डॉ० वेदप्रकाश उपाध्याय, एम० ए० (संस्कृत-वेद) (इलाहाबाद), एम० ए० (हिन्दी) (अमृतसर), एल-एल० बी०, डी० फिल्० (इलाहाबाद), डी० लिट्० (हिन्दू विधि) (इलाहाबाद), डिप्० इन जर्मन, वेदाचार्य (पजाब), दर्शनाचार्य, धर्मशास्त्राचार्य (वाराणसी), प्राप्तस्वर्णपदक (पंजाब), प्राप्तस्वर्ण-पदक (वाराणसी), रीडर-संस्कृत विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ द्वारा लिखित "वैदिक साहित्यः एक विवेचन" नामक ग्रन्थ में वैदिक साहित्य का माहात्म्य, वेदों के भाष्यकार, वेदों पर विदेशी भाषाओं में क्रिया गया कार्य, वेदों की व्याख्यान पद्धतियां, वेदों का काल, ऋग्वेद का वयं विषय, यजर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का वर्ण्य विषय और शाखाएं, ब्राह्मण ग्रन्थों, आरण्यकों, उपनिषदों, वेदाङ्गों और अनुक्रमणी ग्रन्थों का साङ गोपाङग विवेचन किया गया है। वैदिक साहित्य पर आज तक किए गये महत्त्वपूर्ण शोधकायों का भी ऐतिहासिक दृष्टि से उल्लेख इस ग्रन्थ में प्राप्त होता है।
डॉ० उपाध्याय द्वारा प्रणीत हिन्दू विधि एवं स्रोत नामक ग्रंथ, जो इण्टर-नेशनल लॉ एजेन्सी 91, लूकरगंज, इलाहाबाद से प्रकाशित है, प्रकाशन वर्ष में ही इलाहाबाद उच्चन्यायालय के द्वारा (अ) वर्ग के अन्तर्गत उत्तर-प्रदेश के समस्त अधीनस्थ न्यायालयों के लिये आवश्यक ग्रन्थ के रूप में स्वीकृत किये जाने तथा पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के द्वारा भी एक महत्त्वपूर्ण कृति के रूप में अनुमोदित होने के कारण अपनी प्राधिकारिकता को स्वतः स्पष्ट करता है। 1986 के सितम्बर मास में आल इण्डिया रिपोर्टर में तथा अगस्त 1986 में इलाहाबाद लॉ जर्नल में अधिवक्ताओं, विधि के प्राध्यापकों एवं छात्रों तथा सामान्य जनता के लिए भी अत्युपयोगी निर्धारित किए जाते हुए प्राधिकारिक कृति घोषित किया गया है।
उपाध्यायकृत संस्कृत व्याख्या और हिन्दी अनुवाद के सहित "ऋग्वेदीय सूक्त संग्रह" पंजाब विश्वविद्यालय चण्डीगढ़, गुरुनानक देव वि० वि० अमृतसर नादि भारतीय विश्वविद्यालयों में एम० ए० संस्कृत के पाठ्यक्रम में भी निर्धारित है।
मार्च 1986 को मानव संसाधन विकास मन्त्रालय, भारत सरकार की ओर से वेद कर्मकाण्ड प्रशिक्षण शिविर में ब्राह्मण संस्कृत महाविद्यालय, राम-राय, जीन्द में विशिष्ट विद्वान् के रूप में इन्हें सम्मानित किया गया।
अब तक डॉ० उपाध्याय के योग्य निर्देशन में वेद, दर्शन, धर्मशास्त्र विषय पर लगभग 28 छात्र पी-एच० डी० एवं एम्० फिल० की शोध उपाधि प्राप्त कर चुके हैं ।
सम्प्रति डॉ० उपाध्याय पंजाब विश्वविद्यालय की एम्० ए० कक्षाओं में वेद और दर्शन तथा एम्० फिल० कक्षाओं को दर्शनशास्त्र, राजशास्त्र और विधिशास्त्र पढ़ा रहे हैं।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त डी० फिल्० उपाधि का वेद विषयक शोधप्रबन्ध तथा डी० लिट् का हिन्दू विधि से सम्बन्धित शोधप्रबन्ध समस्त परीक्षकों के द्वारा विशेष रूप से प्रशंसित रहे हैं।
प्रामाणिक विद्वान् डॉ० उपाध्याय का प्रस्तुत ग्रंथ शोधार्थियों, जिज्ञासुओं एवं वेद, संस्कृत के प्रबुद्ध छात्रों के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगा। मैं इनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूं।
भारतीय संस्कृति के मूलस्रोत के रूप में वेदों का स्थान सर्वप्रथम है। धर्म, दर्शन, साहित्य, विज्ञान, कला, ज्यौतिष और आयुर्वेद आदि के बीज वैदिक साहित्य में स्थान 2 पर दृष्टिगोचर होते हैं। भारत एवं भारत से बाहर के देशों में वैदिक साहित्य पर अनेक शोधपूर्ण ग्रन्थ लिखे जा चुके हैं। विशेष रूप से जर्मनी, फांस और इंग्लैंड के लेखकों ने वैदिक साहित्य पर अत्यधिक महत्वपूर्ण कार्य किया है। भारतीय कुछ राजाओं की वेदों के प्रति उदासीनता का इससे अधिक प्रमाण और क्या होगा कि काश्मीर नरेश ने अथर्ववेदीय पैप्पलाद संहिता की शारदालिपि में लिखित पुस्तक जर्मन विद्वान् डॉ० राथ को भेंट