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आवारा: Awara (Wonderful Modern Social Drama)

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Specifications
Publisher: KITABGHAR PRAKASHAN
Author Pandey Bechan Sharma
Language: Hindi
Pages: 104
Cover: HARDCOVER
9.0x6.0 Inch
Weight 240 gm
Edition: 2013
ISBN: 9789383233182
HCE760
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Book Description

भूमिका

     

 

एक सुंदर और स्वर्गीय सहकर्मी या हमपेशा के स्वजनों के सहायतार्थ अपने इस नाटक 'आवारा' का सर्वाधिकार 'सत्साहित्यिक सेवक समाज' को सौंप देने में मुःने हर्ष-विमर्श या आत्मोत्कर्ष का अनुभव हो, इतना भावुक मस्त मैं नहीं। हिंदी में क्या, सारे भारतीय साहित्य में अपने 'कॉमरेडों' की गौरव रक्षा के लिए (स्वयं साहित्यिकों द्वारा) यह अभिनव आयोजन है। और इस स्निग्ध मौलिकता की माला में पहला मनका मेरे ही मन के रूखे-सूखे फूल का है, मेरे हृदय के ठहरने की भूमिका यही है मात्र... और भपकी। मैं कहता हूं चूक गई सुश्री महादेवी वर्मा। इस मौलिकता की माला में पहला मणि उनका होना चाहिए था, साथ ही अच्छे चूके श्री 'निराला' जी, श्री रामकुमार वर्मा, श्री हरिभाऊ उपाध्याय मेरे मित्र और परिचित। उक्त सभी सुहृदयों ने 'हृदय' श्रद्धांजलि में अपने-अपने रचना-कुसुम सजाने का वादा किया था। वे शौक से पंडित सूर्यनारायण व्यास के पास प्रयास-प्रसून प्रथम पूजार्थ प्रेषित कर सकते थे, मगर कहा जाता है-कोई अस्वस्थ रहा, कोई बहुव्यस्त तथा ढींगर महामस्त। सो मैं अपने सारे मित्रों की असुविधाओं से प्रतिष्ठित और मौलिक हूं। इस पुस्तक के प्रकाशन में जो भी व्यय लगा है उसे पंडित सूर्यनारायण व्यास ने 'पर्सनल पर्स' से प्रस्तुत किया है और ऊपरी टीमटाम रखते हुए भी मैं जानता हूं, स्वाभिमानी व्यास जी दिल के (अंदर से) केवल गरीब हैं, सो केवल गरीबी की कठोर कमाई और लौह-लिखाई से प्रभु के प्रसाद से यह स्वस्थ-सुरभित सुमन-माला सजाई जाएगी। पंडित हरिभाऊ उपाध्याय से अनायास ही प्राप्त सुंदर सहयोग द्वारा 'हृदय श्रद्धांजलि' की तथा 'सत्साहित्यिक सेवक समाज' की अन्य सभी पुस्तकें 'सस्ता साहित्य मंडल' अपनी देखरेख में छपाकर निजी निरीक्षण में उनकी बिक्री या विस्तार की व्यवस्था भी करेगा। पुस्तकों की बिक्री से जो आमदनी होगी उसमें से अगली पुस्तक के प्रकाशन का खर्चा निकाल, बेचकों को मुनासिब कमीशनादि दे देने के बाद जो धन शेष रहेगा, हर संस्मरण का, हां-वह लेखक विशेष के स्वजनों को, विनय से समर्पित कर दिया जाएगा। इसी तरह 'आवारा' की सारी बचत दिव्यात्मा 'हृदय जी' के स्वजनों को सदैव सौंप दी जाया करेगी। 'हृदय श्रद्धांजलि' में 12 पुस्तकें उनके परिवारियों को भेंट की जाएंगी। नाटक के बारे में मेरे कुछ कहने से बेहतर 'आवारा' खुद अपनी कहेगा, अपने नाटकों के 'सपोर्ट' में विश्वविख्यात व्यंग्य नाटककार जॉर्ज बर्नार्ड शा महोदय की तरह नाटक से भी लंबी भूमिका (और अकसर नाटक से भी अच्छी) लिखना मैं नामाकूली मानता हूं और मानता हूं कि जरूर 'शा' साहब के नाटकों में कुछ न कुछ विशद कला की कमी होती है, जिसकी पूर्ति हजरत को ऊंट की तरह 'भूमिका' बांधकर करनी पड़ती है। शेक्सपीयर ने अपने किसी नाटक की लंबी-चौड़ी भूमिका लिखी? कालिदास ने? मगर शेक्सपीयर कालिदास को मिस्टर 'शा' 'नाटककार' मानें तब तो ! मैं केवल कहानी सजाता हूं। मुझे 'कला कला ही के लिए' (आदि, मध्य और अंत में) अच्छी लगती है। 'आवारा' को अगर आप एक घूंट में पी जाएं-प्यासा कुल और फिर गिलास खत्म हो जाने पर सोचने की फुर्सत पाएं कि जीवन मीठा है या खारा, कूपोदक है या गंगाजल ? तो मेरा काम दुरुस्त समझिए। 'शा' साहब प्रचार और पोले सदाचार के विचारों का ऐसा अंबार लादते हैं सुकुमार नाट्यकला की गर्दन पर कि उसका दम बार-बार घुट-घुटकर रह जाता है। मुझे प्रचार या सदाचार के ठोस या पोले विचारों से परहेज नहीं, अगर कोई उन्हें प्रचारक या पोलानंद की हैसियत से पसरावे। मेरा दावा इतना ही है

