प्रस्तावना
एकात्म मानवदर्शन : पुनरुत्थानशील भारत के लिए एक सांगोपांग दृष्टि
भारतीय चिंतन परंपरा में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानवदर्शन अद्वितीय और मौलिक स्थान रखता है। यह वह वैचारिक आधारशिला है, जिसने राजनीति और अर्थनीति को जन-कल्याण के व्यापक उद्देश्य से जोड़ने का अभिनव मार्ग प्रशस्त किया है। जब हम इस चिरस्थायी विचारधारा की 60वीं वर्षगाँठ मना रहे हैं, तो इसकी शाश्वत प्रासंगिकता की पुष्टि होती है कि आज भी एकात्म मानवदर्शन भारत की शासन व्यवस्था और नीति-निर्माण प्रक्रियाओं में एक जीवंत और मार्गदर्शक शक्ति के रूप में कार्य करते हुए राष्ट्र उत्थान को दिशा प्रदान कर रहा है।
वैचारिक नेतृत्व से राष्ट्रीय संकल्प तक
दीनदयालजी केवल एक राजनीतिक चिंतक ही नहीं थे, बल्कि एक सशक्त संगठनकर्ता और दूरदर्शी नेता भी थे। वे उन असाधारण व्यक्तित्वों में से थे, जो नेतृत्व, वैचारिकी और संगठन क्षमता तीनों को एकीकृत करते थे। अल्प समय में भारतीय जनसंघ को एक राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक पार्टी का स्वरूप देना और वैचारिक बीजारोपण करना, उनकी समन्वित प्रतिभा का परिणाम था। उनके असामयिक निधन के बावजूद, उन्होंने जो विचार बोया, वह आज भारतीय राजनीति में एक स्थायी और प्रभावशाली धारा के रूप में अक्षय विकास की ओर अग्रसर है।
बीसवीं सदी के मध्य में, जब भारतीय बौद्धिक क्षेत्र पर पश्चिमी विचारधाराओं-समाजवाद, पूँजीवाद एवं साम्यवाद का प्रभुत्व था, तब दीनदयालजी ने भारतीय मूल्यों, परंपराओं और जीवन दृष्टि के आधार पर नीति, न्याय और विचार का भारतीय मॉडल प्रस्तुत किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत को अपनी समस्याओं का समाधान अपनी सांस्कृतिक स्मृति और सामाजिक संरचना के अनुरूप ही ढूँढ़ना होगा। इस संदर्भ में उन्होंने एकात्म मानवदर्शन को केवल वैचारिक वक्तव्य नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक और समग्र विकास मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया। इस आधारभूत दर्शन के माध्यम, जिसमें व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और प्रकृति का सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व भी सम्मिलित है।
भारत जैसे विविधतापूर्ण राष्ट्र को एक केंद्रीकृत शासन प्रणाली से नहीं चलाया जा सकता। दीनदयालजी ने विकेंद्रीकरण पर बल देते हुए यह स्पष्ट किया था कि भारत जैसे देश को स्थानीय आवश्यकताओं और सामर्थ्य के आधार पर योजनाएँ बनानी होंगी। आज यह विचार व्यवहार में उतर रहा है। शासन प्रणाली हो या विकास सूचकांक, भारत अब पश्चिमी मानकों की नकल नहीं कर रहा, बल्कि अपने सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक संदर्भों में भारतीय मानकों को स्थापित कर रहा है। यह आत्मनिर्भर भारत है, जो दीनदयालजी के स्वदेशी दृष्टिकोण से प्रेरित है।
प्राक्कथन
मैं सबसे पहले यह स्पष्ट करना चाहूँगा कि 'इंटीग्रल ह्यूमेनिज्म' (Integral Humanism) को 'एकात्म मानवदर्शन' का उचित अनुवाद नहीं माना जा सकता है। वस्तुतः अंग्रेजी भाषा हमारी चेतना, हमारी दर्शन परंपरा, हमारी संस्कृति तथा हमारी जीवन पद्धति को संपूर्णता में अभिव्यक्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है, किंतु वैश्विक संवाद के लिए अंग्रेजी का प्रयोग आज अपरिहार्य हो गया है। साथ ही, भारत में भी अनेक क्षेत्रों जैसे कि प्रशासन, शिक्षण संस्थान एवं सामान्य बौद्धिक विमर्श में अंग्रेजी शिक्षित वर्ग की प्रमुखता है। इसलिए हमें अपनी जीवन पद्धति व दृष्टिकोण को समझाने या संप्रेषित करने हेतु यथासंभव, इसी भाषा का सहारा लेना पड़ता है।
एकात्म मानवदर्शन ने सन् 1990 के दशक में स्वदेशी आंदोलन को मार्गदर्शन प्रदान किया
स्वयं भारत, उसका समाज एवं अर्थव्यवस्था संबंधी मेरा सम्यक् बोध स्वदेशी जागरण मंच (SJM) के कार्यकर्ता के रूप में प्राप्त अनुभवों से उपजा है। पूज्य श्री दत्तोपंत ठेंगड़ीजी ने पश्चिमी जगत् के वैश्वीकरण संबंधी महत्त्वाकांक्षी अभियान के प्रत्युत्तर में इस मंच की स्थापना की थी। लगभग दो दशकों तक विशेषकर सन् 1990 के आरंभिक काल से स्वदेशी आंदोलन में मेरी अर्थपूर्ण भागीदारी को दीनदयालजी द्वारा प्रतिपादित 'एकात्म मानवदर्शन' ने ही प्रेरित किया और दिशा दी।
दीनदयालजी ने अपने विचारों में भारतीय सभ्यता की उस शाश्वत जीवन शक्ति का साकार रूप प्रस्तुत किया था, जो स्वतंत्रता-प्राप्ति के दशकों बाद भी हमारे बौद्धिक विमर्श से गायब थी। स्वदेशी आंदोलन के माध्यम से मुझे एकात्म मानवदर्शन को बौद्धिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से समझने और देखने का अवसर मिला। स्वदेशी जागरण मंच के दिनों में स्वदेशी विकास मॉडल के अध्ययन के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि दीनदयालजी का चिंतन सिर्फ एक सिद्धांत नहीं था, बल्कि धरातल पर चलने वाली जीवंत वास्तविकता का प्रतिबिंब था। सन् 1992 से 2009 तक देश भर में फैले 40 से अधिक ऐसे उद्यमिता आधारित समुदायों का गहन अध्ययन और भ्रमण करने के दौरान मैंने बार-बार अनुभव किया कि दीनदयालजी के विचार केवल दर्शन नहीं हैं, बल्कि हमारे समाज का कार्यशील व्याकरण है। परिवार, समुदाय, समाज, राष्ट्र, विश्व और अंततः संपूर्ण सृष्टि इन सबकी परस्पर एकता, जिसे दीनदयालजी ने व्यष्टि, समष्टि, सृष्टि और परमेष्ठि के रूप में समझाया था, जो मुझे प्रथम बार पढ़ने पर अमूर्त लगी, परंतु मेरी यात्राओं से प्राप्त अनुभवजन्य साक्ष्यों के माध्यम से ठोस और स्पष्ट हो गई। मैंने व्यावहारिक रूप से समझा कि व्यष्टि व्यक्ति है और समष्टि वह समग्र समूह है, जिसमें परिवार से लेकर वैश्विक समाज तक सभी आते हैं।
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