Amrit Mahotsav Granthamala - 47
अभिनवगुप्त की अपूर्ववस्तु-निर्माणक्षमा प्रज्ञा ने कश्मीर या भारतवर्ष ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व में काव्य, अलङ्कार, नाट्य, तन्त्रविद्या एवं दर्शन के क्षेत्र में प्रसिद्धि के उन्नत शिखरों पर आरोहण किया है। उनकी कविता की सरसता, दुरूह शास्त्रों की अभिनव एवं सर्वग्राह्य व्याख्याशैली तथा उनकी गंभीर दार्शनिकता शताब्दियों से भारतीय मनीषा का आनन्दवर्धन करती रही है। वे सच्चे अर्थों में भारतीय आचार्य परम्परा के मुकुटमणि-रत्न हैं। ऐसे महनीय आचार्य के व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व को समग्रता एवं प्रामाणिकता से हिन्दी भाषा में प्रस्तुत करने वाले ग्रन्थ का बहुत समय से अभाव था। सौभाग्य से इस अभाव की पूर्ति हमारे समय के बहुश्रुत एवं प्रतिष्ठित आचार्य श्री राधावल्लभ त्रिपाठी जी ने की है। आचार्य अभिनव गुप्त की भाँति आचार्यश्री त्रिपाठी जी की प्रतिभा भी सभी शास्त्रों में सहज प्रदीप्त है। वे कवि, सहृदय और समालोचक होने के साथ ही शास्त्रीय विषयों के गंभीर विमर्श उपस्थापित करने वाले अध्येता भी हैं। प्रकृत ग्रन्थ में उन्होंने सहृदयों के लिए अपनी मधुकरवृत्ति से अभिनव-ग्रन्थकुसुमों का अभिनव मकरन्द प्रस्तुत कर दिया है। आचार्यश्री त्रिपाठी जी का यह ग्रन्थ न केवल हमें अभिनवगुप्त के जीवन से परिचित करवाता है अपितु इस ग्रन्थ के माध्यम से हम एक हजार वर्ष पूर्व उनके समय के कश्मीर के गौरवशाली इतिहास से भी सुपरिचित होते हैं। इस ग्रन्थ के लेखक ने शैवदर्शन के विकास में अभिनवगुप्त के योगदान का मूल्यांकन अत्यन्त प्रामाणिकता के साथ किया है। यह ग्रन्थ अभिनव गुप्त को केन्द्र में रखकर पूर्ववर्ती एवं परवर्ती आचार्यपरम्परा का एक ऐतिहासिक विमर्श भी उपस्थापित करता है।
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