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1950 का दशक: भारतीय गणतंत्र का अभ्युदय- 1950 Ka Dashak: Bhartiya Gantantra Ka Abhyudaya

$33
Includes any tariffs and taxes
Specifications
Publisher: Oxford University Press
Author Gyanesh Kudaisya
Language: Hindi
Pages: 203 (With B/W Illustrations)
Cover: PAPERBACK
8x5 inch
Weight 170 gm
Edition: 2022
ISBN: 9780190131562
HCC584
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Book Description

प्रस्तावना

भारत के समकालीन इतिहास के व्यापक परिदृश्य में 1950 के दशक को कैसे देखा जाये? इसकी अवधि तय करने के लिए बड़ा कालखंड बनाना ज्यादा उपयोगी होगा। अगस्त 1947 में आज़ादी और विभाजन को इसका शुरुआती बिंदु और अक्टूबर-नवंबर 1962 में भारत-चीन संघर्ष को इसका अंतिम बिंदु माना जा सकता है। इस तरह का अपारंपरिक कालविभाजन हमें एक ही आख्यान के भीतर उन विराट चुनौतियों को देख सकने की सहूलियत देता है, जिनका सामना एक नव-स्वतंत्र देश के रूप में भारत अपने शुरुआती वर्षों में कर रहा था। इससे यह भी समझने में मदद मिलेगी कि उस समय के राजनीतिक नेतृत्व की क्या दुविधायें थीं, उन्होंने किन रास्तों का चुनाव किया या किन रास्तों का चुनाव नहीं किया। इससे हम उन अनिश्चित और धीमे तरीकों पर भी विचार कर सकेंगे जिनसे राजनीतिक संस्थानों और राजनीतिक प्रक्रियाओं को मजबूत बनाया गया।

'1950 का दशक : भारतीय गणतंत्र का अभ्युदय', 1947 से 1962 के बीच होने वाले महत्वपूर्ण बदलावों की कहानी है। इस दौर के संक्रमणों, बदलावों और उपलब्धियों के आधार पर कहा जा सकता है कि यह बीसवीं शताब्दी के भारत की दिशा तय करने के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण दौर था। यह पुस्तक अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना कर रहे एक नये राष्ट्र की आकांक्षाओं, हताशाओं और दुविधाओं का अंदाजा देने की कोशिश करती है। आज हम जिस भारत को जानते हैं, उसे गढ़ने में उस समय व्यक्त किये गये विचारों और चुने व तय किये गये रास्तों की बहुत निर्णायक भूमिका है। उस निर्णायक दशक के मूल्यों और व्यक्तित्वों को भारत के सार्वजनिक जीवन में आज भी उदाहरण और मानक के बतौर देखा जाता है।

आगे के पृष्ठों में 'नियति से साक्षात्कार' की ओर बढ़ते देश की एकरेखीय जीवनी नहीं है। यह भारत में लोकतंत्र की सफलता का गदगद आख्यान भी नहीं है। यहां पेश आख्यान बहुत उदार है और कुछ खास विषयों के इर्द-गिर्द कहानी गढ़ने की कोशिश करता है। 1950 का दशक तीखे और अप्रत्याशित मोड़ों वाला समय है। इस दौर के कुछ आंदोलन आगे ले जाने वाले थे तो कुछ पीछे ले जाने वाले भी थे। इस दौर में भविष्य को लेकर अनिश्चितता थी।

