पुस्तक परिचय
हमारी सनातन परंपरा और ज्ञान परंपरा ही हमारे वर्तमान और भविष्य का निर्माण कर सकती है। यह भी समझने की आवश्यकता है कि ज्ञान और विचार के बिना विकास के मार्ग नहीं खुल सकते। आज हमें स्वदेशी, स्वविचार, स्वभाषा, स्वभोजन, स्ववेश और स्वसंस्कृति आदि पर केंद्रित होकर जाति, संप्रदाय, क्षेत्रीयता एवं राजनीतिक मत-वादों की संकीर्णता से बचते हुए और आमूलचूल परिवर्तनों को आत्मसात करके वैश्विक पटल पर आगे बढ़ने की आवश्यकता है। आज सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबके प्रयास के साथ योजनाएं जन सामान्य तक पहुंच रही हैं। विविध क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर का तेजी से विकास हो रहा है। राष्ट्र निर्माण के कार्यों में जन भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है। मेक इन इंडिया, मेड इन इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्वदेशी, आत्मनिर्भर भारत, ग्रामोदय, श्रमेव जयते, नारी सशक्तिकरण, कृषि, किसान और युवा शक्ति को भरपूर अवसर के संकल्प सिद्धि की ओर हैं। सेवा परमो धर्म एवं स्वच्छता संस्कार बन रहे हैं। सर्वोदय अभी बाकी है। तब यह आवश्यक है कि जन सामान्य में भी भारत भाव का जागरण हो। वह भी भिन्न-भिन्न प्रकार की संकीर्णताओं को छोड़कर विकसित भारत के संकल्प को आत्मसात करें।
लेखक परिचय
डॉ. वेदप्रकाश शिक्षा : बी.ए. (ऑनर्स), एम.ए. (हिंदी), एम.फिल., पी-एच.डी., एम.ए. (पत्रकारिता एवं जनसंचार), अनुवाद : भारत सरकार से मान्यता प्राप्त एक वर्षीय वाकसेतु स्नातकोत्तर (अंग्रेजी-हिंदी-अंग्रेजी) डिप्लोमा : भारतीय अनुवाद परिषद, नई दिल्ली से। लेखन कार्य : 'बोधा के काव्य में जीवन-मूल्य', 'कवि बोधा और उनका इश्कनामा', 'कवि आलम और उनकी आलमकेलि', 'साहित्येतिहासकारों की दृष्टि मीमांसा', 'हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति', 'संकल्प राष्ट्र निर्माण का' (प्रधानमंत्री जी के मन की बात का विश्लेषण)। 'नया भारत, समर्थ भारत', 'जल जीवन' आदि महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित । दैनिक जागरण एवं अन्य समाचार पत्रों में लगभग 300 संपादकीय लेख प्रकाशित। हिंदी पत्रिकाओं में भी अनेक शोध लेख प्रकाशित । पत्रकारिता एवं मध्यकालीन साहित्य के अध्ययन-अध्यापन में विशिष्ट अभिरुचि। सम्मान-पुरस्कार : साहित्यश्री कृति सम्मान 2018, दिल्ली लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय । संप्रति : हिंदी विभाग, किरोड़ीमल महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर ।
प्राक्कथन
व्यक्ति, परिवार, समाज और फिर प्रदेश बनते हुए सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, धार्मिक और भौगोलिक विस्तार के साथ- साथ भाषा, भोजन और मेष आदि विविध आयामों में व्यापक होती जो संकल्पना हमारे सामने आकार लेती है, वही भारत है। इसमें विविधता तो है लेकिन वह विविधता अनेक आधारों पर एकता के सूत्रों में जुड़ी हुई है। भिन्न-भिन्न रूपों में समरसता भारत की आत्मा है। भारत सनातन राष्ट्र है, जब ऐसा कहा जाता है तो यह इसके सृष्टि के आरंभमें सबसे पहले होने का सूचक भी है। विश्व ज्ञान विज्ञान के आदि स्त्रोत वेद जब यह उद्घोष करते हैं कि-सर्वे भवंतु सुखिनः तब यह स्पष्ट होता है कि भारत केवल स्वयं के सुख की कामना नहीं करता, अपितु वह समस्त भुवन और चराचर के सुख की कामना करता है। यहां केवल मानवाधिकारों की चिंता नहीं हुई है अपितु समष्टि कल्याण की दृष्टि से जीवन जगत की रचना का विचार दिया गया है। वसुधैव कुटुंबकम भी इस दृष्टि का ही द्योतक है, जिसमें समूची वसुधा को एक परिवार के रूप में परिकल्पित किया गया है। भारतीय ज्ञान परंपरा मनुष्य को केंद्र में रखते हुए समग्रता में विचार करती है। यही कारण है कि वैदिक चिंतन मनुर्भव