प्राकथन
कुछ वर्ष हुए मैंने 'बच्चों की देखभाल' नामक पुस्तक लिखी थी। वह प्रायः दस-बारह वर्ष तक के बच्चों के पालन-पोषण के सम्बन्ध में थी। यह पुस्तक वारह वर्ष के ऊपर के युवकों के सम्बन्ध में लिखी गई है। माता-पिता और अध्यापक कई बार बच्चों और युवकों की मनोवृत्ति को ठीक प्रकार न समझने के कारण कई प्रकार की भूलें कर बैठते हैं जिनका दुष्प्रभाव आसानी से दूर नहीं किया जा सकता इस पुस्तक में युवकों के शारीरिक और मानसिक विकास पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है। इस ज्ञान के आधार पर माता पिता को अपनी युवक सन्तान के प्रति किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिये, यह भी भलीभांति बता दिया गया है। कुछ माता-पिता अज्ञानतावश अपने युवक लड़कों के प्रति छोटे बच्चों के सदृश ही व्यवहार करते हैं जिसका परिणाम प्रायः यह होता है कि युवक स्वतन्त्र जीवन बिताने के योग्य नहीं बन पाते। उनमें आत्म विश्वास उत्पन्न ही नहीं होता और काम लेते रहे हैं तो जाती है। प्रति दिन यदि उनके माता-पिता अधिक कठोरता से उनकी अपने घरवालों से ग्लानि सी हो रेडियो पर किसी न किसी युवक के घर से भाग जाने की सूचना मिलती रहती है। यह इस बात की द्योतक है कि उन युवकों के माता-पिता से अपने युवक लड़कों के पालन-पोषण में अवश्य भयंकर भूल हो गई है। आशा है, इस पुस्तक को पढ़ कर युवकों और उनके माता-पिता को पर्याप्त मात्रा में ज्ञान प्राप्त हो जायगा जिससे दोनों को लाभ होगा । पिछले चार-पांच अध्यायों में जीवन-सम्बन्धी आदर्शों और अन्य आवश्यक बातों पर लिखा गया है। युवक पाठकों को विशेषकर उनको बड़े ध्यान से पढ़ना चाहिये ।
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