आज का मानव डाइनोसौर बन गया है। लाखों वर्ष पहले धरती पर एक विशेष प्रकार के पशुओं का राज था। इन्हें डाइनोसौर (dinasaur) कहते हैं। ये बहुत ही विशालकाय जीव ये इनके सामने आज के हाथी भी चूहे की भान्ति दिखाई देंगे। इस जीव का शरीर तो बहुत बड़ा था, किन्तु इसकी खोपड़ी में दिमाग बहुत छोटा था। परिणाम यह हुआ कि बदलती परिस्थितियों का सामना वह न कर सका और यह जीव-जाति धरती से ही विलुप्त हो गई। आज का मनुष्य भी एक ऐसा ही डाइनोसौर बन गया है। इसका मस्तिष्क तो बहुत बड़ा हो गया है किन्तु इसका हृदय छोटा रह गया है। इसके पास शक्ति तो बहुत आ गई है किन्तु इसकी नैतिकता बहुत पिछड़ गई है। और इसलिए आज की तेजी से बदलती परिस्थितियों में यह रास्ता भूल बैठा है। डाइनोसौर के शरीर और मस्तिष्क के बीच जो असन्तुलन था उसी ने इस जीव-जाति को धरती से मिटाया था। इसी प्रकार काःअसन्तुलन आज मनुष्य के मस्तिष्क और हृदय में उत्पन्न हो गया है। और यही असन्तुलन आज मानवः के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है।
इस खतरे को देखते हुए ही विश्व-ज्योति के इस वर्ष के विशेषांकों के लिए आत्म-विकास का विषय चुना गया। वैसे तो सभी युगों में इस विषय का महत्व असंदिग्ध रहा है, किन्तु आज के युग में आत्म-विकास का महत्त्व और भी अधिक बढ़ गया है- मानव जाति के बचे रहने के लिए ही यह अनिवार्य प्रतीत होने लगा है। अपने चारों और देखिए। संसार में सब ओर भ्रष्टाचार है, हिंसा है, आतंक है, पूणा और विद्वेष है। लगता है कि मानवता आत्महत्या के लिए पूरी तैयारी कर चुकी है। अब यह स्पष्ट हो गया है कि यदि हम समाज में बुनियादी सुधार नहीं करेंगे, उसे पूरी तरह नहीं बदलेंगे, तो शायद धरती से पूरा जीवन ही विलुप्त हो जाएगा ।
योजनाएं भी बनाते हैं। किन्तु बात करते हैं किन्तु समाज की व्यक्तियों से ही समाज बनता है, इस बात को सब जानते हैं और इसके लिए बातें भी करते हैं, यहां एक दिक्कत पैदा हो जाती है। हम समाज को बदलने की तो उस इकाई को भूल जाते हैं जो यदि बदलेगी तभी समाज बदलेगा। और जब तक व्यक्ति स्वार्थी और आक्रामक रहेगा तब तक समाज से हिंसा और आतंक को समाप्त करना सम्भव नहीं हो सकेगा ।
व्यक्ति को बदलने की बात करते हुए भी हम प्रायः दूसरों को बदलने की ही बात करते हैं। उस व्यक्ति को बदलना भूल जाते हैं जिसे बदल पाना हमारे लिए सम्भव भी हो सकता है। दूसरे शब्दों में, हम औरों को तो बदलना चाहते हैं, अपने को बदलना भूल जाते हैं। आत्मविकास का यह विशेषांक यदि हमें इस प्रसंग में अधिक सचेत कर सके तो यही इसकी सार्थकता होगी ।
यह अंक केवल आपका ध्यान आत्म-विकास के महत्त्व की ओर आकर्षित करना चाहता है। इस बारे में आपको कुछ उपयोगी सुझाव भी देना चाहता है। आप कैसे बदलेंगे, अपने आपको बदलने के लिए अपना सम्पूर्ण विकास करने के लिए कौन-कौन से कदम उठाएंगे, यह तो अन्ततः आप पर ही निर्भर करेगा।
