प्राक्कथन
वर्तमान समय में जहाँ राजनीतिक व सामाजिक क्षेत्र में अस्थिरता, बिखराव, सांप्रदायिकता, जातिवादी संकीर्णता का साम्राज्य है, सांस्कृतिक प्रदूषण बढ़ रहा है, उस समय ऐसी चिंतनधारा व व्यवस्था से परिचित होना प्रासांगिक होगा, जो युग-युग से भारतीय जीवन को दिशा देती आ रही हो, जिसने प्राचीन भारतीय समाज व राज्य को गत्यात्मकता प्रदान की हो। आज आवश्यकता है एक समन्वयात्मक प्रवृत्ति व सापेक्षिक दृष्टिकोण के विकास की व अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति प्रेम की। प्राचीन भारतीय समाज व राज्य का लक्ष्य व्यक्ति की चहुँमुखी उन्नति करना था। व्यक्ति के विकास की भावना से प्रेरित होकर ही धर्मशास्त्रकारों ने समाज व राज्य को दिशा-निर्देश देने हेतु बहुत से नियमों का निर्माण किया। ये नियम कठोर या जड़ नहीं थे वरन् देश व काल की परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तनशील थे । प्राचीन भारत में धर्मशास्त्रीय परंपरा के ग्रंथों में स्मृतियों का प्रमुख स्थान है। प्राचीन भारतीय समाज व राज्य-व्यवस्था को जानने के ये प्रमुख स्रोत है। इनकी संख्या लगभग बीस है लेकिन इनमें मनु व याज्ञवल्क्य की स्मृतियाँ ही महत्त्वपूर्ण मानी जाती हैं। मनुस्मृति के बाद याज्ञवल्क्य स्मृति की गणना की जाती है। यह मनुस्मृति से अधिक सुगठित है व इसमें व्यर्थ का पुनरुक्ति दोष नहीं आया है। याज्ञवल्क्य स्मृति के एक ही श्लोक में इतना सार है कि वह मनुस्मृति के दो श्लोकों के बराबर है। विष्णुधर्मसूत्र व कौटिल्य के अर्थशास्त्र से इसमें बहुत समानता है। याज्ञवल्क्य अर्थशास्त्रीय परंपरा के अधिक निकट हैं। यह स्मृति तब लिखी गयी थी जब म्लेच्छों का प्रभुत्व था, फिर भी इसमें म्लेच्छों के प्रति कटुता का भाव नहीं दिखायी देता। याज्ञवल्क्यस्मृति वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लिखा गया ग्रंथ है, लेखक के पक्षपातरहित दृष्टिकोण के कारण ही इस ग्रंथ को संपूर्ण भारत में मान्यता प्राप्त हुई । मानवीय समाज मात्र शरीरों का समूह व गतिहीन नहीं है वरन् वह विभिन्न सामाजिक समूहों को अंतःक्रिया के अनुरूप परिवर्तनशील व गतिमान है। स्मृति साहित्य में समाज में आये विभिन्न परिवर्तनों को समाज कल्याण हेतु स्वीकारा गया है। याज्ञवल्क्य इस बात से पूर्णतः परिचित थे कि व्यक्ति सामान्यतः अपराध वृत्ति में लिप्त हो सकता है, उन्होंने विभिन्न प्रकार के अपराधों की विस्तृत व्याख्या की है। व्यक्ति के नैतिक व चारित्रिक पक्ष को उत्कृष्ट बनाने हेतु विभिन्न प्रकार के संस्कारों व प्रायश्चितों की व्यवस्था की है। व्यक्ति की मानसिकता, शुद्धता व संतुलन बनाए रखने के प्रयास किए गए है। व्यक्ति को सत्कर्मों की ओर प्रेरित करने की कोशिश की गयी है व इसके लिए कर्म व पुनर्जन्म के सिद्धान्त व धर्म की विस्तृत व्याख्या की गयी है। याज्ञवल्क्य ने अपने समय की परिस्थितियों के अनुरूप समाज व राज्य व्यवस्था में परिवर्तनों को स्वीकारा। वे कई स्थलों पर मनु से अलग हैं। एक विधिवेत्ता के रूप में उन्हें सामाजिक समस्याओं का