भूमिका
निश्चय ही इस भूमिका को लिखते अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है मैं उस भूमि की तलाश कर रहा हूँ जहां से उपजी अनेक महान विभूतियों ने इस गाँव को बौद्धिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक उर्वरा शक्ति प्रदान की है इसकी हरीतिमा को बरकरार रखने में कोई कसर उठा नहीं रखी है।
इस पुस्तक में डॉ० महेन्द्र राय ने अथक प्रयास कर भरपूर सामग्री उपस्थित की है, ऐतिहासिक तथ्य और साहित्यक कथ्य से रंगरोपन कर इस पुस्तक को ही ऐतिहासिक बना दिया है। आगे आने वाली पीढ़ी के लिए यह पुस्तक प्रेरणा स्रोत बने यही उनकी कामना (मेरी समझ में) रही है।
यह पुस्तक 'तब और अब' के तर्ज पर लिखी गई है, बहुआयामी क्षेत्रों का महज स्पर्श ही नहीं बल्कि उसे शालीनता, सरलता और सहजता से परोसने का कार्य डॉ० महेन्द्र ने किया है।
अपने पूर्वजों की गाथा, कहने और लिखने की भारतीय संस्कृति सदा ही गौरवान्वित रही है। तो आयें हम देखें बागर की पहली ऐतिहासिक और भौगोलिक पृष्ठ भूमि जो आज Oasis के रूप में किस प्रकार वर्तमान है। मानव मन की गहराइयों में उतर कर उसे चित्रित करना, अनुभूतियों को कागज पर उतारना किसी संत-महर्षि का ही सृजन हो सकता है-यह कार्य डॉ० महेन्द्र ने कर दिखाया है।
गाँव की प्राचीनता-संपन्नता और धार्मिकता का परिचय सहज ही आपको आकर्षित कर लेगा। कैसे थे वे लोग, जिनकी विरासत के भार को भी हम अपने कंधे पर ढोने में असमर्थ पा रहे हैं।
आदरणीय प्रातः स्मरणीय, दिवंगत बाबू बक्शी राय वर्गरह कैसे पुरुष थे, जिन्होंने अंग्रेजों की दासता से मुक्ति के लिए बाबू कुँवर सिंह का साथ दिया, अपनी जीविका (नौकरी) तक की तिलांजली दे दी। राइफल के कुंदों का निशान आज भी देखा जा सकता है। बाबू बक्शी राय की ही तीसरी पीढ़ी में मौनी स्वामी जी का नाम विशेष उल्लेखनीय है-ऋषिकेश में अवस्थित राजीव लोचन आश्रम/भक्ति मार्ग के अनेक भक्तों की चर्चा (पेज 5) एवं शैक्षिक सांस्कृतिक व्यक्तियों का विशेष उल्लेख कर डॉ. महेन्द्र ने सराहनीय कार्य किया है।
पुस्तक के माध्यम से मैं गाँव के उसी परिवेश में गुजरता हूँ जो अब अतीत की स्मृतियों में भी मुश्किल से जीवन्त हो रहे हैं। विकास के क्रम में चाहे जितने आगे बढ़ गये हों गाँव अब पहले जैसे नहीं रहे। अनेक असुविधाओं, मुसीबतों के बीच भी जो आत्मीयता, सम्बन्धों का गाढ़ापन, सामाजिक समरसता व अभाव में भी जीते रहने की जो अदभ्य लालसा पहले ग्राम वासियों में थी, वह अब बारीकी से खोजने पर भी नहीं मिलते। ग्राम समाज सदा से उत्सवधर्मी समाज रहा है। (लेखक ने विस्तृत चर्चा की है)। हर दिन कोई न कोई पर्व त्योहार, फगुआ चैता ग्राम जीवन की विशेषता रही है।
इस तरह के आयोजनों से लोगों की सामूहिकता की प्रवृत्ति तो बनी ही रहती थी, अनेक अभावों, विपत्तियों के रहते एक प्रकार की जिजीविषा भी बनी रहती थी। जिस कृषि प्रधान ग्रामोंन्मुख सभ्यता के गुण (पुस्तक के आधार पर) हम गाया करते रहे हैं अब प्रभाहीन, अभावग्रस्त और विकासर्वोचत होती जा रही है।
बहुत ही उपलब्धियां लिए और कुछ नैराश्यजनक अमानवीय व्यवहार की घटित घटनाओं की भी चर्चा इस पुस्तक में की गई है- आप पाठक इसे छिछले तौर पर सिर्फ तैरकर ऐतिहासिक-साहित्यिक सागर को पार करने का प्रयास नहीं करेंगे, गोते लगाइये और मनन कीजिए।
विस्तृत भूमिका से बचते हुए पुनः मैं पूर्वजों की पावन भूमि 'बागर' को नमन करता हूँ और इस पुस्तक की रचना धर्मिता की सराहना करता हूँ।
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