इस प्रसंग में एक और बात भी इष्टस्य है। अभी तक समाज का वातावरण प्रतिस्पर्धापूर्ण रहा है। इस वातावरण में जो लोग आत्म-विकास करना चाहते हैं, अपने व्यक्तित्व के सकारात्मक पक्ष को अधिक विकास देना चाहते हैं, वे प्रायः संसार से अलग होकर बैठ जाते रहे हैं। कबीर के शब्दों में- राम झरोखे बैठ कर सब का मुजरा देख। इस वैराग्य का कारण भी स्पष्ट है। सांसारिक उन्नति के लिए लड़ना पड़ता है, जूझना पड़ता है, अपने स्वाग्रही नकारात्मक भावों को अधिक सक्रिय करना पड़ता है। किन्तु आध्यात्मिक उन्नत्ति के लिए स्वातीत सकारात्मक भावों का विकास आवश्यक होता है। अतः मानव जीवन में एक खाई पड़ गई। इसके एक ओर सांसारिक उन्नति के इच्छुक लोग दौड़-धूप कर रहे हैं, तो दूसरी ओर आध्यात्मिक उन्नति के प्रेमी पद्मासन लगाकर ध्यान में बैठे हैं।
दूरदर्शी लोग भी अब तबाही है। भौतिक परिस्थितियां बदल गई हैं। सांसारिक उन्नति की इच्छा रखने वाले यह समझने लग पड़े हैं कि नकारात्मक भावों को उकसाने का परिणाम विनाश और उन्नति के लिए भी अब सकारात्मक भावों का विकास आवश्यक हो गया है। अतः इतिहास में शायद यह पहली बार हुआ है कि भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति के बीच की खाई को पाटना आवश्यक हो गया है। हमारी पुरानी कथाओं में कुछ राजषियों का वर्णन आता है, जो विलास और वैभव में रहते हुए भी अनासक्त रहते थे, जो भौतिक सुखों के बीच रहते हुए भी उनके प्रवाह में वह नहीं जाते थे। लगता है कि यह नया युग ऐसे ही राजषियों का युग होगा, जो व्यापक समृद्धि में रहते हुए भी, सब प्रकार के भौतिक सुखों को भोगते हुए भी, उन मुखों के दास नहीं बनेंगे जो अपने स्वातीत सकारात्मक भावों का विशेष विकास करते हुए सब से मिलजुल कर रह सकेंगे ।
आप कह सकते होती रही है किन्तु कुछ लड़ती भिड़ती ही रही है। बचे हैं। या तो मिलजुल हैं कि यह सब आदर्शवादी हवाई बातें हैं। प्रत्येक युग में ऐसी हवाई बातें घोड़े से लोग ही ऐसे आदर्शवादी बन सके हैं और अधिकांश जनता आपस में बापकी यह आपत्ति ठीक है। किन्तु नए युग में हमारे सामने दो ही विकल्प कर रहो, अपने सकारात्मक भावों का विकास करके प्रेमपूर्वक रहो, और या फिर लड़ते भिड़ते स्वयं भी मरो और सारे जीवन का ही नाश कर दो।
किसी ने ठीक ही कहा है कि बदलने का सही समय वह होता है जब बदलना आवश्यक तो प्रतीत होने लगे किन्तु अभी अनिवार्य न हुआ हो। क्योंकि जब बदलना अनिवार्य हो जाए तो प्रायः बहुत देर हो चुकी होती है। आज ऐसा हो समय आ पहुंचा है। बहुत से दूरदर्शी लोग साफ देख रहे हैं कि मानव यदि आत्मरूपान्तरण नहीं करेगा तो मानव जाति ही धरती से विलुप्त हो जाएगी । यह बात्मरूपान्तरण दिन प्रतिदिन अधिक से अधिक आवश्यक होता जा रहा है और जल्दी ही यह अनिवार्य भी हो जाएगा और उस समय बहुत देर हो चुकी होगी। अतः हम सब को यह काम आज से ही, बल्कि अभी से ही, प्रारम्भ कर देना है।
इस अंक के साथ आपकी यह 'विश्वज्योति' अपनी आयु के ४३ वें वर्ष में प्रवेश कर रही है और गत वर्षों की भान्ति इस बार भी इसके नव वर्ष का प्रारम्भ दो विशेषांकों के साथ हो रहा है।
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