प्राक्कथन
गुरु द्रोणाचार्य की विद्या जिस शिष्य में पूर्ण रूप से सफल हो पाई, विद्या की समाप्ति पर जनता के सामने युद्ध-विद्या का प्रदर्शन करके जिसने 'अद्वितीय वीर' की विश्वख्याति प्राप्त की; देश-देशान्तरों से आए हुए वीर महारथी जिस स्वयम्बर की शर्त को पूरा न कर सके उसे अनायास ही पूरा करके जिसने सभी को स्तम्भित कर दिया; जिस अकेले वीर ने विराट नगर पर चढ़ाई करने वाले गोधन के लोभी कुरुकुल के विश्वविश्रत, महारथियों को पराजित करके न केवल गो-धन छुड़ा लिया प्रत्युत उनके वस्त्रापहरण भी कर लिए, उस रणबांकुरे 'वीर अर्जुन' का यह जीवन बालकों के सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ। "किस शेर की आमद है कि रण कांप रहा है।" "वह देखो, किरीटधारी, केशव-सारथि अर्जुन का सफेद घोड़ों वाला रथ मेघ के गर्जन के समान घोष करता आकाश में विमान की तरह बे-रोक-टोक रणभूमि में घुस रहा है। रथ के वेग से रणभूमि कांप रही है और उड़ती हुई धूलि आससान को ढाँप रही है। गाण्डीव धनुष की टंकार से कान बहरे हो रहे हैं; शंख का शब्द हृदयों को विदीर्ण कर रहा है; ध्वजा का कपि वायुवेग से अत्यधिक चंचल होकर शत्रुओं को भय त्रस्त कर रहा है। "जिस मार्ग से रथ आ रहा है, कौरव सेना भेड़ों की तरह भाग रही है। जो आन वाले नहीं भागते उनके कटे सिर भूमि पर लुढ़क रहे हैं; शस्त्रों सहित कटी हुई पीन भुजाओं से रण भूमि भर रही है। मृगेन्द्र के समान सीना ताने, प्रतिद्वंद्वी को देखकर हुंकार करते सांड की तरह, रोष से फण हिलाते फूत्कार करते और बार बार जिह्वा निकालते पन्नगराज की भांति अर्जुन का आक्रमण किस को भयभीत नहीं कर देता ।" बालक ही बड़े होकर भावी युग के निर्माता बनते हैं। यदि उनके हृदयों में वीरता का भाव उत्पन्न हो जाए, तो वे भारत की अखण्डता और स्वतन्त्रता की रक्षा करने के लिए समर्थ वीर पुरुष बन सकते हैं। प्रस्तुत पुस्तक यदि बालकों के हृदयों में 'वीर-भाव' पैदा करने में समर्थ हो सके, तो लेखक का प्रयास सफल होगा ।
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