हल निकालने वाले का दर्जा दिया जा सकता है। विदेशी जातियों व जनजातियों को समाज में शामिल किया गया व कई नवीन जातियाँ अस्तित्व में आयीं। अनुलोम व प्रतिलोम विवाहों से उत्पन्न संतानों को भी समाज के अंदर समाहित किया गया। उन्हें सामाजिक स्वीकृति मिलने लगी थी। समाज में वर्णगत संकीर्णता का अभाव था, परस्पर सामंजस्यता व सौहार्दता विद्यमान थी। याज्ञवल्क्य-स्मृति में जातिगत कठोरता नहीं दिखायी देती व शूद्रों के उच्च आर्थिक स्तर का बोध होता है। स्त्रियों की स्थिति में सुधार दिखायी देता है। याज्ञवल्क्य ने स्त्री को सांपत्तिक व्यक्तित्व प्रदान किया। याज्ञवल्क्य उस स्थिति में स्वयंवर प्रथा का समर्थन करते हैं जब परिवारजन विवाहयोग्य कन्या का विवाह न करें। मनु ने जहाँ नारी को विवादास्पद बना दिया था वहीं याज्ञवल्क्य ने उन्हें पवित्र व ईमानदार बताया है। उसे सार्वजनिक समारोहों में भाग लेते दिखाया गया है। "पुनर्भू" स्त्रियों के उल्लेख से विधवा विवाहों के प्रचलन व स्वीकृति का बोध होता है। सती प्रथा का प्रचलन समाज में नहीं था। याज्ञवल्क्य द्वारा प्रतिपादित विधि की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। याज्ञवल्क्य द्वारा प्रदत्त व्यवहार के वर्गीकरण व आधुनिक हिन्दू विधि में काफी साम्य है। याज्ञवल्क्य के राजधर्म विषयक विचार अर्थशास्त्र से समानता रखते हैं। उन्होंने लोककल्याणकारी राजतंत्र का समर्थन किया है। प्रशासन में वे विक्रेन्द्रीकरण की नीति पर जोर देते हैं।
लेखक परिचय
डा. श्रीमती कमलेश शर्मा (भारद्वाज) वर्धमान महावीर गुला विश्वविद्यालय, कोटा के इतिहास व संस्कृति एवं परंपरा विभाग की सेवानिवृत्त आचार्य एवं विभागाध्यक्ष है। इन्होंने महारानी कॉलेज से थी. ए. आनर्स, इतिहास एवं भारतीय संस्कृति विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर से एम.ए. एम. फिल व पीएच. डी. की उपाधियाँ प्राप्त की। इनके 70 से अधिक शोधपूर्ण लेख विविध राष्ट्रीय राष्ट्रीय एवं एवं अंतर्राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में छप चुके है। समसामयिक विषयों पर लेखन, कविता- कहानियों कहानियों के लेखन में सक्रिय है। 100 से अधिक राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों, कार्यशालाओं आदि में सहभागिता की। 10वें ऐशियन एसोसिएशन ऑफ ओपन यूनिवर्सिटीज के तेहरान (ईरान) में आयोजित सम्मेलन में भाग लिखा। दूरस्थ शिक्षा परिषद, नई दिल्ली की शोध परियोजना पर कार्य किया। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अध्यापन व शोध का 40 वर्षों का अनुभव है। विश्वविद्यालय के प्रशासनिक पदों पर कार्य का 15 वर्षों का अनुभव है। शोध प्रकोष्ट के निदेशक व प्लानिंग एवं डवलपमेंट विभाग के निदेशक के रूप में भी कार्य किया है। महिला अध्ययन केन्द्र की समन्वयक के साथ दूरस्थ शिक्षा परिषद की नोडल अधिकारी भी रही है। सांस्कृतिक प्रभारी के रूप में विभिन्न शैक्षणिक व सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन करवाया। 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान चलाकर हजारों विद्यार्थियों को कन्या भ्रूण हत्या रोकने व महिला सम्मान की शपथ दिलायी गयी। इनकी शैक्षणिक व प्रशासनिक उत्कृष्टता के लिए शिक्षा रत्न पुरस्कार प्रदान किया गया। विभिन्न संस्थाओं द्वारा भी सम्मानित किया जा चुका है। सेवानिवृत्ति के बाद कोटा विश्वविद्यालय कोटा, एमिटी यूनिवर्सिटी, जयपुर, एस.के. डी. यूनिवर्सिटी, हनुमानगढ़ में भी अध्यापन व शोध के क्षेत्र में सक्रिय है। लेखिका आई.एच.सी. (इंडियन हिष्ट्री कांग्रेस), आर. एच.सी. (राजस्थान हिस्ट्री कांग्रेस), ए ए.ओ.यू. (एशियन एसोसियेशन ऑफ ओपन यूनिवसिटीज), आई.एस.टी.डी. (इंडियन सोसाइटी ऑफ ट्रेनिंग एवं डवलपमेंट), पुस्तक भारती टोरंटो, कनाडा की सदस्य है। इनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं प्राचीन भारत भाग, एक, प्राचीन भारत भाग-2 (छटा संस्करण), भारतीय संस्कृति के मूलाधार (द्वितीय संस्करण), प्राचीन भारत में समाज एवं राज्य व प्राचीन भारत में राजनीतिक व विधिक विचार। लेखिका की विशेषज्ञता व रूचि के क्षेत्र हैं विश्व इतिहास, प्राचीन भारतीय इतिहास व संस्कृति, राजस्थान का इतिहास, संस्कृति, परंपरा व धरोहर, यात्रा व पर्यटन, संस्कृत साहित्य (वेद, महाकाव्य, पुराण, स्मृतियाँ आदि), महिला विमर्श व पर्यावरण। संप्रतिः- शोध कार्य एवं लेखन के अतिरिक्त विभिन्न शैक्षणिक एवं सामाजिक गतिविधियों में संलग्न ।
पुस्तक परिचय
प्राचीन भारतीय इतिहास व संस्कृति के जानकारी के प्रमुख स्त्रोत स्मृतियाँ हैं। इनमें प्राचीन भारतीयों के धर्म, दर्शन, समाज, राज्य, विधि, दण्ड, न्याय, आयुर्वेद, ज्योतिष, शरीर संरचना, पर्यावरण आदि की जानकारी मिलती है। धर्मशास्त्रकारों ने सामंजस्यपूर्ण समाज व लोककल्याणकारी राज्य का चित्रण किया है। समाज व राज्य दोनों का ही दायित्व मात्र व्यक्ति की इहलौकिक व भौतिक प्रगति करना ही नहीं था वरन् उसके पारलौकिक व आध्यात्मिक जीवन को भी श्रेयस्कर बनाना था। ये दोनों व्यक्ति के चार पुरूषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) रूपी साध्य को पाने के साधन थे। प्रस्तुत ग्रंथ को प्राचीन विचारों, सिद्धांतों व परपंराओं का दर्पण कहा जा सकता है। वर्तमान भारत की बहुत-सी समस्याओं का हल अतीत के प्रतिबिम्ब में तलाशा जा सकता है। भारतीय समाज, राष्ट्र व संस्कृति के क्षेत्र में लेखिका के (इस ग्रंथ के द्वारा प्रदत्त) योगदान को नकारा नहीं जा सकता। उन्होंने अथक परिश्रम व ईमानदारी से धर्मशास्त्रकारों के विचारों की व्याख्या की है और तदनुरूप प्राचीन भारतीय समाज व राज्य के स्वरूप को दर्शाने की चेष्टा की है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य के आधार पर उनका मूल्यांकन करने के लोभ से भी स्वयं को नहीं रोक पायी है। ग्रंथ का प्रत्येक अध्याय रोचकता लिए हुए है। इतिहास, विधि, संस्कृत, समाजशास्त्र, संस्कृति, राजशास्त्र में रुचि रखने वाले अध्येताओं व शोधकर्ताओं और विश्वविद्यालय के अध्यापकों के लिये यह ग्रंथ निश्चय ही उपयोगी व रुचिकर सिद्ध होगा।
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