 

लेखक परिचय

 

पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' का समाज अध्ययन बड़ा प्रखर था। उन्होंने गरीबी में उसकी संपूर्ण भयावहता को बाल्यावस्था में ही भोगा था, अतः उग्र जी 'आवारा' नाटक में पूरी तरह सफल सामाजिक नाटककार प्रतीत होते हैं। 'उग्र' का यह नाटक उस अभिनंदनीय योजना का पावन प्रेरक स्मृति चिह्न बन आज भी विजयपताका की तरह यशगान करता फहरा रहा है। सभ्य, समृद्ध समाज 'और उसमें कलाकार की दयनीय स्थिति, जमींदार की क्रूरता व जालसाजी का बिलकुल नग्न चित्रण है। लाली-दयाराम की निश्छल प्लेटोनिक मनोवैज्ञानिक प्रेमगाथा को भी 'उग्र' ने जीवन के घिनौने पाशविक प्रेम-व्यवहारों से अलग-थलग चित्रित कर मर्मस्पर्शी और हृदयद्रावक बना दिया है। आलोचकों ने इस नाटक को स्वाभाविक माना था किंतु समसामयिक प्रगतिशील नाट्य रचनाओं में नई धारा और नूतन अभिव्यक्ति के अभाव का अनुभव कर उग्र ने सामाजिक जीवन में कला का स्वरूप निखारने के लिए नाटक में प्रचलित और रुचिकर शैली का अनुगमन किया है। 'उग्र' ने अपने लेखन-जीवन का आरंभ ही नाटकों से किया था। उनका पहला ही नाटक 'महात्मा ईसा' हिंदी का अत्यंत सफल और चर्चित नाटक रहा था।

 

पुस्तक परिचय

 

[पहले फ्लैप का शेष] 'चुंबन', 'गंगा का बेटा', 'अन्नदाता', 'माधव महाराज महान' उनकी अन्य लोकप्रिय नाट्य कृतियां रही हैं। उपन्यास और भारी-भरकम संपादकीय से समय निकालकर 'उग्र' ने एकांकी और प्रहसन की भी रचना की है। पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' रचित नाटक 'आवारा' में सामान्य सहायक पात्रों के अलावा छह पुरुष पात्र और तीन स्त्री पात्र हैं, नाटक तैंतीस दृश्यों तथा तीन अंकों में समायोजित है। पहले अंक में आठ, दूसरे में अठारह व तीसरे अंक में सात दृश्य हैं। 'नाटक' में 'उग्र' द्वारा प्रणीत गीत भी समायोजित हैं जो कथानक व वातावरण को सजीव बनाते हैं। गीत-नाट्य की यह पद्धति लोक-नाट्य परंपरा की-सी है। कथानक में प्रायः जो घटनाएं मंच पर नहीं दिखाई जातीं उनकी सूचना व वातावरण की मार्मिकता को और गहन बनाए रखने के लिए या कभी-कभी उसके प्रतीकात्मक अर्थों को स्पष्ट करने के लिए गायन पद्धति उपयोगी सिद्ध होती है। प्रस्तुत नाटक 'आवारा' में बूढ़े भिखारी बुद्धराम की बेटी लाली और क्रूर जमींदार के छोटे भाई दयाराम को प्रमुख पात्र के रूप में चित्रित कर हमारी सामाजिक मान्यताओं और परिस्थितियों पर सामयिक, तीखा और तीव्र व्यंग्य किया गया है। आज हिंदी में 'उग्र' नहीं रहे, न वैसे गुण-ग्राहक पाठक, मगर 'उग्र' का अकल्पनीय नाटक 'आवारा' आज भी उग्र की अपनी अद्भुत शैली 'उग्र-शैली' की याद दिलाता है।

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