अर्थात् मनुष्य बनने का मार्ग प्रशस्त करता है। भारतीय ज्ञान परंपरा और जीवन पद्धति में भारत कोई भूखंड अथवा निजीव संकल्पना नहीं है, अपितु यह भारतभूमि हमारे लिए माता है। इसलिए कहा भी गया- माताभूमिरू पुत्रोंअहं पृथिव्याः ...। समूची वसुधा पर भारतवर्ष एकमात्र ऐसा देश है जहां की ज्ञान परंपरा ने आरंभसे ही प्रकृति-पर्यावरण और विविध आयामों पर विचार करते हुए उनके कल्याण एवं संतुलन का संदेश दिया। यजुर्वेद में लिखा है- द्यी शान्तिरन्तरिक्ष... अर्थात् हे मनुष्यों ! जो प्रकाशयुक्त पदार्थ शान्तिकारक, दोनों लोक के बीच का आकाश शान्तिकारी, भूमि सुखकारी, निरुपद्रव जल वा प्राण शान्तिदायी, सोमलता आदि औषधियां सुखदायी, वट आदि वनस्पति शान्तिकारक, सब विद्वान लोग उपद्रवनिवारक, परमेश्वर वा वेद सुखदायी, संपूर्ण वस्तु शान्तिकारक, शान्ति ही शान्ति मुझको प्राप्त होवे, वह शान्ति तुम लोगों के लिए भी प्राप्त होवे। इससे स्पष्ट है कि केवल मुझे ही न प्राप्त हो, अपितु तुमको अर्थात् सबको भी प्राप्त हो। भारतवर्ष की सत्यता और सनातनता सर्वविदित है। विदेशी विद्वान सर वॉल्टर रेले ने अपनी जगत का इतिहास नामक पुस्तक में लिखा है- जल प्रलय के अनन्तर भारतवर्ष में ही वृक्ष-लता आदि की उत्पत्ति और मनुष्यों की बस्ती हुई थी। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा लिखित भारत भारती नामक पुस्तक में लिखा है- हाँ, वृद्ध भारतवर्ष ही संसार का सिरमौर है, ऐसा पुरातन देश कोई विश्व में क्या और है? भगवान की भव-भूतियों का यह प्रथम भाण्डार है, विधि ने किया नर- सृष्टि का पहले यहीं विस्तार है।। 1 नक हीं भारतवर्ष की श्रेष्ठता, विविधता और समृद्धता के अनेक आयाम हैं, जिन पर देश- विदेश के अनेक विद्वानों ने शोध ग्रंथ लिखे हैं। लेकिन यह भी सर्वविदित है कि एक लंबा कालखंड ऐसा भी रहा, जिसमें भिन्न-भिन्न कारणों से भारत में विदेशी आक्रांता आते जाते रहे। दासता के लंबे कालखंड में संघर्ष भी अनेक हुए, बलिदानों की तो लंबी परंपरा हम सबके सामने है ही। लेकिन उन अनेक संघर्षों के बाद भी जिजीविषा बनी रही। यह देश दासता से मुक्त हुआ और अब फिर से विराट गौरव की ओर अग्रसर है। सैमुअल हटिंगटन ने अपनी पुस्तक हू आर वी में लिखा है-जब तक हम यह तय नहीं करते की हम कौन हैं तब तक हम यह तय नहीं कर सकते कि हमारी प्राथमिकताएं क्या हो सकती हैं। आज एक नागरिक और एक राष्ट्र के नाते हमें यह विचार करने की आवश्यकता है कि हम कौन हैं? और हमारी प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिए? भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। जनसंख्या की दृष्टि से भी यह दुनिया का सबसे बड़ा देश बन चुका है। ऐसे में यहां आवश्यकताएं, अवसर और चुनौतियों का भी सबसे बड़ा होना स्वाभाविक है। यह भी संभव है कि परंपरा और आधुनिकता में सामंजस्य की दृष्टि से भी कठिनाई हों। लेकिन हमें यह समझना होगा कि हमारी सनातन परंपरा और ज्ञान परंपरा ही हमारे वर्तमान और भविष्य का निर्माण कर सकती हैं। यह भी समझने की आवश्यकता है कि ज्ञान और विचार के बिना विकास के मार्ग नहीं खुल सकते। आज हमें स्वदेशी, स्वविचार, स्वभाषा, स्वभोजन, स्ववेश और स्वसंस्कृति आदि पर केंद्रित होकर जाति, संप्रदाय, क्षेत्रीयता एवं राजनीतिक मत- वादों की संकीर्णता से बचते हुए और आमूलचूल परिवर्तनों को आत्मसात करके वैश्विक पटल पर आगे बढ़ने की आवश्यकता है। आज सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबके प्रयास के साथ योजनाएं जन सामान्य तक पहुंच रही हैं। विविध क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर का तेजी से विकास हो रहा है। राष्ट्र निर्माण के कार्यों में जन भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है।
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