में दे दी थी, जिसका प्रकाशन 1901 ई० में किया गया था। विदेशी सरकारों द्वारा समय 2 पर वैदिक विद्वान् भारत में लाखों रुपये की सहायता देकर भेजे जाते हैं, जो यहाँ से तालपत्रों आदि पर लिखित वैदिक साहित्य से सम्बन्धित हस्तलेखों की फोटोप्रतियां ले जाते हैं। जर्मन विद्वान् डॉ० मिशायल वित्सेल पंजाब विश्वविद्यालय होशियारपुर के हस्तलेख संग्रहालय से कुछ हस्तलेखों की फोटोप्रतियां करके ले गए थे, जिसका प्रयोजन उन ग्रन्थों पर शोध करना या कराना था। इसी प्रकार फ्रांस के पेरिस विश्व विद्यालय के दिवंगत वैदिक विद्वान् प्रो० पी० रोली (P. Rolland) ने भी पंजाव विश्वविद्यालय की होशियारपुरस्थ हस्तलिपियों का उपयोग किया था, किश्तु वैदिक साहित्य पर उनका कार्य फञ्चभाषा में था, अंग्रेजी में नहीं । उनका कथन था कि ग्रश्थलेखन के लिए मातृभाषा सर्वाधिक उपयुक्त है, किन्तु भारतीय अभी भी दानता के चिहून स्वरूप अंग्रेजी भाषा में जकड़े हैं। डॉ० रोलाँ का मेरे साथ वार्तालाप संस्कृत में ही होता था। वैदिक साहित्य पर जितना अधिक कार्य जर्मन, अंग्रेजी या फ्रेंच भाषा में किया गया है, उतना भारतीय भाषाओं में नहीं। वैदिक भाषा के क्लिष्ट होने के कारण संस्कृत के अधिकांश विद्वान् भी वेदों के अध्ययन से दूर भागते हैं और वेदों का ज्ञान न रहने पर भी वेदों की दुहाई देते हैं। वैदिक साहित्य इतना अधिक विशाल है कि उसकी तुलना किसी अन्य माषा के साहित्य से नहीं की जा सकती
वैदिक साहित्य के ग्रन्थों का बास्तविक ज्ञान स्नातकोत्तर छात्रों एवं वेद पर अनुसन्धान करने वाले विद्वानों तक पहुंचे, इस अभिप्राय से इस ग्रन्थ की रचना की गई। वैदिक शाखाओं में से अधिकांश शाखाएं लुप्त हो गई, अतः प्राप्त एवं लुप्त शाखाओं के विषय में भी पर्याप्त सामग्री इस ग्रन्थ में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। सभी विश्वविद्यालयों में एम्० ए० संस्कृत के छात्रों एवम् आचार्य परीक्षाओं में उपयोग की दृष्टि से कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक सामग्री इस ग्रन्थ में सम्मिलित की गई है।
अपने गुरुवर्य्य स्व० प्रो० सरस्वती प्रसाद चतुर्वेदी और प्रो० डॉ० आद्या प्रसाद जी मिश्र का मैं आजीवन आभारी हूं, जिनके आशीर्वाद से मुझे संस्कृत के विविध क्षेत्रों में सफलता प्राप्त हुई है।
गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार के वेदविभागाध्यक्ष एवं उपकुलपति प्रो० राम प्रसाद वेदालंकार तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत के प्रोफेसर डॉ० वाचस्पति उपाध्याय और प्रो० डॉ० गयाचरण त्रिपाठी के प्रति धन्यवाद अर्पित करना मेरा कर्तव्य है, जिन्होंने इस ग्रन्थ पर कुछ शब्द लिखकर इसे गौरवान्वित किया है।
गवर्नमेंट कालेज, मलेरकोटला (पंजाब) के संस्कृत विभागाध्यक्ष एवं राष्ट्रपति से सम्मानप्राप्त प्रो० डी० डी० भट्टि को भी हार्दिक धन्यवाद देता हूं, जिन्होंने इस ग्रन्थ के हस्तलेख से प्रभावित होकर अपनी सम्मति इस ग्रन्थ के महत्त्व को बढ़ाने के लिए प्रकाशन से पूर्व ही भेज दी। पंजाब सरकार एवं राष्ट्रपति से सम्मानित प्रो० मट्टि ने अथर्ववेद विषयक प्रशंसनीय ग्रन्थ भी आंग्लभाषा में लिखा है।
स्वामी श्री 1008 श्री रामानन्द सरस्वती परमहंस, अनुसूया आश्रम, चित्रकूट का शुभाशीर्वाद तो सदा मेरे ऊपर ही है, जिसके फलस्वरूप आज यह ग्रन्थ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है।
अपने पूज्य पिता श्री राम सजीवन उपाध्याय उर्फ पं० राजाराम जी के प्रति आभारी होना तो मेरा प्रथम कर्तव्य है, जिनके पुण्यों के प्रताप से मेरी अभिरुचि संस्कृत में हुई ।
इस ग्रन्थ के प्रकाशन के लिए प्रेस आदि से सम्बन्धित कार्यों में मेरे प्रिय शिष्यों डॉ० तुलसीराम, आचार्य पिनाकपाणि शर्मा, बलजीत कौर और प्रत्रीण ने बड़ा ही उत्साह दिखाया, एतदर्थ वे मेरे स्मृति पटल पर ही हैं।
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