भूमिका : 21वीं सदी का वैश्विक परिदृश्य एक ओर विज्ञान, प्रौद्योगिकी, संचार और वैश्वीकरण की क्रांति से युक्त है, तो दूसरी ओर यह युग अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद, धार्मिक उग्रवाद, कट्टरता, सांप्रदायिक हिंसा और मानवीय संकटों से भी ग्रस्त है। आधुनिक युग में जब विश्व समुदाय तीव्र आर्थिक, तकनीकी और सामाजिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, तब आतंकवाद (Terrorism) मानव सभ्यता के समक्ष सबसे गंभीर और जटिल चुनौतियों में से एक बनकर उभरा है। यह न केवल किसी राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा है, बल्कि समूचे मानव समाज की शांति, विकास और मानवाधिकारों की अवधारणा को गहराई से प्रभावित करता है। आतंकवाद राजनीतिक या वैचारिक लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु धमकाने या दबाव डालने के लिए हिंसा की धमकी या प्रयोग है। आमतौर पर इसे गैर-राज्यीय तत्वों - सरकार से बाहर के व्यक्तियों या संगठनों द्वारा अंजाम दिया जाता है। आतंकवाद कई रूप ले सकता है, जिसमें बम विस्फोट, सशस्त्र हमले, अपहरण या बंधक बनाना शामिल है। इसके लक्ष्य भी अलग-अलग हो सकते हैं और ये नागरिकों, सरकारी तत्वों या सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे को निशाना बना सकते हैं।' आतंकवाद का स्वरूप समय के साथ परिवर्तित होता गया है, यह केवल राजनीतिक हिंसा या असंतोष की अभिव्यक्ति नहीं रह गया, बल्कि अब यह संगठित अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क, धार्मिक उन्माद, और वैचारिक चरमपंथ से जुड़ गया है। वहीं दूसरी ओर, मानवाधिकार (Human Rights) वह बुनियादी अवधारणा है, जो प्रत्येक व्यक्ति को उसकी गरिमा, स्वतंत्रता, समानता और न्याय की भावना प्रदान करती है। इस प्रकार आतंकवाद और मानवाधिकार के बीच एक जटिल अंतर्संबंध स्थापित होता है, जहाँ एक ओर आतंकवाद मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन करता है, वहीं आतंकवाद से निपटने के लिए अपनाए गए कठोर उपाय स्वयं भी मानवाधिकारों पर प्रश्नचिह्नन खड़े करते हैं। आतंकवाद का इतिहास जितना पुराना है, उतना ही यह विचार-विरोध और शक्ति संघर्ष का प्रतीक भी है। प्राचीन काल में सत्ता परिवर्तन या राजनैतिक विद्रोह के रूप में उत्पन्न हिंसा आधुनिक काल में आतंकवाद के रूप में विकसित हुई। बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, विशेषकर 9/11 की घटना के बाद, आतंकवाद ने वैश्विक स्वरूप ग्रहण किया और इसे अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और मानवाधिकार के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया है। संयुक्त राज्य अमेरिका में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर (WTO) पर हमला न केवल उस राष्ट्र की संप्रभुता के लिए चुनौती थीं.' बल्कि इसने संपूर्ण विश्व को यह एहसास कराया है कि आतंकवाद किसी सीमा, धर्म या भूगोल से बंधा नहीं है। भारत जैसे विविधतापूर्ण और लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए आतंकवाद एक बहुआयामी चुनौती है। जम्मू-कश्मीर, उत्तर-पूर्वी राज्यों और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सक्रिय आतंकवादी एवं उग्रवादी गतिविधियाँ राष्ट्रीय एकता, अखंडता और सामाजिक सामंजस्य के लिए गंभीर खतरा बनी हुई हैं। इन परिस्थितियों में भारत की सुरक्षा नीति, कानून प्रवर्तन तंत्र और मानवाधिकारों की संरचना पर गहरा प्रभाव पड़ा है। आतंकवाद से निपटने हेतु भारत ने विभिन्न स्तरों पर कठोर आतंकवाद निरोधक कानून (टाडा, पोटा, यू.ए.पी.ए.), सशस्त्र बलों की विशेष शक्तियाँ, खुफिया एजेंसियों का सशक्तिकरण आदि रणनीतियाँ अपनाई है। परंतु इन उपायों की आलोचना भी हुई, क्योंकि इनके तहत मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप अक्सर लगाए जाते हैं। इस प्रकार सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच एक जटिल संतुलन कायम करने की आवश्यकता उत्पन्न हुई है। मानवाधिकारों की अवधारणा का उद्भव इस विश्वास से हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति को जन्म से समान अधिकार प्राप्त हैं, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, लिंग या राष्ट्र का हो।
