इस अंक के साथ आपकी यह 'विश्वज्योति' अपनी आयु के ५०वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। एक अव्यावसायिक (Non-commercial) सांस्कृतिक पत्रिका होते हुए भी यह जो इतने वर्षों से नियमित रूप से प्रकाशित होती आ रही है तो इसका श्रेय सुधी पाठकों के प्रोत्साहन, विद्वान् लेखकों के सहयोग, एवं दानवीर सज्जनों की उदारता को ही जाता है।
पिछले वर्षों की भांति इस नव वर्ष का प्रारम्भ भी एक ही विषय को समर्पित दो विशेषांकों के साथ हो रहा है। इस बार ये विशेषांक 'महापुरुष अंक' के रूप में प्रकाशित किए जा रहे हैं।
पिछले वर्ष के विशेषांक एक 'नवयुग' का स्वागत करने को आयोजित हुए थे। किन्तु संसार में आज चारों ओर एक हिंसा, स्वार्थ, घृणा और हताशा इत्यादि का अन्धकार छाया हुआ है और इसमें फंसी मानव जाति बुरी तरह से ठोकरें खाती भटकती फिर रही है। ऐसे में नवयुग का या नवीन शताब्दी का स्वागत करने को भला किस का जी चाहेगा ?
इस अन्धकार को महापुरुषों का जीवन अवश्य ज्योति-किरणों से जगमगा जाता है और आशा बन्धाता है कि मानव यदि आत्म रूपान्तरण एवं जग रूपान्तरण का दृढ़ निश्चय कर ले वह बड़े से बड़े संकट का भी सामना सफलतापूर्वक कर सकता है।
महापुरुषों का ऐतिहासिक महत्त्व समझते हुए अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक कारलायल (Thomas Carlyle) ने कहा था- "संसार का इतिहास वस्तुतः महापुरुषों की जीवन-कथा ही है।
आज के इस जनतन्त्र युग में अनेक चिन्तक इस कथन से शायद सहमत नहीं होंगे। विशेषतः इसलिए कि बड़े बड़े नेता आज साधारण जनता के पीछे बोटों के लिए हाथ पसारे घूम रहे हैं। अतः समकालीन मान्यता मुख्यतः यह है कि वास्तव में जन साधारण की जीवन कथा ही इतिहास का विषय बननी चाहिए। साधारण लोग ही अपने रहन सहन और आचार विचार से सामाजिक व्यवस्था को रूप देते हैं। उनकी जीवन शैली का परिवर्तन ही सामाजिक तथा ऐतिहासिक विकास की प्रक्रिया को गति और दिशा देता है।
किन्तु यह तथ्य भी मानना पड़ेगा कि जनसाधारण की जीवन शैली व्यक्तियों का सशक्त व्यक्तित्व व्यापक रूप से प्रभावित कर जाता है।
जैसे कुछ विजेता, साम्राज्यों को उलट पलट कर हजारों लोगों के जीवन को बदल जाते हैं। इतिहास ऐसे ही व्यक्तियों को महान् घोषित करके उनके कारनामों का विवरण देने में जुट जाता है। ऐसे ही लिखित इतिहास को देख कर कारलायल ने उपर्युक्त बात कही थी।
किन्तु इन विध्वंसक योद्धाओं से कहीं अधिक स्थायी और गहरा प्रभाव वे प्रवृद्ध चिन्तक और ज्ञानी महापुरुप डालते हैं जो नूतन ज्ञान रश्मियों से लाखों दिलों में उजाला कर जाते हैं। वे अपने समकालीनों को ही प्रभावित नहीं करते, आने वाली हजारों पीढ़ियों को भी प्रेरणा देते रहते हैं। महाभारत का हीं उदाहरण ले लें- भीम, अर्जुन, कर्ण जैसे योद्धा तो आए और चले गए किन्तु कृष्ण की गीता आज भी करोड़ों दिलों को प्रेरित कर रही है। इसी प्रकार महात्मा बुद्ध का प्रेम और करुणा का सन्देश आज भी सुधी जनों को जीत रहा है।
'विश्वज्योति' के ये विशेषांक ऐसे ही प्रबुद्ध महापुरुषों को समर्पित हैं। विशेषतः इसलिए कि सम्पूर्ण विनाण के कगार पर पहुंची हुई मानवता को आज उनकी प्रेरणा की विशेष आवश्यकता दिखाई दे रही है।
कुछ ऐसे ही विचार थे जिनके कारण इस वर्ष महापुरुष विशेषांक प्रकाशित करने का निर्णय किया गया था।
विद्वान् लेखकों ने यहां अनेक महापुरुषों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर कई कोणों से दृष्टिपात करने का प्रयास किया है। आशा है हमारे सुधी पाठकों को ये अंक कुछ नए सुझाव देंगे और विश्व तथा राष्ट्र की समस्याओं को एक नए ढंग से देखने-समझने का अवसर प्रदान करेंगे। साथ ही, ये आत्म विकास तथा आत्म रूपांतरण के लिए भी प्रेरक तथा सहायक सिद्ध होंगे ।
एक बार फिर हम अपने पाठकों, लेखकों तथा दानी सज्जनों के प्रति अपना हार्दिक आभार प्रकट करते हैं और आशा करते हैं कि आप सब का सक्रिय सहयोग हमें आगे भी इसी भान्तिं मिलता रहेगा।
Hindu (हिंदू धर्म) (13782)
Tantra (तन्त्र) (1014)
Vedas (वेद) (731)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2112)
Chaukhamba | चौखंबा (3229)
Jyotish (ज्योतिष) (1578)
Yoga (योग) (1176)
Ramayana (रामायण) (1321)
Gita Press (गीता प्रेस) (720)
Sahitya (साहित्य) (24908)
History (इतिहास) (9102)
Philosophy (दर्शन) (3646)
Santvani (सन्त वाणी) (2600)
Vedanta (वेदांत) (117)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist