी भी हैं, जो पाणिनीय धातुपाठ में न होकर काशकृत्स्त्रधातुव्याख्यानम् अथवा अन्य धातुग्रन्थों में ही पठित हैं, वहाँ से वे दिखायी गयी हैं। लोक में वह धातु परस्मैपदी, आत्मनेपदी अथवा उभयपदी है-इस हेतु रूप दिये गये हैं। पुनः निघण्टु के उस आख्यात की ऋग्वेद में क्या स्थिति है, वे रूप हमने दिये हैं। उनमें से दो तीन, चार अथवा पाँच रूपों से सम्बन्धित मन्त्र देकर भाष्यकारों के द्वारा किये गये अर्थ से आख्यातार्थ को देखा है। कतिपय मन्त्रों का भाष्यकारों ने व्याकरणानुसार अर्थ कर दिया है, वहाँ हमें निरुक्त परम्परा का आश्रय लेकर अर्थ करना पड़ा है, जो वेदार्थ में उपयुक्त है।
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