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विश्व ज्योति (दयानन्द-निर्वाण-शताब्दी-अङ्क)- Vishva-Jyoti: A Collection of Articles on Dayanand-Nirvana-Centenary-Issue: April-May 1983 (Part- 1: An Old and Rare Book)

$22
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Specifications
Publisher: Vishveshvaranand Vedic Research Institute, Hoshiarpur
Author Edited By Vishva Bandhu
Language: Hindi
Pages: 220
Cover: PAPERBACK
9.5x7.5 inch
Weight 350 gm
Edition: 1983
HCH501
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Book Description

सम्पादकीय

स्वामी दयानन्द का प्रादुर्भाव गुजरात राज्य की मौरवी रियासत के टंकारा बाम में उदीच्य सामवेती बाह्या श्री कर्षण जी के घर संवत् १८८१ (सन् १८२४) में हुया। स्वामी जी का नाम मूलशंकर रखा गया। पारिवारिक परम्परानुसार उन्हें शिवपूजा में प्रवृत्त किया गया। बाल्यकाल में ही रुद्राध्याय ग्रीसने के पश्चात् उन्हें शुक्ल यजुर्वेद पढ़ाता धारम्भ किया गया। महादेव पूजा से विरक्त होने पर दयानन्द के मन में सच्चे शिव की खोज की ललक जग गयी। उधर भगिनी तया चाचा की मृत्यु ने मूलशंकर के मन में वैराग्य उत्पन्न कर दिया। इधर सोलह-सत्रह वर्ष की अवस्था में वे यजुर्वेद का अध्ययन समाप्त कर चुके थे। वैराग्योद्दीप्त मन दयानन्द को पर से बहुत दूर ले जाना चाहता था। बतः एक दिन रात के समय घर से निकल गये ।

सोज-खबर के पश्चात् किसी परिचित के माध्यम से परिवार वालों को पता चल गया उनके ठिकाने का और उनके पिता अपने चार सिपाहियों सहित उन्हें लेने पहुँच गये। स्वामी दयानन्द लिखते हैं-" मैंने उठकर उनके (पिता जी के) पाँव पकड़ लिये। वे मुझ पर बहुत ही क्रुद्ध हुए", यहाँ से मूलशंकर को उनके पिता जी घर ले गये तथा घर में चार सिपाहियों के पहरे में उन्हें रखा गया। किन्तु कहाँ बन्ध पाता है वह व्यक्ति जिसके मन में संसार को मुक्त कराने की ललक जग रही हो। एक दिन अवसर पाकर घर से निकल पड़े और इसके बाद फिर कभी घर नहीं गये ।

अब वे कुछ समय तक शुद्ध चैतन्य ब्रह्मचारी के नाम से जाने जाते रहे। इलाहाबाद में उन्हें उनके गाँव के बहुत से लोग मिले किन्तु उन्होंने किसी को भी अपना पता नहीं दिया। तेईस-चौबीस वर्ष की अवस्था में वे सिद्धपुर से बड़ौदा बाये और नर्वदा नदी के तट पर विचरते रहे। वहाँ दक्षिणी ब्राह्मण श्रीकृष्ण शास्त्री के यहाँ अध्ययन करते रहे। वहीं चरणोदकर्नाली में उन्हें एक संन्यासी मिले जिनके उपदेश के प्रभाव में बाकर शुद्ध चैतन्य ब्रह्मचारी ने श्राद्ध आदि करके संन्यास ले लिया ताकि पढ़ने-लिखने में सुविधा रहे। वहाँ से घूमते हुए स्वामी दयानन्द तीस वर्ष की अवस्था में सम्बत् १९११ (सन् १८५४) में हरिद्वार पहुंचे। वहाँ उन्होंने एक बयोवुद्ध संन्यासी सम्पूर्णानन्द जी के विषय में सुना। उन्होंने स्वामी सम्पूर्णानन्द जी की विद्वत्ता के विषय में पहले भी बहुत कुछ सुना था, अतः वे उनसे मिले और शिष्यत्व ग्रहण करने की अपनी लालसा प्रगट की। इस पर स्वामी सम्पूर्णानन्द जी ने कहा- "दयानन्द जी! मैं १०३ वर्ष का वृद्ध होने से अध्यापन कार्य करने में असमर्थ हूँ। मथुरा में हमारे शिष्य विरजानन्द सरस्वती पढ़ा रहे हैं। आपका अभीष्ट मनोरथ वहाँ पूर्ण हो सकेगा।

