पुस्तक परिचय
मेरे मन में पत्न-लेखन भाव का उदय हुआ, पत्न आते गए, कारवां बढ़ता गया और "आपके पत्न मेरे नाम" संग्रह तैयार हो गया। यह साहित्य की दुनिया की कोई बड़ी घटना है। मुझे उम्मीद है, पत्न लेखन विधा फिर से जीवित हो उठेगी और आप सभी याद किए जाएंगे। ये केवल पत्तन नहीं हैं, आज की पीढ़ी के सक्रिय साहित्यकारों के हृदय की धड़कन है और इन पत्नों में पाठकों को उनके लेखन, उनके संघर्ष, उनकी पीड़ा-व्यथा, उनका श्रम-साध्य जीवन, उनकी भावनाओं की उड़ान और उनका लोक-व्यवहार बहुत कुछ मिलने वाला है। इसमें वर्तमान साहित्य किसी धरोहर की तरह दिखाई दे रहा है। मुझे हार्दिक प्रसन्नता है, आज के इस आपा-धापी के दौर में तनिक ठहर कर मैंने कोई दूसरा प्रसंग छेड़ दिया है और मेरे साथ आप सभी नए आलोक की तलाश में अपनी सहभागिता दिखाते हुए अपने कालखण्ड को महत्वपूर्ण बना रहे हैं। आपके लिखे ये पत्न्न साहित्य के इतिहास में ध्यान से पढ़े जाएंगे, इन पर विचार किया जाएगा और आपके लेखन पर नए सिरे से चिंतन होगा।
लेखक परिचय
विजय कुमार तिवारी जन्म-15/01/1957, तिलक तिवारी का हाता, जिला-बलिया, उत्तर प्रदेश। शिक्षा-एम.ए. (भूगोल)पटना प्रवास में लेखन की शुरुआत 1980 के दशक में। आकाशवाणी पटना से हिन्दी, भोजपुरी की रचनाओं का प्रसारण और पल-पक्षिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। 1990 से साहित्य लेखन-पठन लगभग बंद। सेवा निवृत्त होकर पुनः 2018-19 से लेखन की शुरुआत। ई-पुस्तक के रूप में, तीन पुस्तकें किण्डिल-अमेजन पर (1) "मि० क्ष का शहर" कहानी संग्रह, (2) "प्रेम में चायल लड़की और अन्य कविताएं" कविता संग्रह, (3)" आत्माओं का ऋण और हमारे सम्बन्ध" धार्मिक-आध्यात्मिक लेखों का संग्रह । साझा संकलन--1-"आस-पास की प्रतिध्वनियाँ (1987) "(कविता संग्रह) 2-"एक और आसमान" (1989) (कहानी संग्रह) 3-"कितने यातना शिविर" (2021) (कहानी संग्रह) 4-"THE SOUP" (2022) (हिन्दी से अंग्रेजी में अनुदित कहानियों का संग्रह) आध्यात्मिक ग्रंथ-1-"सच्चिदानन्द के सान्निध्य में" (गुरुदेव की जीवनी) (2022), (20 वर्षों से अधिक समय तक चैतन्य परम्परा के संत-सान्निध्य पर आधारित चिन्तन की पुस्तक) 2-आत्माओं का ऋण, ईश्वरीय व्यवस्था और हमारी ऋण मुक्ति (चिन्तनात्मक आध्यात्मिक लघु निबंधों का संग्रह) (2023) उपन्यास- देहरी से द्वार तक (2024) कहानी संग्रह-1-"कोई दस्तक हुई" (2023), 2-उजड़े प्यार का मसीहा (2023), 3-मेरी कहानियाँ (2024), 4-संवेदनशील इलाके के लोग (2025) कहानी संग्रह-1-"कोई दस्तक हुई" (2023), 2-उजड़े प्यार का मसीहा (2023), 3-मेरी कहानियाँ (2024), 4-संवेदनशील इलाके के लोग (2025) कविता संग्रह-1-"पलकों में सोई रही प्यास" (2023) 2-" मन के आसमान पर कुलबुलाती कविताएं (2024) संस्मरणात्मक शोध-चिंतन का ग्रंथ यादों की खिड़कियाँ खण्ड-1 (2024) समीक्षा पुस्तकें-1-"उम्मीदों के कवि फूलचंद गुप्ता और उनकी कविताएं एक पड़ताल" (2022) 2-"समीक्षा के दायरे में आज की कविता" (2022) 3-"डा० हंसा दीप के कृतित्व पर विमर्श" (2023) 4-समकालीन कहानियाँ: समीक्षा के दायरे में (2023) 5-प्रबोध कुमार गोविल समीक्षा के साये (2024) 6-व्यावहारिक समीक्षात्मक चिंतन और आज की कविता (2024),7-व्यावहारिक समीक्षा के दायरे में समकालीन उपन्यास (2025) 8-डा0 संजीव कुमार के काव्यों और प्रबंध काव्यों की समीक्षात्मक विवेचना (2025) 9-साहित्य की विविध समकालीन विधाएं और मेरा व्यावहारिक समीक्षात्मक चिंतन (2025) सम्मान/पुरस्कार-1-प्रतिलिपि स्टोरी फेस्टिवल पुरस्कार, 2-राम नारायण दीक्षित साहित्य भूषण सम्मान सम्प्रति-सेवा-निवृत्त-भारतीय स्टेट बैंक। स्वतन्त्र लेखन
भूमिका
