प्राचीन भारत में उन महान् ऋषियों का अनूठा इतिहास समाया हुआ है, जिन्होंने भगवा वस्त्र पहनकर, माथे पर तिलक लगाकर, गले में रुद्राक्ष की माला और शरीर पर जनेऊ धारण करके भारत की पवित्र नदियों के तट पर अमर हो जाने वाले ग्रंथों की रचना विभिन्न विषयों पर की है, जैसे- भौतिकी, रसायन, खगोल शास्त्र, गणित, अभियांत्रिकी और दर्शनशास्त्र। ये सभी ग्रंथ संस्कृत में लिखे गए, जिनमें मानवता की प्रथम रचित पुस्तक ऋग्वेद भी लिखी गई है। इसी ज्ञान का अनुसरण करते हुए भारतीय ऋषियों ने ऐसे शास्त्रों का निर्माण किया, जिसमें मानव की हर एक कल्पनीय दिशा, दशा एवं गतिविधि पर ज्ञान प्रदत्त है।
महर्षि महेश योगी ने प्राचीन संस्कृत पुस्तकों पर लिखा है- "संस्कृत ग्रंथ चेतना की विशिष्ट गुणवत्ता को व्यक्त करते हैं। इसका अर्थ यह है कि अकसर हमें कई ग्रंथों के गहरे महत्त्व को समझने के लिए उनके मूल अर्थों से परे देखना पड़ता है।" बहुत से तर्कवादियों और आधुनिक वैज्ञानिकों ने इन प्राचीन पुस्तकों में आधुनिक दृष्टिकोण को पहचानते हुए और उसके गहन महत्त्व को समझते हुए प्राचीन हिंदुओं को ध्वजवाहक के रूप में और प्राचीन संस्कृत ग्रंथों को आधुनिक विज्ञान, खगोल विज्ञान, गणित के लिए आधारशिला के रूप में प्रशंसित किया है। इतिहासकारों के बाहर शायद ही कुछ लोग प्राचीन हिंदुओं की अविश्वसनीय उपलब्धियों से अवगत हों।
इतिहासकार जेम्स ग्रांट डफ के अनुसार, "विज्ञान में कई प्रगतियाँ, जिन्हें हम आज यूरोप में हुई मानते हैं, वास्तव में सदियों पहले भारत में हुई थीं।" यूरोपीय विद्वज्जन अपनी वंशावली के कारण और कई भारतीय अपनी अति धर्मनिरपेक्ष साख के कारण दर्शन, गणित और विज्ञान के क्षेत्र में सारा ज्ञान ग्रीस में खोजते हैं, किंतु कुछ निष्पक्ष लेखकों ने प्राचीन हिंदुओं को उनका उचित श्रेय भी दिया है।
प्रसिद्ध पांडुलिपि शास्त्री और गणित के इतिहासकार डेविड पिंगरी ने यह अनुमान लगाया है कि "संस्कृत में मौजूदा पांडुलिपियों की संख्या 30 मिलियन से अधिक है-ग्रीक और लैटिन में संयुक्त पांडुलिपियों की तुलना में 100 गुना से अधिक। यह एक ऐसी विशाल सांस्कृतिक विरासत है, जिसे किसी भी सभ्यता ने छापेखाने (प्रिंटिंग प्रेस) के आविष्कार से पहले बनाया है।
अमरीकी इतिहासकार विल ड्यूरैंट (1885-1981) का प्राचीन भारत के बारे में निम्नलिखित कथन है- "हमारी जाति की मातृभूमि भारत थी और सभी यूरोपीय भाषाओं की जननी संस्कृत थी। भारत हमारे अधिकांश गणित के दर्शन एवं ईसाई धर्म में निहित लोकतांत्रिक विचारों की जननी था। कई मायनों में भारतमाता हम सभी की माता है।"
प्रसिद्ध दानिश भौतिक विज्ञानी और नोबेल पुरस्कार विजेता नील्स बोर भी वेदों के अनुयायी थे। उन्होंने लिखा है- "मैं उत्तर ढूँढ़ने के लिए उपनिषदों का पाठन करता हूँ।" बोह्र और श्रोडिंगर दोनों वैदिक ग्रंथों के उत्साही पाठक थे और उन्होंने वेदों में जो पढ़ा था, उसे लगातार क्वांटम भौतिकी में अपने प्रयोगों को वेदों की शिक्षाओं के अनुसार सिद्ध करने का प्रयास किया।
आधुनिक भारत की युवा पीढ़ी में प्रामाणिक जानकारी के आधार पर हमारे पूर्वजों की उपलब्धियों के बारे में जागरूकता पैदा करना बहुत आवशयक है। यह पुस्तक गणित, विज्ञान, खगोल विज्ञान, चिकित्सा आदि सभी नवाचारों, आविष्कारों, सिद्धांतों, न्यायशास्त्र के क्षेत्र में हिंदू योगदान के दावे का प्रतिबिंब है। परिकल्पना, वैज्ञानिक सिद्धांत, प्रमेय जो उनसे संबंधित हैं, को जिम्मेदार ठहराते हुए इस पुस्तक में सभी हिंदू विश्वकोशों को प्रासंगिक तिथियों और सूत्रों के साथ उपलब्ध कराने का वास्तविक प्रयास किया गया है। इस पुस्तक के द्वारा उन सभी महान् हिंदू ऋषियों और संतों की सच्ची प्रशंसा करने का प्रयास किया गया है, जिन्हें आधुनिक भाषा में वैज्ञानिक, नवप्रवर्तक और शोधकर्ता के रूप में जाना जाता है।
Hindu (हिंदू धर्म) (13599)
Tantra (तन्त्र) (1008)
Vedas (वेद) (732)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2086)
Chaukhamba | चौखंबा (3187)
Jyotish (ज्योतिष) (1563)
Yoga (योग) (1163)
Ramayana (रामायण) (1337)
Gita Press (गीता प्रेस) (724)
Sahitya (साहित्य) (24710)
History (इतिहास) (9016)
Philosophy (दर्शन) (3631)
Santvani (सन्त वाणी) (2623)
Vedanta (वेदांत) (116)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist