भूमिका
भाद्रपद का प्रथम सप्ताह वर्ष में भीषण वर्षा का समय होता है। इस वर्ष अर्थात् विक्रम संवत् 2080 की वर्षा ऋतु में भी मेघ गर्जना कर रहे थे। भारतीय संस्कृति में मेघों की तुलना हाथियों से की गई है जो उचित ही है। वर्षा काल में जब मेघों की गर्जना होती है तब प्रतीत होता है कि हाथी चिंघाड़ रहे हों। वैसे तो गजराज जब वन में विचरण करते हैं तब वे अनेक कारणों से चिंघाड़ते हैं परन्तु उनकी एक चिंघाड़ जो दिगंत को कंपित कर देती है वह उस समय की होती है जब वे या तो किसी व्याघ्र को देख लेते हैं या फिर उसकी गंध ही प्राप्त कर लेते हैं। वनों में सामान्यतः व्याघ्र और हाथी एक दूसरे से कन्नी काटते रहते हैं। दोनों परम बलशाली हैं पर व्यर्थ में कभी नहीं उलझते । हम वर्षा ऋतु की इस झमाझम बारिश में व्याघ्र की चर्चा इसलिए करने लगे क्योंकि अन्य भारतीयों की तरह ही हमें भी व्याघ्र प्रिय है। देश का प्रतीक पशु व्याघ्न ही है। मुझे तो व्याघ्र इतना प्रिय है कि मैंने प्रकृति पर लिखी अपनी आघा दर्जन से अधिक पुस्तकों के कव्हर पृष्ठों में व्याघ्र के चित्र को वरीयता दी। मेरी अनेक पुस्तकों के भीतरी पृष्ठों पर व्याघ्र हैं। समकालीन भारत में बाघ इतना लोकप्रिय हैं कि समाचार पत्र 'टाइगर एन्थम' या व्याघ्र समूहगान' का आयोजन कर रहे हैं। इक्कीसवीं सदी के विकास की ओर तेजी से बढ़ते भारत में व्याघ्र के प्रति यह प्रेम मुझे हर्षित कर देता है। उस दिन अर्थात् गुरूवार को भी सुबह से ही बादल घिर आये थे, सूर्य का दर्शन पिछले तीन दिनों से नहीं हो रहा था। बारिश लगतार हो रही थी कभी छोटी बूंदों से तो कभी मूसलाधार बारिश कैसी भी हो रही हो जनजीवन का चक्र तो अपने ढंग से चलता ही रहता है। मैं अपने बरामदे में बैठा बरसात का आनन्द लेता कुछ बहुत पुरानी पत्रिकाओं को देख रहा था ये पत्रिकायें 'बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी' की थी। इस सोसाइटी का में वर्षों तक लाइफ मेम्बर रहा। कहने को तो 'लाइफ मेम्बरशिप पूरी लाइफ की होती है पर वैधानिक रूप से उसके वर्ष नियत होते है। में उन नियत वर्षों को भी अब दशकों पहले पार कर चुका हूँ। फिर भी जब तव फुरसत के वक्त जब इस पत्रिका के पुराने अंकों को देखता हूँ तब समय थम जाता है। यह वह वक्त या जब भारत में वन्य जीवनों के प्रति लगाव पैदा हो चुका था। ये लोग भी जो वनों में कभी कभार जा पाते इस पत्रिका के माध्यम से वन्य प्राणियों के संबंध में समकालीन वैज्ञानिक रूप से प्रस्तुत जानकारी प्राप्त कर सकते थे। उन दिनों भारत में रंगीन चित्रों बाली वन्य प्राणियों पर पहली पत्रिका 'बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी' ने ही प्रकाशित की थीं। इसका नाम था 'हार्नबिल' । यह चिकने पन्नों पर या आर्ट पेपर पर प्रकाशित होती थी इसमें वन्य प्राणियों के रंगीन और श्वेत श्याम चित्र हुआ करते थे। इस पत्रिका में लोक रंजक लेख हुआ करते थे। उन दिनों 'बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी' की इन दोनों पत्रिकाओं में से किसी एक में भी प्रकाशित होने का अर्थ पक्की तौर पर 'वन्य जीवन' में सक्रिय रूचि का प्रमाण था। इस पत्रिका में उस कालखण्ड के सभी स्थापित वन्य प्राणियों के विशेषज्ञों, छाया चित्रकारों और गहरी रूचि रखने वालों के विभिन्न प्रकार या वर्ग के आलेख हुआ करते थे। लेखक की आयु उन दिनों कम थी, इसलिए जब उसके द्वारा व्याघ्र पर लिखा हुआ एक लेख प्रकाशित हुआ तब उसके पैर जमीन पर नहीं पड़े। शायद उस लेख का ही प्रभाव था कि परवर्ती काल में जब प्रकृक्ति पर अध्ययन की प्रवृत्ति बढ़ी और प्रकाशन का समय आया तब लेखक ने अपनी पुस्तकों को जैकेट पर व्याघ्र को देखना पसन्द किया.
लेखक परिचय
शिवकुमार तिवारी (1941) जबलपुर में विश्वविद्यालयीन परीक्षायें (बी.ए., एम.ए.) विशेष योग्यता के साथ प्रथम श्रेणी में उत्र्तीण, नेशनल मैरिट स्कालरशिप, जैवभूगोल में शोधकार्य एवं डाक्टरेट की उपाधि। 25 वर्षों तक (1964 से 1990 तक) मध्यप्रदेश की महाविद्यालयीन सेवा में भूगोल विषय के सहायक प्राध्यापक एवं प्राध्यापक पदों पर रहकर शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालयों में अध्यापन कार्य। भूगोल, मानव विज्ञान, पर्यावरण, जनजातीय संस्कृति एवं चिकित्सा भूगोल पर अनेक ग्रन्य तथा अनेक शोध पत्र प्रकाशित। 13 वर्षों (1990 से 2003) तक रानीदुर्गावती विश्वविद्यालय में जनजाति अध्य्यन विभाग में अध्यक्ष के रूप में कार्यरत विश्वविद्यालय में कार्य करते हुये 12 पीएच.डी. शोध कार्यों का सफल निर्देशन। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, भारतीय सामाजिक विज्ञान परिषद् तथा मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी परिषद जैसी संस्थाओं के द्वारा प्रायोजित क्षेत्रीय शोध प्रोजेक्ट्स के निदेशक। भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा अनुदान प्राप्त क्षेत्रीय शोध प्रोजेक्ट्स के निदेशक। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की शाखा जनजातीय आयुर्विज्ञान शोध संस्थान के मानद सदस्य। उन्होंने तीन विश्वकोशों की भी रचना की जिनमें से दो पर्यावरण विषय पर तथा एक भारतीय जनजातियों से संबंधित है। उनके द्वारा लिखा 'भारतीय वन्य प्राणियों के संरक्षित क्षेत्रों का विश्वकोश हिन्दी भाषा का पहला एवं अनूठा विश्वकोश है। उनके द्वारा रचित साठ ग्रंथ प्रकाशित हैं। डा. शिवकुमार तिवारी, मध्यप्रदेश शासन के द्वारा शोध परक साहित्य सृजन के लिये 'डा. शंकर दयाल शर्मा सृजन सम्मान- 2006' से सम्मानित है
पुस्तक परिचय
'व्याघ्रकुलआख्यान' भारत के राष्ट्रीय पशु बाघ या व्याघ्र (Panthera tigris), पर केन्द्रित मौलिक रूप से हिन्दी भाषा में लिखा गया ग्रंथ है। भारत के करोड़ों हिन्दी भाषी व्याघ्र तथा उसके कुल के अन्य वन्य पशुओं के प्रेमी हैं। परन्तु जब भारत में रहते हुए अपने राष्ट्रीय पशु के संबंध में वे कुछ मौलिक पढ़ना चाहते हैं तब उन्हें अंग्रेजी में लिखने पढने की बाध्यता से जूझना पड़ता है। विदेशी भाषाओं में व्याघ्र पर प्रचुर साहित्य है। पारंपरिक भारतीय साहित्य की शैली में व्याघ्रकुल पर लिखकर इस ग्रंथ द्वारा अपने देश के वन्य प्राणियों में रूचि रखने वाले हिन्दी भाषा भाषी पाठकों को उनकी अपनी भाषा में रचना देने का एक प्रयास किया गया है। इस प्रयास में प्रगति पथ पर बढ़ते उस आधुनिक भारत की अदम्य जाग्रत मानसिकता को भी चित्रित किया गया है जिसने विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुकी व्याघ्र संख्या को विश्व की सबसे विशाल व्याघ्र संख्या में परिवर्तित किया, तथा जिसने व्याघ्र संरक्षण के क्षेत्र में भारत को विश्व का सरताज देश बनाया ।
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