लेखक परिचय
डॉ. दयाल आशा एक कर्मठ विद्वान और प्रख्यात शिक्षा-शास्त्री हैं। विश्वविद्यालय की बड़ी से बड़ी उपाधियाँ उनके नाम को अलंकृत करती हैं। एक बड़े कॉलेज के ये एक लोकप्रिय प्रिंसिपल रहे हैं। अवकाश प्राप्त करने के पश्चात् भी बंबई विश्वविद्यालय के सिंधी के शोध-निर्देशक हैं। सरकारी और अर्द्ध सरकारी संस्थानों के अनेक आदरणीय पुरस्कार इनकी झोली में पड़े हैं। पर, आशाजी मूलतः एक भक्त हैं। ईश्वर ने इन्हें मधुर स्वर और कोमल स्वभाव दिया है, जिसकी सहायता से ये 'लोक-सेवा' के कार्य को पूजा की पवित्रता और साधक की निस्पृहता के साथ करते हैं। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है 'विहाय कामान्यः सविन्युिमांशचरति निस्पृहः। निर्मयो निरहंकारः स शान्तिम् अधिगच्छति।' (जो पुरुष संपूर्ण कामनाओं को त्यागकर, ममतारहित, निरहंकार और निस्पृहः होकर कार्य करता है, वह शान्ति को प्राप्त होता है।) यह एक दैवी संयोग है कि आशा स्वामी श्री शान्तिप्रकाशजी के प्रिय शिष्य और साधु वासवानीजी के परम भक्त ही नहीं हैं, स्वयं शान्ति और भक्ति के प्रतिरूप भी हैं। इसलिए इनकी कविता की मूल भावभूमि भक्ति की है। वास्तव में भक्ति के आवेश में जब ये गाते हैं, तो इनका मधुर स्वर उसे गीत बना देता है। कविता तो एक प्रकार से इनके भक्तिभाव की बाई प्रोडक्ट मात्र है।
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