प्राक्कथन
दर्शन की अवधारणा समय-समय पर बदलती रही है फिलॉसॉफी (Philosophy) शब्द की शब्दिक व्युत्पत्ति (Philos+sophia) के अनुसार इसे ज्ञान के प्रति प्रेम (Love For knowledge) कहा गया। प्लेटो ने इसकी उत्पत्ति जिज्ञासा से माना। पुनः यह माना गया कि दर्शन विश्व को उसकी समग्रता में समझने का एक निष्पक्ष, बौद्धिक प्रयत्न है। विश्व को समझने का अर्थ है उसकी व्यख्या करना और विश्व की व्याख्या उसके मूलभूत आधार को बतलाकर की जाती है। किसी चीज की व्याख्या करने का एक सर्वमान्य तरीका यही होता है कि उसके मूल कारण को बतला दिया जाय। विश्व की व्याख्या के लिए भी उसके मूल कारण, उसके मूलभूत आधार को बतलाना आवश्यक होता है। फलतः दर्शन में विश्व के मूलभूत आधार की खोज की जाती है। मूलभूत आधार को परम तत्व (Ultimate Reality) की संज्ञा भी दी जाती है। अतः दर्शन को विश्व को उसकी समग्रता में समझने का प्रयास कहने का मतलब हो जाता है दर्शन को परम तत्व की खोज कहना (Search for Ultimate Reality)। इसलिए दर्शन को मूलतः परम तत्व की खोज कहा जाने लगा। परम तत्व की खोज के क्रम में भौतिकवाद, प्रत्ययवाद (अध्यात्मवाद) आदि अनेक तात्विक सिद्धांतों का प्रतिपादन हुआ। परन्तु दर्शन की इस अवधारणा में भी आगे चलकर प्रथम विश्वयुद्ध के बाद बदलाव आया। इस बदलाव के फलस्वरुप दर्शन अब परम तत्व की खोज या समग्र विश्व की व्याख्या का प्रयत्न नहीं रहा। यह विचार-प्रणाली निर्माण (System Building) या सिद्धांतो की समष्टि (Body of Principles) नहीं रहा। दर्शन को अब एक क्रिया (Activity) माना जाने लगा। यह क्रिया हो गई भाषा विश्लेषण की। अब दर्शन का कार्य माना जाने लगा भाषा का विश्लेषण करना और उस विश्लेषण द्वारा भाषा की निर्मायक इकाईयों जैसे- पदों, अवधारणाओं, प्रतिज्ञप्तियों आदि के अर्थ को स्पष्ट करना। कारण यह था कि दर्शन की परम्परागत समस्याएँ अब तक बिल्कुल असाध्य रही थीं और इनके असाध्य होने का कारण था इनको गढ़ने वाली, निरूपित और व्यक्त करने वाली भाषा का अस्पष्ट होना। विज्ञान से प्रभावित कुछ विचारकों ने यह सोचा कि यदि उस भाषा के अर्थ को स्पष्ट कर दिया जाय, उसकी अनेकार्थकता को दूर कर दिया जाय, तो अब तक असाध्य बनी ये समस्याएँ, यदि वे सचमुच समस्याएँ होंगी, तो सुलझ जायेगी। वस्तुतः हुआ यह कि भाषा के अर्थ को स्पष्ट कर देने से ये समस्याएँ ही तिरोहित (Dissolve) हो गई, क्योंकि वे वास्तविक समस्याएँ नहीं थीं। भाषा की स्पष्टता के प्रति प्रतिबद्ध यह भाषा-विश्लेषण अब दर्शन का पर्याय बन गया और इस रूप में इसका अब कोई अपना विषय नहीं रहा। इसका विषय हो गया ज्ञान की विविध शाखाओं, जैसे विज्ञान, गणित, धर्म, नीति, इतिहास, विधि, शिक्षा, साहित्य आदि में प्रयुक्त होने वाली भाषा। इन सबसे सम्बद्ध होने के कारण विज्ञान-दर्शन, गणित दर्शन, धर्म दर्शन, नीति दर्शन, इतिहास दर्शन, विधि दर्शन, शिक्षा दर्शन, साहित्य दर्शन आदि के रूप में दर्शन की नई-नई विधाएँ उभरीं। इन विधाओं के अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि दर्शन अब दर्शन न रहकर " .....