"अंत केवल विराम नहीं, वह आरंभ का संकेत है।
मौन, वह शून्य है जहाँ से चेतना पुनः जागती है।"
विवेक, इस उपन्यास का नायक केवल अस्तित्व की सच्चाई के साथ एक प्रयोग नहीं, बल्कि सफलता की परिभाषा और अंततः आत्मिक मुक्ति की खोज है। यह परिभाषा समय के साथ बदलती रहती है, जैसे-जैसे वह जीवन की चुनौतियों से जूझता है और अपने वास्तविक स्वरूप की ओर अग्रसर होता है। यही तो हर मानव की यात्रा है जो अपने-अपने जीवन के चरणों में अपनी महत्वाकांक्षाओं से बेचैन रहता है।
विवेकानंद झा इस उपन्यास में एक आध्यात्मिक यात्रा पर निकलते हैं, जहाँ वे मिथिला की सांस्कृतिक विरासत के गहरे प्रभाव को अपने नायक के माध्यम से खोजते हैं। हर यात्रा का अंत नहीं होता कुछ यात्राएँ, जैसे विवेक की, एक नए आलोक की शुरुआत होती हैं।
यह पुस्तक विवेक के पिता बालेश्वर की यात्रा को चित्रित करती है -मिथिला की उस दरिद्र भूमि से, जो कोसी और कमला जैसी विनाशकारी नदियों की मार से त्रस्त थी। इन नदियों ने वहाँ के निवासियों पर कहर बरपाया, और बालेश्वर को अपने पिता के स्वर्गवासी होने के बाद, अपनी माँ और छोटे भाई-बहनों के भरण-पोषण के लिए कोलकाता की ओर प्रवास करना पड़ा।
प्रारंभिक अध्यायों में मिथिला के गाँवों में रहने वाले लोगों की घोर गरीबी को उजागर किया गया है- कैसे वे लालची ज़मींदारों की कुटिल चालों का शिकार बनते हैं, जो उनकी विवशता और निर्धनता का लाभउठाकर उनसे उनका सब कुछ छीन लेते हैं, जब वे अपने ऋण चुका नहीं पाते।
कोलकाता सदैव राजनीतिक उथल-पुथल और निर्णयों का केंद्र रहा है। महा सप्तमी के दिन की एक घटना, जब वालेश्वर माँ दुर्गा की प्रतिमा के दर्शन के लिए गए थे, उनके जीवन पर गहरा प्रभाव छोड़ गई। उनके साथ भोला बाबू के पुत्र गणेश की आया भी थी। तभी अचानक उन्हें सुनाई दिया कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस वहाँ पधारे हैं, युवाओं की एक टोली के साथ।
जब बालेश्वर मंच के पास पहुँचे, नेताजी ने जनता का अभिवादन किया और ऊँचे स्वर में भाषण देना शुरू किया जिसे बालेश्वर पूरी तरह समझ नहीं पाए, लेकिन उन्हें यह ज्ञात था कि वह एक राष्ट्रवादी हैं। तभी कुछ दूरी से बूटों की आवाज़ सुनाई दी और चारों ओर अफरा-तफरी मच गई। पुलिस ने लाठियाँ चलानी शुरू कर दीं, भीड़ पर हमला हुआ, लोग इधर-उधर भागने लगे। भगदड़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई। बालेश्वर ने गणेश का हाथ कसकर पकड़ रखा था और जल्दी से गेट की ओर बढ़े, लेकिन धक्का-मुक्की में वह बेहोश हो गए।
सौभाग्यवश, गणेश और बसंती देवी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे।
यह उपन्यास बंगाल को विभाजित करने की साजिश की एक काली झलक प्रस्तुत करता है जिसने लाखों लोगों की जान ले ली। सड़कों पर बहता रक्त भले ही धो दिया गया हो, लेकिन 'डायरेक्ट एक्शन डे' के आह्वान के बाद महानगर पर जो घाव पड़ा, उसने मानवता के चेहरे को हमेशा के लिए कलंकित कर दिया।
यह उपन्यास बचपन की मासूमियत और अज्ञानता की मनोवृत्ति में एक गहन अवगाहन है जहाँ शरारती खेलों के बीच कुछ सार्वभौमिक प्रश्न भी उठते हैं। विवेक की गाथा उतनी ही जीवंत है जितनी कि मिथिला या तिरहुत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत ।
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