नृतत्वशास्त्री क्लिफर्ड गीर्ट्ज ने एशिया और अफ्रीका के नव-स्वतंत्र देशों की राजनीति का सर्वेक्षण किया था। इस किताब में उन्हीं के निष्कर्षों के आधार पर कहा गया है कि भारत के लिए 1950 का दशक 'एकीकरण का क्षण' था। गीर्ट्ज ने कहा है कि इन देशों के सामने नयी नागरिक अस्मिता के निर्माण में कई गंभीर बाधायें थीं। पहले से मौजूद नागरिक अस्मितायें नये बने 'राष्ट्र' से बहुत पुरानी थीं। वे नयी तरह की उभरती हुई राजनीति पर दबाव डाल रही थीं कि उन्हें मान्यता दी जाये। गीर्ज के विचारों को आगे बढ़ाते हुए यह किताब 1950 के दशक में भारत के सामने मौजूद इन्हीं चुनौतियों की पड़ताल करती है। 1950 के दशक के भारत के बारे में विचार करते हुए कोई भी भारतीयता के धुंधले से विचार और गहरी जड़ों वाली पहले से मौजूद अस्मिताओं के बीच के तनाव से दो-चार होता है। जाहिर है बहुत से लोगों के लिए धार्मिक अस्मितायें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण थीं। आजादी के बाद हिंदू राष्ट्रवादियों ने एक ऐसे राष्ट्र का विचार पेश किया जो हिंदू सांस्कृतिक नैतिकता से निर्मित हुआ था। पाकिस्तान बनने के बाद छोटा अल्पसंख्यक समूह रह गये मुस्लिम समुदाय के लोग अपनी अलग पहचान की रक्षा को लेकर चिंतित थे। सिख, ऐंग्लो-इंडियन और पारसी भी ऐसी ही चिंताओं से घिरे हुए थे।

तमिल, तेलुगू, पंजाबी और मराठी भाषी 'क्षेत्रीय अस्मिताओं' ने बहुत जोरदारी से भारत को भाषायी राज्यों के रूप में पुनर्गठित करने की मांग रखी। 1950 के दशक में क्षेत्रीय अस्मितायें इतनी आक्रामक थीं कि भारत का विचार ही खतरे में पड़ गया था। राष्ट्रभाषा और राजभाषा के चुनाव को लेकर तनाव, हिंदी को लेकर कड़वाहट, साझेपन की जुबान हिंदुस्तानी को खारिज करना, उर्दू के बारे में गहरा संदेह और क्षेत्रीय भाषाओं की जगह अंग्रेजी को राजभाषा बनाये रखने के बारे में अनिच्छा के बावजूद समझौता- ये सब एक दूसरे से असंबद्ध घटनायें नहीं थीं। साथ ही ब्राह्मण, राजपूत, नायर, दलित जैसी बहुतेरी जाति आधारित अस्मितायें भी थीं और अपने को राजनीतिक तौर पर अभिव्यक्त भी कर रही थीं। 1950 के दशक में संविधान और चुनाव दोनों ही स्तरों पर इन अस्मिताओं की आक्रामक ढंग से अभिव्यक्ति हुई।

राष्ट्र के विचार के पहले से मौजूद इन अस्मिताओं के बीच तीखा संघर्ष शुरू हो गया। अक्सरहां ये संघर्ष बनती हुई 'राष्ट्रीय' अस्मिता के खिलाफ नहीं थे। बल्कि वे राष्ट्रीय अस्मिता के साथ एकीकरण और उसमें समाहित होने के लिए संघर्ष कर रहे थे। 1950 के दशक का ज्यादातर राजनीतिक नाटक नये राष्ट्र की नागरिकता के विचार के साथ मोलभाव, उसमें अपनी जगह बनाने और एकीकरण के इर्द-गिर्द खेला जा रहा था। इस पुस्तक का तर्क है कि 1950 के महत्वपूर्ण दशक के इसी 'एकीकरण के क्षण' ने नये राष्ट्र के रूप में भारत के जन्म के बाद उसके जीवित बने रहने और राष्ट्र के रूप में उसके लचीलेपन को बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

ऊपर बताये गये संघर्षों ने खुद को राजनीति के क्षेत्र में अभिव्यक्त किया। इसलिए यह किताब सामाजार्थिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को संज्ञान में लेने के बावजूद मुख्य रूप से राजनीतिक घटनाओं और परिवर्तनों पर केन्द्रित है। इस किताब की कुछ और सीमायें भी गिनायी जा सकती हैं। जैसा कि पहले भी संकेत किया जा चुका है कि यह किताब 1950 के दशक के भारत का विस्तारित और सूक्ष्म-इतिहास नहीं है। बल्कि यह पाठक के सामने कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों की व्याख्या करने के साथ बहुत मोटे ब्रश से बनाया गया चित्र पेश करती है। साथ ही इस 'एकीकरण के क्षण' की व्याख्या भारत की घरेलू राजनीति की घटनाओं के आधार पर की गई है। इसलिए यह किताब इस दौर में भारत के विदेश संबंधों के बारे में बात नहीं करती है।

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