यह पुस्तक "आतंकवाद और मानवाधिकारः चुनौतियां एवं नीतिगत विकल्प" आधुनिक विश्व की उन जटिल परिस्थितियों पर केंद्रित है, जहाँ राष्ट्रीय सुरक्षा की आवश्यकताएँ और मानवाधिकार संरक्षण के सिद्धांत आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं। पुस्तक में सबसे पहले आतंकवाद की अवधारणा, उसका ऐतिहासिक विकास, विभिन्न स्वरूप तथा वैश्विक और भारतीय परिप्रेक्ष्य में उसके विस्तार का वस्तुपरक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। इसके साथ ही मानवाधिकारों की संकल्पना, उसके अंतर्राष्ट्रीय विकास, भारतीय विधिक संवैधानिक आधार तथा मानवाधिकार आयोग की भूमिका को भी क्रमबद्ध रूप से समझाया गया है। कश्मीर और उत्तर-पूर्व भारत जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के संदर्भों के माध्यम से पुस्तक यह रेखांकित करती है कि आतंकवाद से निपटने की प्रक्रिया में सैन्य शक्तियों का उपयोग किन परिस्थितियों में आवश्यक होता है और इसके समानांतर नागरिकों के मानवाधिकारों की सुरक्षा क्यों और कैसे अनिवार्य है। इसमें AFSPA. खुफिया तंत्र, निगरानी, नागरिक स्वतंत्रता, और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग जैसे मुद्दों पर संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की वकालत की गई है। राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवाधिकारों के बीच अंतर्निहित संबंधों को स्पष्ट करते हुए पुस्तक यह संदेश देती है कि आतंकवाद का स्थायी समाधान केवल बल-प्रयोग से नहीं, बल्कि प्याय, पारदर्शिता, संवाद, सामाजिक सद्भाव, और मानव गरिमा के सम्मान पर आधारित ढाँचों से ही संभव है। साथ ही प्रस्तुत पुस्तक में मानवाधिकार-आधारित सुरक्षा नीति, नीतिगत सुधारों तथा वैकल्पिक रणनीतियों के ठोस सुझाव प्रस्तुत किए गए हैं। अपने संतुलित दृष्टिकोण, शोधपरक शैली और समाधानमुखी दृष्टि के कारण, यह पुस्तक शोधार्थियों, नीति-निर्माताओं, सुरक्षा विशेषज्ञों, प्रशासकों तथा मानवाधिकार अध्ययन के विद्यार्थियों के लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण और उपयोगी सिद्ध होती है।
डॉ० अभय राज सिंह, वर्तमान में रक्षा एवं स्त्रातेजिक अध्ययन विभाग, डी.ए-वी. (पी.जी.) कॉलेज, कानपुर (छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर, उत्तर प्रदेश से संबद्ध) में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। आपने 2005 में यू.जी.सी. (नेट) परीक्षा उत्तीर्ण की और डी.फिल. उपाधि हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय, श्रीनगर (गढ़वाल), उत्तराखंड से प्राप्त की। आपका शैक्षणिक एवं शोध कार्य राष्ट्रीय सुरक्षा, अंतर्राष्ट्रीय संबंध एवं मानवाधिकार के क्षेत्र में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। अब तक आपने कई राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों, सम्मेलनों और कार्यशालाओं में शोध पत्र प्रस्तुत किए हैं। आपके द्वारा एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का भी सफल आयोजन किया गया तथा 5 पुस्तकों का संपादन भी किया गया है। आपके शोध लेख प्रतिष्ठित संस्थाओं एवं प्रकाशनों में निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं। विशेष रूप से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा प्रकाशित "मानव अधिकारः नई दिशाएँ" जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में आपके लेख प्रकाशित होना आपके शोध के उच्च स्तर का द्योतक है। जिसके लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जैसी प्रतिष्ठित संस्था द्वारा पुरस्कृत भी किया गया है। अब तक आपके 50 से अधिक शोध पत्र विभिन्न संपादित पुस्तकों, शोध पत्रिकाओं और अकादमिक संकलनों में प्रकाशित हो चुके हैं। वर्तमान में आपके निर्देशन में चार शोध छात्र अनुसंधान कार्य कर रहे हैं। आपके द्वारा भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR), नई दिल्ली द्वारा "भारत-नेपाल खुली सीमा की सुरक्षा व्यवस्थाः लखीमपुर खीरी (उत्तर प्रदेश) के विशेष संदर्भ में" विषय पर वित्त पोषित एक लघु शोध परियोजना सफलतापूर्वक पूर्ण की जा चुकी है। साथ ही, आपको इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स (ICWA) द्वारा "भारतीय विदेश नीतिः वैश्विक आकांक्षाएं एवं चुनौतियाँ" विषय पर पुस्तक प्रस्ताव अनुदान भी प्राप्त हुआ है, जो आपके शोध-लेखन की गुणवत्ता और शैक्षणिक प्रतिष्ठा का महत्वपूर्ण प्रमाण है। अकादमिक एवं शोध गतिविधियों के अतिरिक्त आप विभिन्न प्रतिष्ठित विद्वत् संगठनों से भी सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। आप भारतीय विज्ञान कांग्रेस एसोसिएशन (कोलकाता) के आजीवन सदस्य हैं। शोध एवं अध्यापन के प्रति आपकी लगन और सतत अकादमिक योगदान ने रक्षा एवं स्त्रातेजिक अध्ययन के क्षेत्र में आपकी पहचान को सुदृढ़ किया है।
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