वैशाली की धरती का सच पुस्तक लिखने का मेरा उद्देश्य वैशाली की धरती से सम्बन्धित प्राचीनकाल की उन महत्त्वपूर्ण घटनाओं को उजागर कर जनसामान्य के लिए सुलभ करने का है, जिसके कारण वहाँ वर्णाश्रमधर्म पर आधारित राजतंत्र में भी समतामूलक शासन-व्यवस्था कायम हुई और वही राजतंत्रीय समतामूलक शासन-व्यवस्था कालान्तर में प्रजातंत्र की उत्पत्ति का कारण बन गई। मनुष्यता और मानव-कल्याण पर आधारित वैशाली के मूल निवासियों की यह परिष्कृत सामाजिक और राजनैतिक संरचना 'गणतंत्र' हमारी अमूल्य निधि थी, जिसे विदेशी हमलावरों ने तहस-नहस कर डाला और वर्ग-संघर्ष के लिए कई नई-नई सामाजिक संरचनाओं को जन्म दे गये, जिसका सामना आज हमें करना पड़ रहा है।
लगभग पचास वर्षों से मैं 'वैशाली महोत्सव' के मंच से विद्वानों द्वारा सुनते आ रहा हूँ कि वैशाली गणतंत्र/प्रजातंत्र की जननी है। मैं कभी-कभी सोचा करता था कि गणतंत्र/प्रजातंत्र की धारणा तो राजतंत्र के बिल्कुल विपरीत है। किसी राजा ने प्रजा को अपनी राजशक्ति में हिस्सा क्यों दिया होगा? फिर वैदिक युग में वर्णाश्रमधर्म पर आधारित वैशाली का राजतंत्र जनहित पर आधारित प्रजातंत्र में क्यों और कैसे बदल गया? क्या आपने भी कभी सोचा है कि वैशाली में ही प्राचीन गणतंत्र की उत्पत्ति का क्या कारण था? यह धारणा सर्वप्रथम किसके दिमाग की उपज थी? वैशाली का वह कौन महान् सपूत था, जिसने राजा से विद्रोह कर उनके वंश और रक्त की ईश्वरीय श्रेष्ठता को नकार दिया और नागरिक स्वतंत्रता के अधिकारों का समर्थन किया? किसके विचारों के कारण वैशाली की राजशक्ति (राजतंत्र) कालान्तर में जनशक्ति (गणतंत्र) में बदल गई? इसका उत्तर मैं वर्षों से ढूढ़ता आ रहा था। वैशाली के राजवंशों के उत्थान-पतन के अध्ययन के क्रम में मुझे वैशाली में गणतंत्र की उत्पत्ति के कारण की एक नई ज्योति दिखाई दी, जिसका वर्णन मैंने इस पुस्तक में किया है। वैशाली के गणतंत्र का जनक कौन था, इसे खोजने का मेरा यह एक छोटा-सा प्रयास है। इस खोज में विद्वानों को अवश्य आगे आना चाहिए।
यह हमारा दुर्भाग्य रहा है कि हिन्दुओं ने अपना इतिहास लिखना आवश्यक नहीं समझा, जिसके कारण घटित घटनाओं के कालखण्ड के बारे में सही जानकारियाँ हमारे पास उपलब्ध नहीं है। ईसापूर्व कब श्रीराम हुए थे, इसकी सही जानकारी हमारे पास नहीं है। वैशाली के प्रथम वैश्य-शासक भलान्दन श्रीराम के युग से 32 पीढ़ी पूर्व हुए थे। अगर एक पीढ़ी की औसत शासन की अवधि 30 वर्ष मानी जाय तो 32 पीढ़ियों की काल-अवधि 960 वर्ष होती है। ऐसा अनुमान किया जाता है कि राजा भलान्दन श्रीराम के काल से लगभग 800-1000 वर्ष पूर्व हुए थे। वैशाली की धरती का सच यही है कि वैदिककाल से लेकर गुप्तकाल तक कुछ अवधियों को छोड़कर लगभग अढ़ाई हजार वर्षों तक किसी-न-किसी रूप में वैशाली पर निम्न समझे जाने वाले वर्णों का ही अधिकार रहा। यह भी सच है कि वैशाली प्रारम्भिक काल से ही धार्मिक कट्टरता और जातिवादी की सोच से दूर रही और ब्राह्मणवादी, बौद्ध और जैन परम्पराएँ साथ-साथ चलती रहीं। वैशाली का गणतंत्र बुद्ध और महावीर के काल से पूर्व से चला आ रहा था।
आधुनिक युग में सन् 1776 ई. में वंश एवं रक्त की ईश्वरीय श्रेष्ठता को नकारकर सभी नागरिकों की स्वतंत्रता एवं समानता के अधिकारों का समर्थन करनेवाला अमेरिका विश्व का पहला देश बना। उस समय भारत के दिल्ली में मुगलों का वंशवादी राज तंत्रात्मक शासन था। भारत के अन्य भागों पर भी हिन्दू एवं मुस्लिम राजवारों के वंशवादी शासन थे लगभग उसी समय 'दी रायल एशियाटिक सोसाईटी ऑफ बंगाल' के ब्रिटिश बुद्धिजीवियों को यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ कि नागरिक स्वतंत्रता की जो बात आज अमेरिका में की जा रही है, वैसी सोच की शासन-व्यवस्था प्राचीन काल में भारत के किसी वैशाली नामक स्थान पर थी। इसी के कारण यूरोपवासियों ने वैशाली की खोज में वर्षों पसीनें बहाएँ।
आपने इस धारती का नाम 'बनिया बसाढ़' के रूप में अवश्य सुना होगा। वाणिज्यग्राम और वैशाली का नाम बनिया बसाढ़ किसने और कब किया। बनिया का नाम बसाढ़ के पहले क्यों आता है शहरों के मूल नाम बदलकर हाजीपुर एवं मुजफ्फरपुर किसने किये। मगध एवं पाटलिपुत्र के नामों को किसने गौन कर दिये? हमारे प्रदेश का नाम बिहार कैसे पड़ा? गंगा के उत्तर मिथिला, वैशाली और तिरहुत की धरती के प्राचीन नामों को गौन कर उन स्थानों को भी 'बिहार' के रूप में परिवर्तित किसने, क्यों और कब किये? वैशाली की धरती पर ऋग्वेद की कुछ ऋचाओं की रचना वाले महान् ज्ञानी कौन थे? इन सभी प्रश्नों के उत्तर आपको इस पुस्तक में मिलेंगे।
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