पुस्तक के इस द्वितीय संस्करण में "योग के ग्रन्थ II" अध्याय को शामिल किया गया है। इस अध्याय में योगोपनिषद् के अन्तर्गत आने वाले 8 उपनिषदों को सम्मिलित करते हुए पाठ्यक्रम के अनुसार विषय वस्तु की व्याख्या और उनसे सम्बंन्धित बहुविकल्पीय प्रश्नों को पूछा गया है। पाठ्यक्रम में सम्मिलित सभी उपनिषदों की विषय वस्तु का एक ही स्थान पर संकलन और साथ ही साथ प्रश्नों में स्पष्टता लाने के लिए वहुविकल्पीय प्रश्न काफी सहायक होंगे।
अध्याय पंचम "हठयोग के ग्रन्थ' को दो भागों में बाटा गया है। प्रथम (अ) भाग में प्रमुख सभी हठयोगिक ग्रन्थों का परिचय और द्वितीय (ब) भाग में हठप्रदीपिका और घेरण्ड संहिता में वर्णित हठयोग के तत्त्व और उनकी अवधारणाओं का उल्लेख करते हुए उनमें तुलना की गयी है। इस प्रकार यह अध्याय हठयोगिक ग्रन्थों की मूलभूत अवधारणाओं को समझने एवं उनमें समानता और असमानता की स्पष्टता लाने में बहुत उपयोगी सिद्ध होगा।
द्वादश अध्याय में योग विषय की प्रथम यू.जी.सी. परीक्षा से लेकर दिसम्बर 2023 तक में पूछे गये प्रश्नों को उत्तर सहित दिया गया है। पुस्तक के अंत में शामिल यह प्रश्न बैंक परीक्षार्थियों के लिए बहुत सहायक होगा।
मेरे विचार से किसी भी प्रतियोगिता में सफलता के लिए उसके पाठ्यक्रम की अवधारणों का सम्यक ज्ञान होना आवश्यक है। यदि उनकी अवधारणाएं स्पष्ट नही तो मात्र बहुविकल्पीय प्रश्नों को रट कर सफलता प्राप्त करना मुश्किल है। उदाहरण के लिए यदि हम योग दर्शन में उल्लेखित प्रकृति की अवधारणा को ही ले, तो प्रकृति परिणामी है, क्योंकि इसके परिणाम स्वरूप महत् से लेकर महाभूतों तक के समुदाय का परिणाम होता है। प्रकृति सक्रिय है, क्योंकि त्रिगुणों में सदैव सक्रियता बनी रहती हैं। यह नित्य है क्योंकि न इसकी उत्पत्ति होती है, और न ही यह अपने अस्तित्व के लिए किसी पर निर्भर है। योगदर्शन सत्कार्यवादी होने के कारण प्रकृति के सभी तत्त्व उत्पत्ति से पूर्व अपने कारण में सत् थे और तिरोभाव की अवस्था में भी ये नष्ट न होकर अपने कारण में विलीन हो जाते हैं।
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