यहीं उस वृद्ध संन्यासी ने अंग्रेजों के भारत में प्रवेश से लेकर अन्त तक का सम्पूर्ण घटना चक्र कह सुनाया। स्वामी दयानन्द भारत-दुर्दशा के उस वृत्तान्त को सुनकर अत्यन्त बिह्वल हो उठे। तत्काल वे कोई निश्चय नहीं कर सके और वहाँ से उत्तराखण्ड की ओर चले गये। पुनः संवत् १९१२ (सन् १८५५) में इकतीस वर्ष की अवस्था में स्वामी दयानन्द ने काशीपुर होते हुए कुछ समय द्रोण सागर में व्यतीत किया। यहाँ उनके मन में पुनः महात्मा सम्पूर्णानन्द जी को मिलने की ललक जाग उठी। वे कनखल झाकर उनके चरणों में उपस्थित हो गये। तब वृद्ध संन्यासी स्वामी सम्पूर्णानन्द जी ने कहा-

" वत्स ! भारत देश से विदेशी शासन को उखाड़ फेंकने के लिये नर्मदा तट पर सन्त-वर्ग एक रूप-रेखा तैयार कर रहा है। वह सर्वया गुप्त है। समस्त देश में निश्चित तिथि को नियमित समय पर उसका विस्फोटन होगा। विरजानन्द जो पहले ही मथुरा में ऐसे स्थान पर जा बैठे हैं जो रजवाड़ों के निकटवर्ती है। वह यहाँ से इस दिशा में अपना रंग दिखाने के लिये राजाओं से सम्पर्क स्थापित किये हुए हैं। पंजाब भी इस दिशा में एक दशक से प्रयत्नशील है। पेशवा नाना साहिब ने भी एक संगठित योजना बना ली है। इस प्रकार अन्य भारतीय जन भी अपना बलिदान करने के लिये तैयार रहेंगे।

इस पर स्वामी दयानन्द के मन में स्वतन्ाता के प्रति ललक जागृत हुई तया स्वतंत्रता-प्राप्ति की तड़प के बधीनूत उन्होंने कहा- " भगवन् ! ऐसी स्थिति में मेरा योगदान नर्मदा-तट संगठन में ही श्रेयान् रहेगा। इस क्रान्ति काल में मेरा स्वामी विरजानन्द से विद्याध्ययन दुष्कर है।

इस प्रकार स्वामी दयानन्द के मन में स्वतन्त्रता-प्राप्ति की तड़प बद्दीप्त हो चुकी थी यतः विद्याध्ययन के कार्यक्रम को निरस्त कर के नर्मदा-तट संगठन के कार्य में तल्लीन रहे। और स्वामी दयानन्द सम्वत् १६१७ (सन् १८६०) में स्वामी विरजानन्द के पास मथुरा पहुंचे तथा तीन वर्ष तक विद्याध्ययन करके गुरुदक्षिणा में जीवनदानी बन कर चल पड़े। पहले शैव मतावलम्बी बन वैष्णव मत का खण्डन करते रहे तथा इसके पश्चात् संवमत का भी खण्डन घारम्भ कर दिया। यह परिवर्तन उनके निरन्तर चिन्तन एवं स्वाध्याय का परिणाम था। दयानन्दः यदि चाहते तो समाज से दूरस्थ जंगलों में जाकर घोर तपस्या से मुक्ति को प्राप्त कर नेते, किन्तु देश और समाज की मुक्ति के समक्ष द्यात्म-मुक्ति की बात उनके लिये बहुत ही छोटी पड़ गयी थी। यही कारण या कि उनका स्वतन्त्र चिन्तन राष्ट्रीय मानस में नवीन प्राण फूंकने का मार्ग खोज रहा था। अपने मार्गानुसन्धान के कार्यकाल में वे यदा-कदा गुरुवर विरजानन्द जी से अवश्य मिल लेते थे। धव वे मात्र एक कोपीन धारण करने लगे थे। किन्तु रेलादि की यात्रा करने के कारण उन्होंने पुनः वस्त्रादि धारण कर लिये ।

वे निरन्तर जनकल्याण के कार्य में लगे रहे। देशाटन करते हुए वे अपने क्रान्तिकारी विचारों से देश की जनता को अवगत कराते रहे। अन्ततः सन् १८७५ में आर्य समाज की स्थापना स्वामी जी ने की धौर 'कृण्वन्तो विश्वमार्यम्' का सूत्र प्रचारित किया। उनके मनमें आजादी की तड़प इतनी थी कि उनके ग्रन्थों में स्थान-स्थान पर उसका उ‌द्घाटन होता है। अपने मत की पुष्टि हेतु हम यहाँ कतिपय उद्धरण दे रहे हैं:-

