मैंने सन् १९६४ ई. में एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। इस परीक्षा में मेरा विशिष्ट पत्र (स्पेशल पेपर) विद्यापति था । पढ़ने के समय से ही मेरा मन था कि मैं विद्यापति पर शोधकार्य करूँ । एम.ए. पास करने के बाद मुझे सन् १९६४ ई० में ही ‘“ मिथिलेश रमेश्वर सिंह ट्रस्ट मैथिली चेयर फण्ड" पटना विश्वविद्यालय, पटना से रिसर्च स्कॉलरशिप और सन् १९६६ ई० में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली से "जूनियर रिसर्च फेलोशिप" मिल गया। मैंने उक्त दोनों स्कॉलरशिप की अवधि समाप्ति के पूर्व ही, मई १९६८ ई० में "विद्यापतिकालीन मिथिला" विषय पर पी.एच०डी० की शोध-उपाधि प्राप्त की। संयोग से मैं उसी वर्ष पटना कॉलेज में प्राध्यापक भी हो गया।
इस अवधि में मुझे विद्यापति-साहित्य से लगाव बढ़ता गया और मैं विद्यापति-साहित्य के गहन अध्ययन में लीन होता गया। मुझे अनुभव हुआ कि विद्यापति के अप्रकाशित तथा अप्राप्य स्फुट ग्रन्थों का प्रकाशन भी आवश्यक है। अतः मैंने सन् १९६९ ई० में "लिखनावली" का सम्पादन कर प्रकाशित किया। इसके अलावा, दो और ग्रन्थों को भी प्रकाशित कराया ।
इस क्रम से मुझे विद्यापति-साहित्य को पढ़कर बहुत प्रेरणा मिली और मुझे अनुभव होने लगा कि अभी तक विद्यापति के ग्रन्थों का समुचित मूल्यांकन नहीं हुआ है।
मुझे कभी-कभी मिथिला और मिथिला के बाहर के विद्वानों का विद्यापति विषयक आलोचनात्मक ग्रन्थ एवं शोध प्रबन्ध भी देखने को मिले, लेकिन जिस तरह से विद्यापति के सम्पूर्ण साहित्य की विस्तृत विवेचना होनी चाहिए, उनमें उसका आभास तक भी नहीं मिला। इस सन्दर्भ में यह कहना अत्युक्ति नहीं है कि उक्त सभी ग्रन्थों में मात्र "विद्यापति पदावली" की ही व्याख्याएँ और आलोचनाएँ देखने को उपलब्ध हुई। इस क्रम में मुझे यह भी अनुभव हुआ कि विद्यापति के संस्कृत और अवहट्ठ ग्रन्थों का सर्वेक्षण आवश्यक है।
पदावली के अध्ययन-मात्र से ही विद्यापति के प्रामाणिक जीवन-वृत्त का आकलन नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त, तत्कालीन इतिहास भी उनके जीवनवृत्त के सम्बन्ध में मौन है। अतः, ऐसे महाकवि के जीवन-वृत्त और व्यक्तित्व का पता लगाने के लिए केवल उनकी रचनाएँ ही आधार रह जाती है। ज्ञातव्य है, कवि का जीवन, उनके वैयक्तिक क्रिया-कलाप, रहन-सहन और तत्कालीन वातावरण से प्रभावित होता है। ऐसी स्थिति में जैसे साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है, वैसे ही कवि की रचनाओं में कवि का जीवन-दर्शन और व्यक्तित्व निहित रहता है। अतः इस दृष्टिकोण से भी महाकवि की रचनाओं का सर्वांगीण अध्ययन आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी हो जाता है।
कविर्मनीषी विद्यापति के सदृश मर्मज्ञ चिन्तक को लोग पदावली के आधार पर प्रायः दरबारी कवि के रूप में चित्रित कर देते हैं, जो उचित नहीं है। कारण, उनपर गगनचुम्बी अट्टालिकाओं या राजप्रासादों के चाकचिक्य का किंचित भी प्रभाव नहीं पड़ा था। अतएव, उन्होंने एक ओर राजाओं के विलासितापूर्ण जीवन को अपने संस्कृत और अवहट्ठ रचनाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया तो दूसरी ओर उन्हीं ग्रन्थों के माध्यम से तत्कालीन साधारण जनता की स्थिति का भी हृदय-द्रावक चित्र उपस्थित किया। इसके अलावा, एक ओर दिल्ली सुल्तान की प्रशंसा भी की, तो दूसरी ओर निन्दा भी। उस समय, दिल्ली सल्तनत के खिलाफ आवाज उठाने का साहस जिस समाज के चिन्तक ने किया, उनकी कृतियों का विस्तृत अध्ययन करना कितना आवश्यक है, उसे कोई प्रबुद्ध इतिहासकार एवं समाजशास्त्री ही जान सकता है।
कवि को मिथिला की संस्कृति से अनन्य प्रेम था। अतः, उस संस्कृति की धरोहर को सुरक्षित रखने का काम विद्यापति जैसे युगबोध सम्पन्न कवि ने किया था। यह धरोहर उनकी संस्कृत और अवहट्ठ रचनाओं में सुरक्षित है। अतः, इसे भी जानने के लिए उनकी समस्त रचनाओं का अध्ययन-अनुशीलन अपेक्षित है।
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