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बाईजराज: Baijuraj (The Story of the Most Powerful, Outspoken, and Authoritative Female Spiritual Practitioner in the Known History of Indian Spiritual Traditions and Sects- Including Her Historic Letters)

AED56
Includes any tariffs and taxes
Specifications
Publisher: Shivalik Prakashan
Author Mohan Parnami
Language: Hindi
Pages: 88 (with B/W Illustrations)
Cover: Paperback
9.0x6.5 Inch
Weight 170 gm
Edition: 2026
ISBN: 9789348433053
BA2521
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Book Description
लेखक परिचय

मोहन परनामी प्रसिद्ध नाम : विश्वमोहन मिश्र ग्राम सोनवर्षा रोवा, मध्य प्रदेश , भारत में जन्म। अकादमिक शिक्षा : डबल एम.ए. (हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता), अनुवाद विज्ञान से पी.जी. डिप्लोमा, पी-एच.डी. (महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, छतरपुर में 2024 से निरंतर) धार्मिक प्रशिक्षण : श्रीम‌द्भागवत (श्रीनाथ धाम, वृन्दावन), श्रीमद्भगवद्‌गीता (गोलोक धाम, हरिद्वार), तारतम वाणी एवं बीतक (आद्य जागनीपीठ श्री महामंगलपुरीधाम, सूरत के धर्माचार्य श्री 108 सूर्यनारायणदासजी महाराज से) संपादन : तारतम वाणी, गुजराती संस्करण, श्री 5 महामंगलपुरीधाम, सूरत से प्रकाशित (2025)। श्री परमधाम पत्रिका (2022 से निरंतर) श्री 5 महामंगलपुरीधाम, सूरत से प्रतिमाह प्रकाशित। सह-सम्पादन : 'जागनी' द्विवार्षिक शोध पत्रिका, अंक: 2020-21, श्री प्राणनाथ मिशन, दिल्ली; 'प्रो. के.पी. सिंह मीडिया के आईने में', अनंग प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित (2026)। प्रकाशन : दिल्ली विश्वविद्यालय (DU), बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU), महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय (MCBU) और भारतीय जनसंचार संस्थान, दिल्ली (IIMC) नव उन्नयन साहित्यिक सोसाइटी, दिल्ली और श्री प्राणनाथ मिशन, दिल्ली जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण एवं साहित्यिक संस्थानों में अनेक शोध पत्रों का प्रकाशन। संप्रति : प्रधान संपादक-श्री परमधाम पत्रिका एवं श्री 5 महामंगलपुरीधाम से संचालित विभिन्न अकादमिक साहित्यिक परियोजनाओं के प्रभारी। उल्लेखनीय कार्य : श्री 5 महामंगलपुरीधाम के नेतृत्व में महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, छतरपुर के हिंदी एवं दर्शन तथा गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद के हिंदी विभाग में एम.ए. स्तर के पाठ्यक्रम में महामति प्राणनाथ की वाणी के अंशों को लागू करवाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका। कई विश्वविद्यालयों में प्रणामी परम्परा एवं साहित्य पर केंद्रित सफल राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों का सफल संयोजन। भारत के कई विश्वविद्यालयों में प्रणामी साहित्य, दर्शन एवं परंपरा पर चल रहे और हो चुके पी-एच.डी. शोधकार्यों पर संप्रदाय की ओर से अधिकृत विशेषज्ञ के रूप में मार्गदर्शन।

पुस्तक परिचय

यह पुस्तक 'बाईजूराज' निजानंद संप्रदाय के प्रणेता सद्‌गुरु देवचन्द्र (1581-1655 ई.) एवं उनके नादपुत्र तथा प्रणामी पंच के प्रवर्तक महामति प्राणनाथ (1618-1694 ई.) की अनन्य सहचरी तेजकुंवरि बाई- 'बाईजूराज' के आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक योगदान को रेखांकित करती हुई एक अध्य्यनपरक लघु कृति है, जिसका स्वागत विद्वज्जन सहर्ष करेंगे। वस्तुतः प्रणामी वाड्मय के विद्वानों ने बाईजूराज की गरिमामयी उपस्थिति और महामति के निर्माण में उनकी रचनात्मक भूमिका का कुछ उल्लेख तो किया है, लेकिन जिस स्थान की वह अधिकारिणी रहीं, उसकी बड़ी अनदेखी हुई है। सद्‌गुरु के आदेश का पालन करते हुए मेहराज ठाकुर (महामति प्राणनाथ का पूर्वनाम) को जब अरब देश की यात्रा पर जाना पड़ा, तो बाईजूराज ने उस दुष्कर और दुर्गम समुद्री यात्रा में सच्ची सहधर्मिणी के नाते उनका सक्रिय सहयोग किया। यहाँ तक कि अरब के समुद्री दस्युओं ने कई साथियों के साथ उनका अपहरण भी कर लिया था; इस आकस्मिक आपदा और संकटापन्न घड़ी का जिस साहस और धैर्य के साथ एक तरफ मेहराज ने और दूसरी तरफ बाईजूराज ने (लगभग तीन वर्षों तक) सामना किया, वह भारतीय इतिहास की विरल घटना है। महामति की लंबी जागनी यात्रा के आरंभ में सूरत शहर के वृत्तांत का उल्लेख सभी बीतककारों ने किया है- जिसमें स्वामी लालदास, नवरंग स्वामी, ब्रजभूषण से लेकर जीवन मस्तान तक सभी शामिल हैं- यहीं मेहराज ठाकुर के कलेवर में महामति प्राणनाथ की, सोपाधि समेत बाईजूराज ने उनकी आरती उतारी। इसके उपरांत समस्त सुंदरसाथ ने दोनों स्वरूपों को सिंहासन पर बिठाकर उनकी आरती उतारी। इस उत्कर्ष के पीछे बाईजूराज का जो संकल्प था और उन्होंने अनवरत जो संघर्ष झेला, उसे मोहन परनामी ने बड़े परिश्रम के साथ, कई ज्ञात एवं अज्ञात स्रोतों के साथ, अध्यवसायपूर्वक संजोया है। संभवतः पहली बार उनके जीवन और योगदान पर केन्द्रित इतनी विस्तृत और प्रामाणिक सामग्री प्रकाश में आई है। यह लेखक की आस्था और अनुसंधान की सुखद परिणति है- इस प्रस्तुत कृति का केवल प्रणामी समाज में ही नहीं, बल्कि उत्तर-मध्यकालीन साहित्येतिहास में एक अनिवार्य कड़ी के रूप में भी सहर्ष स्वागत होगा।

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