मेरे मन में पत्र-लेखन भाव का उदय हुआ, पत्र आते गए, कारवां बढ़ता गया और "आपके पत्र मेरे नाम" संग्रह तैयार हो गया। यह साहित्य की दुनिया की कोई बड़ी घटना है। मुझे उम्मीद है, पत्र लेखन विधा फिर से जीवित हो उठेगी और आप सभी याद किए जाएंगे। ये केवल पत्र नहीं हैं, आज की पीढ़ी के सक्रिय साहित्यकारों के हृदय की धड़कन है और इन पत्रों में पाठकों को उनके लेखन, उनके संघर्ष, उनकी पीड़ा-व्यथा, उनका श्रम-साध्य जीवन, उनकी भावनाओं की उड़ान और उनका लोक-व्यवहार बहुत कुछ मिलने वाला है। इसमें वर्तमान साहित्य किसी धरोहर की तरह दिखाई दे रहा है। मुझे हार्दिक प्रसन्नता है, आज के इस आपा-धापी के दौर में तनिक ठहर कर मैंने कोई दूसरा प्रसंग छेड़ दिया है और मेरे साथ आप सभी नए आलोक की तलाश में अपनी सहभागिता दिखाते हुए अपने कालखण्ड को महत्वपूर्ण बना रहे हैं। आपके लिखे ये पत्र साहित्य के इतिहास में ध्यान से पढ़े जाएंगे, इन पर विचार किया जाएगा और आपके लेखन पर नए सिरे से चिंतन होगा। कभी मुझे अंग्रेजी भाषा में एक पुस्तक पढ़ने को मिली थी-"लेटर्स ऑफ स्वामी विवेकानन्द", उस पुस्तक की भूमिका की चंद पंक्तियों का भाव था-पत्र किसी के मनोभावों की अभिव्यक्ति होते हैं, खुले मन से लिखे जाते हैं और उससे व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास व उसकी आंतरिक संरचना को समझा जा सकता है। पत्रों के द्वारा उसके जीवन के बहुआयामी पक्षों, जटिलताओं, संघर्षों, सुखों, विचारों, व्यवहारों व नाना उड़ानों का रहस्य खुलता हुआ दिखाई देता है। आज वसंत पंचमी की पावन तिथि है, आज ही मैं "आपके पत्र मेरे नाम" की पांडुलिपि को मां सरस्वती के चरणों में समर्पित करते हुए प्रकाशक को प्रेषित कर रहा हूँ। यह मेरे 'पत्र-लेखन यज्ञ' अभियान का दायित्वपूर्ण प्रयास है। आप सभी के सहयोग के बिना इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठाना मेरे अकेले के बस में नहीं है। सुखद है, आप सभी ने मेरे मंतव्य और विचार को सम्पूर्णता में समझा है, खुले मन से सहयोग दे रहे हैं और मेरी इस यात्रा के सहयात्री हैं। मुझे तनिक भी आभास नहीं था, पत्र लेखन को लेकर हमारा साहित्यिक समाज इतना उत्साहित, इतना मुखर और भाव-संवेदनाओं से भरा हुआ है। इसमें कल्पनाशील व यथार्थवादी पुरुष हैं तथा भाव-संवेदनाओं व जीवन के कट अनुभवों को समेटे खियाँ भी हैं। खियाँ कुछ अधिक ही मुखर हैं और उनका संघर्ष खूब झलकता हुआ दिखाई दे रहा है। मैंने 15 जनवरी 2025 तक प्राप्त पत्रों को इसमें सम्मिलित किया है। 15 जनवरी 2025 की तिथि, मेरा जन्मदिन है और मेरे शुभचिन्तकों, सुहृद मित्रों ने अपने आशीर्वादों, शुभ वचनों व शुभकामनाओं से आप्लावित कर दिया है। शायद किसी के जीवन की यही असली सम्पदा होती है कि वह लोगों की स्मृतियों और उनकी दुआओं में है। इसके पीछे मुझे ईश्वरीय कृपा अधिक महसूस हो रही है और में हृदय पूर्वक ईश्वर सहित सभी को नमन करता हूँ। ईश्वर हम सभी के जीवन में उत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त करे, सुख, समृद्धि, यश, प्रतिष्ठा, शान्ति और मन की निर्मलता प्रदान करे। पत्र लेखन सम्बन्धी विचार मेरे मन में 17 दिसम्बर 2024 को सन्ध्या काल में अचानक पनपा, मैं उत्साहित हुआ और तत्क्षण सामाजिक मीडिया के माध्यम से अपने बहुतायत मित्रों को सम्प्रेषित कर दिया। प्रतिक्रियाएं उत्साहित करने वाली थीं। अगले दिन भोर-भोर तक वैचारिक विविधता लिए सैकड़ों प्रतिक्रियाएं मिलीं। उन सभी को समाहित करते हुए 18 दिसम्बर 2024 को मैंने सभी लेखकों, साहित्यकारों के नाम एक "खुला पत्र" अपने फेसबुक वाल पर पोस्ट कर दिया, अनेक मित्रों को उनके ह्वाट्सअप पर भेजा और कइयों के साथ फोन द्वारा इस प्रस्ताव पर विचार-विमर्श हुआ। उस दिन मन में भाव जागा, हमें पत्र लेखन शुरु करना चाहिए। हमारे समकालीन लेखन से साहित्य की यह महत्वपूर्ण विधा लुप्तप्राय है। हमें इसे पुनर्जीवित करना चाहिए। उस समय ध्यान नाना संभावनाओं, समस्याओं और रोधों-प्रतिरोधों की ओर गया परन्तु भीतर से मन संकल्पित हुआ और इसे मैंने किसी अभियान की तरह स्वीकार कर लिया। इसके लिए मुझे लगा, जब पहले के साहित्यकार पत्र लिखा करते थे
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