भान पंजाब घशान्त है। कल धासाम में हलचल थी। अब गुजरात में वेचैनी है । कभी भिवण्डी-काण्ड, कभी धलीगढ़ या जमशेदपुर की खबरें ।
इस सबको देख-सुनकर सहसा जो प्रश्न उठता है, प्रश्न उठता ही नहीं, मन को कचोटता है, यह है- यह सब क्यों ? यह भूभाग, जिवे भारतभूमि कहते हैं, क्या एक राष्ट्र है या कई राष्ट्रों का राष्ट्र-कुल ? धौर उसमें रहने वाले, हम सभी, क्या एक राष्ट्र है, एक राष्ट्र की जनता है या कई राष्ट्रों की जनताएँ ?
प्रश्न तो स्पष्ट और सीधा-सादा है, क्या उसका उत्तर भी उतना स्वष्ट और सीधा-सादा मिल सकता है ? भारत के उत्तर से दक्षिण और पश्चिम से पूर्व, सब जगह, पूम जाइये, धापकी मुलाकात कायमीरी, पंजाबी, सिन्धी, बिहारी, बंगाली घौर भी अन्य कईयों से हो जावेगी, हिन्दु, सिख, जैन, बौद्ध, मुस्लिम, ईसाई, भी बहुतेरे मिलेंगे, यही नहीं, सारस्वत बाह्मण, गौड़ ब्राह्मण, खत्री, राजपुत, जाट, अप्रवाल, कायस्य और भी न जाने कितने लोग देखने को मिल जायेंगे, पर ऐसा कोई बिरला ही होगा जो अपना परिचय एक भारतीय के नाते से कराये, ऐखा भारतीय, जी धन्दर से और बाहिर से, जो शुरू से धातिर तक, बस केवल भारतीय ही हो !
सपने तो देखते हैं भारत राष्ट्र के भावनात्मक एकीकरण के, पर व्यवहार में उसका वर्गीकरण कर रखा है ऊपर से नीचे तक (vertically), और दाएँ से बाएँ तक (horizontally), सब तरफ से । धौर वह वर्गीकरण केवल पहिबान के लिए ही होता कि जिससे किती को जल्दी से या ठीक से तलाश किया जा सके, उससे मिला जा सके, उसके घर चिट्ठी या तार पहुंचाई जा सके, तो भी कोई बात थी। पर, काव! यहाँ तो मामला ही कुछ धौर है, टेढ़ा भी, गहरा भी घौर बन्धिवारा भी! इस वर्गीकरण के साथ जुड़े रहे हैं ऊँव नीव के भाव, अस्पृश्यता का प्रदन, रोटी बेटी के रिश्ते, धौर सब साथ में जुड़ गवे है राजनैतिक विशेषाधिकार एवं सायिक सुविधाएँ। करेला और फिर नीम चढ़ा !
सामाजिक व्यवस्था ने बम-विभाजन के चाचार पर वर्गीकरण किया, जिसे व-व्यवस्था के नाम से पुकारा जाता है। यहाँ तक तो वर्गीकरण में कठोरता नहीं थी। ये सभी वर्ग एक-दूसरे की सीमाधों में आ-जा सकते थे। पर, बाद में कुछ ऐतिहासिक दबावों ने हमारी समाज-व्यवस्था के लबहीलेवन को समाप्त कर दिया। हो सकता है उसके कुछ लाभ भी रहे हों. वर, समय के बदलाव से उन ऐतिहासिक दबावों के हट जाने पर भी वह कठोरता हटी नहीं। इने समाज के बुद्धिजीवी सामाजिक नेतृवर्ग में गतिशीलता बौर प्रगतिशीलता का प्रभाव कहिये, या इने मध्यकालीन रूढ़िवाद के चन्धानुकरण का नाम दीजिये, इस ने भारतीय समाज और भारतीय राष्ट्र को यह असीम हानि पहुंचाई कि हम सिकुड़ते ही चले गये। उस बुद्धिजीवी सामाजिक नेतृवरी को खूब कोसा जाता रहा है. कोसा भी जा रहा है, और भी जी भर कोस लीजिये, अब वह बहुत सीमा तक निष्प्रभाव हो चुका है। पर । पर, उस नये नेतृवर्ग को क्या कहिये, जिसने सिसकते बोतीदे खोखले वर्गीकरण को हवा दी है, दम तोड़ते को नया जीवन दिया है, जिसने पाविक सुविधाओं के नाम पर इसका तुष्टीकरण किया है, राजनैतिक विशेशविकार के रूप में इसका पुष्टीकरण किया है? और इस में कारण क्या नेतृवर्ग में गतिशीलता या प्रगतिशीलता का अभाव है, या मध्यकालीन रूढ़िवाद का अन्धानुकरण है अथवा अस्थायी राजनैतिक स्वायों के कारण स्थायी राष्ट्रिय हितों के प्रति दूरदर्शिता का अभाव ?
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