(क) यार्यावत्तं में भी धायों का अखण्ड स्वतन्त्र स्वाधीन और निर्भय राज्य इस समय नहीं है जो कुछ है सो विदेशियों के पादाक्रान्त हो रहा है। कुछ थोड़े राजा स्वतंत्र हैं। दुदिन जब आता है तब देश-वासियों को अनेक प्रकार के दुःख भोगने पड़ते हैं। कोई कितना ही करे परन्तु जो स्वदेशी राज्य होता है, वह सर्वोपरि उत्तम होता है। (सत्यार्यप्रकाश घष्टम सम्मुलास, पृ० २००) ।

(ख) ब) माता पिता के समान कृपा, न्याय और दया के साथ विदेशियों का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नहीं है।

(ग) (सत्यार्थप्रकाश अष्टम समुल्लास, १० २००) ।

(घ) (ग) मृष्टि से लेकर महाभारत पर्यन्त चक्रवर्ती, सार्वभौम पार्यकूल में ही हुए थे। घब इनके सन्तानों का अभाग्योदय होने से राजभ्रष्ट होकर विदेशियों के पादाक्रान्त हो रहे हैं। (सत्वार्यत्रकार एकादश सम्मुलास, ५० २४८) इतना ही नहीं ईश्वर प्रार्थना के अन्तर्गत वे स्वदेशी राज्य के प्रति अपनी ललक को उ‌द्घाटित करते हुए घपनी प्रार्थनाथों में बहते थे हे परमेश्मर स्वदेशस्य श्रादि मनुष्यों को अत्यन्त परस्पर निवर, प्रीतिमान्, पाखण्डरहित करें। धन्योन्य प्रीति से परमवीर्य पराक्रम से निष्कष्टक चक्रवर्ती राज्य भोगें। हममें सब नीतिमान् सज्जन पुरुष हों ।

(ङ) (च) (धार्याभिविनय : द्वितीय प्रकाया, मन्त्र - १) ।

(छ) यही नहीं स्वामी दयानन्द अपनी ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में स्वराज्य ही नहीं गणराज्य की स्थापना की धोर भी संकेत करते हैं-

(ज) (झ) थी जो है लक्ष्मी वही राज्य का स्वरूप, सामग्री और मध्य है। तथा राज्य का जो लक्षण करना है, वही सोना अर्थात् श्रेष्ठमागं कहाता है। राज्य के लिए एक को राजा कभी नहीं मानना चाहिये। क्योंकि जहाँ एक को राजा मानते हैं, वहाँ सब दुःखी और उसके सुख और उसके उत्तम पदार्थों का अभाव हो जाता है। इसी से किसी की उन्नति नहीं होती । ..

(ञ) (ट) और धायों की यह एक बात बड़ी उत्तन थी कि जिस सना वा न्यायाधीश के सामने-अन्याय हो वह प्रजा का दोष नहीं मानते थे, किन्तु वह दोष सभाध्यक्ष, सभासद, और न्यायाधीश का ही गिना जाता था।

इसलिये वे लोग न्याय करने में अत्यन्त पुरुषार्य करते थे, कि जिससे वार्यावर्त में कभी प्रत्याय नहीं होता था। धौर जहाँ होता था वहाँ उन्हीं न्यायाधीशों को दोष देते थे।

(ठ) (ड) पाठक वृन्द ! उपर्युक्त पंक्तियों के अन्तर्गत हमने स्वामी दयानन्द सरस्वती की संक्षिप्त जीवनी को प्रस्तुत करते हुए स्वदेशी राज्य के प्रति उनकी तड़प तथा स्वतन्त्रता के प्रति उनकी ललक को प्रस्तुत करने का एक लघु प्रयास किया है। इसी वर्ष दीपपर्व के अवसर पर स्वामी दयानन्द को इस देश से विदा हुए एक शताब्दी पूर्ण हो जायेगी ।

(ढ) (ण) बाज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं किन्तु उनके स्वतन्त्रता सम्बन्धी विचार उनके ग्रन्थों के माध्यम से हमें परस्पर प्रेम तया स्वतन्त्रता की रक्षा करने के लिये प्रेरित करते रहेंगे। 'विश्व-ज्योति' का प्रस्तुत पंक उसी महान् स्वतन्त्रचेता के प्रति समर्पित है। यहाँ हमने स्वामी दयानन्द से सम्बन्धित कतिपय विषयों पर लेख तथा कविताएँ बादि दी हैं। और इस तरह विश्व-ज्योति का स्वामी दयानन्द-निर्वाण-सताब्दी-अंक-१ धापके हाथों में है। हमें चापकी प्रतिक्रियाबों की अपेक्षा रहेगी।

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