का दर्शन" (Philosophy of ......) हो गया। यह अब कोई प्राथमिक क्रिया (First order activity) नहीं रहा, यह अब हो गया द्वितीय स्तर की क्रिया (Second order activity)। जब हम विज्ञान दर्शन की बात करते हैं, तो उस समय हमें दो प्रकार के विज्ञानों के भेद को ध्यान में रखना चाहिए। हम जानते है कि प्राकृतिक विज्ञान और समाज विज्ञान ये विज्ञान के दो भेद हैं। भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान आदि प्रकृति विज्ञान हैं। भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान आदि प्रकृति विज्ञान हैं। मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र आदि समाज विज्ञान हैं। इन दोनों प्रकार के विज्ञान के अनुरूप विज्ञान-दर्शन के भी दो प्रकार है- प्राकृतिक विज्ञान दर्शन और सामाजिक विज्ञान दर्शन। प्राकृतिक विज्ञान की अवधारणाओं, प्रतिज्ञप्तियों, आदि का विश्लेषण करना, सिद्धान्तों के निरूपण हेतु उसमें प्रयुक्त विधियों की तार्किक संरचना की मीमांसा करना और उसकी युक्तियों में तार्किक संगति ढूँढना आदि प्रकृति विज्ञान दर्शन का कार्य है। सामाजिक विज्ञान दर्शन में भी दार्शनिक क्रिया इसी प्रारूप को अपनाती है।
लेखक परिचय
डॉ. स्वस्तिका दास तिलकामांझी भागलपुर विष्वविद्यालय, भागलपुर के अन्तर्गत मारवाड़ी महाविद्यालय (अंगीभुत महाविद्यालय) में दर्शनशास्त्र विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर एवं अध्यक्ष के पद पर कार्यरत हैं। वर्तमान में महाविद्यालय के सांस्कृतिक परिषद की सचिव हैं। इन्होंने 1996 ई. में बिहार पात्रता परीक्षा (BET) तथा 1997 ई. में यू. जी. सी. द्वारा आयोजित राष्ट्रीय पात्रता (NET) में उत्तीर्णता प्राप्त की है। इन्होंने 2008 ई. में तिलकमांझी भागलपुर विश्वविद्यालय से पी. एच. डी. की उपाधि प्राप्त की है। विज्ञान दर्शन में इनकी महती रूचि है। तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के कई शोधार्थी इनके निर्देशन में शोध कार्य कर रहे हैं। इन्होंने कई राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठियों एवं सेमिनारों में आलेख प्रस्तुत किया है। कई शोध पत्रिकाओं एवं सम्पादित पुस्तकों में इनके आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। ये अखिल भारतीय दर्शन परिषद एवं बिहार दर्शन परिषद की आजीवन सदस्य हैं तथा ये विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी से भी जुड़ी हुई हैं।
पुस्तक परिचय
'विज्ञान दर्शन विमर्श' दर्शनशास्त्र की एक नई शाखा विज्ञान दर्शन का विश्लेषण है। प्रस्तुत पुस्तक में विज्ञान से संबंधित सैद्धांतिक, तार्किक, गूढ एवं सूक्ष्म समस्याओं का विश्लेषण करने का प्रयास किया गया है। इस पुस्तक में विज्ञान के मूलतः दो रूप प्रकृति विज्ञान और समाज विज्ञान के कई बिंदुओं को लेकर उत्पन्न विवेचना को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। मुख्य रूप से प्रकृतिवादी विचारकों एवं गैर प्रकृतिवादी विचारकों के समीक्षात्मक अध्ययन को प्रस्तुत किया गया है।
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