हिन्दी के विशिष्ट व्यंग्यकार शरद जोशी की 101 नयी व्यंग्य-रचनाओं का संग्रह है यत्र तत्र सर्वत्र। भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित उनकी अन्य दो रचनाएँ हैं- यथासम्भव और हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे। यत्र तत्र सर्वत्र की रचनाएँ एक बार फिर यह बताती हैं कि शरद जोशी अपने चिन्तन और लेखन के स्तर पर व्यापक मानवीय सरोकारों के साथ कितनी संवेदनशीलता और बौद्धिक सघनता से जुड़े हुए थे।
समकालीन जीवन और समाज की तमाम समस्याओं और विसंगतियों पर तीखी चोट करनेवाली इन व्यंग्य-रचनाओं में एक सिद्धहस्त व्यंग्यकार की बहुत-कुछ तोड़ने और बनाने की भीतरी छटपटाहट भी है। इनमें प्रेम, सौन्दर्य, साहित्य, राजनीति, भाषा, पत्रकारिता, अध्यात्म, नैतिकता आदि तमाम विषय-सन्दर्भों पर शरद जी की बेलौस और बेधक प्रतिक्रियाएँ हैं।...
यह कहा जा सकता है कि यत्र तत्र सर्वत्र शरद जोशी के विशाल पाठक-वर्ग के साथ ही व्यंग्य-साहित्य के सभी पाठकों के लिए, निस्सन्देह, एक उपलब्धि है।
प्रबुद्ध, स्वतन्त्र और बेबाक पत्रकार एवं व्यंग्यकार शरद जोरी का जन्म 21 मई, 1931 को उज्जैन, म.प्र. में हुआ था। पत्रकारिता, आकाशवाणी और सरकारी नौकरी के बाद उन्होंने लेखन को ही अपना जीवन बना लिया। 'नई दुनिया' से उन्होंने लेखन की शुरुआत की। 1980 में 'हिन्दी एक्सप्रेस' के सम्पादन का दायित्व सँभाला। बाद में 'नवभारत टाइम्स' में दैनिक व्यंग्य लिखकर वे देशभर में चर्चित हो गये। गद्य (व्यंग्य) को कविता की तरह पढ़कर कवि-सम्मेलनों में मंच लूटने की भी उन्होंने महारत हासिल की।
शरद जोशी की प्रमुख कृतियाँ हैं-जीप पर सवार इल्लियाँ, रहा किनारे बैठ, मेरी श्रेष्ठ रचनाएँ, पिछले दिनों, किसी बहाने, परिक्रमा, यथासम्भव, हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे और प्रस्तुत कृति यत्र तत्र सर्वत्र। अन्तिम तीन व्यंग्य-संग्रह भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हैं। कुछेक व्यंग्य-नाटक भी चर्चित और मंचित हुए हैं।
1989 में भारत सरकार ने उन्हें 'पद्मश्री' से अलंकृत किया ।
5 सितम्बर, 1991 को मुम्बई में उनका देहावसान हो गया।
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