भारत का साहित्यिक इतिहास लिखना वस्तुतः असंभव है, जब तक कि एक ऐसे (सैद्धांतिक) ढाँचे का निर्माण न हो; जो न केवल देश में विद्यमान विविध साहित्यिक परंपराओं को समाहित करे, अपितु इसकी बहुभाषावाद की जटिलताओं को भी अपने में समेटे। यदि साहित्य की पहचान का एकमात्र आधार भाषा होती, तो साहित्यिक इतिहासकारों के समक्ष अनेक समस्याएँ उत्पन्न न होतीं। साहित्य सदैव उन भाषाओं के आधार पर ही पहचाना जाता रहा है जिनमें उनकी रचना हुई है। उदाहरण के लिए, संस्कृत साहित्य संस्कृत भाषा में रचित या उच्चारित साहित्य को संदर्भित करता है, और ग्रीक साहित्य ग्रीक भाषा में रचित साहित्य को। इस भाषा-साहित्य समीकरण के बिना किसी भी साहित्य की पहचान अकल्पनीय है, और इस तथ्य से आज तक किसी ने इनकार नहीं किया है। तथापि, गहन विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि यह संबंध आवश्यक तो है, परन्तु साहित्य की पूर्ण पहचान के लिए पर्याप्त नहीं है। यह संबंध कई ऐसे प्रश्न खड़े करता है जिनकी पुनः परीक्षा आवश्यक है, और संभवतः कुछ अन्य मानदंडों को भी शामिल करने की आवश्यकता है, अंततः, साहित्यिक इतिहासकार के दृष्टिकोण में एक मूलभूत परिवर्तन की आवश्यकता है। साहित्य इतिहासकार के लिए भाषा-साहित्य समीकरण अनिवार्य होते हुए भी पर्याप्त नहीं है, विशेषकर जब विषय भारतीय साहित्य हो। यह साहित्य को केवल उनकी भाषा से जोड़कर पहचानने वाले लोगों के लिए भी अपर्याप्त है, क्योंकि किसी भाषा के भौगोलिक व्याप्ति में परिवर्तन होने से उसी भाषा में विभिन्न साहित्य उत्पन्न हो सकते हैं। या तो यह मानना होगा कि अंग्रेजी भाषा में लिखे गए सभी साहित्यिक पाठ, चाहे वे अमेरिकी, ऑस्ट्रेलियाई, अफ्रीकी या एशियाई हों, एक साहित्य का हिस्सा हैं, या फिर यह स्वीकार करना होगा कि अमेरिकी साहित्य, ऑस्ट्रेलियाई साहित्य, इंडो-अंग्रेज़ी साहित्य, अफ्रो-अंग्रेज़ी साहित्य, अपनी भाषाई एकता के बावजूद अलग-अलग साहित्य हैं। यह अलगाव इसलिए स्वीकार किया जाता है क्योंकि ये साहित्य विभिन्न समूहों द्वारा उत्पन्न और उनके लिए निर्मित होते हैं। साहित्यिक इतिहास एक कालक्रम से भिन्न होता है क्योंकि इसमें साहित्यिक परंपरा में हुए परिवर्तन, साहित्यिक उत्पादन में भाग लेने वाले लोगों के बीच के संबंध, साहित्य के प्रसारण के साधन और विशेष समाज में आलोचना और रुचि के मानकों का अध्ययन किया जाता है। संभवतः एक आलोचक पाठों को व्यक्तिगत रचनात्मक शक्ति के अनूठे और समयातीत दस्तावेज के रूप में देख सकता है और उनको पूरी तरह स्वायत्त संरचनाओं के रूप में मूल्यांकित कर सकता है। परंतु साहित्य इतिहासकार न तो क्रोचे का यह दावा मान सकता है कि 'एक कला कृति हमेशा आंतरिक होती है' और आलोचक इसे 'किसी भी क्रम में रख सकता है', न ही वह केवल पाठों की कालानुक्रमिक व्यवस्था और उनके संबंधों पर बिना सामान्य इतिहास के संदर्भ के बात कर सकता है। संभवतः एक आलोचक पाठों को व्यक्तिगत रचनात्मक शक्ति के अनूठे और समयातीत दस्तावेज के रूप में देख सकता है और उनको पूरी तरह स्वायत्त संरचनाओं के रूप में मूल्यांकित कर सकता है। परंतु साहित्य इतिहासकार न तो क्रोचे का यह दावा मान सकता है कि 'एक कला कृति हमेशा आंतरिक होती है' और आलोचक इसे 'किसी भी क्रम में रख सकता है', न ही वह केवल पाठों की कालानुक्रमिक व्यवस्था और उनके संबंधों पर बिना सामान्य इतिहास के संदर्भ के बात कर सकता है। उसके लिए पाठ न केवल आपस में जुड़े और अक्सर परस्पर निर्भर होते हैं, बल्कि उस समुदाय के संपूर्ण इतिहास का भी हिस्सा होते हैं जिसने उन्हें बनाया है। यदि यह टेन (तेन) के त्रिकोणीय सिद्धांत की याद दिलाता है, तो भी इसमें तब तक कोई क्षमाप्रार्थी होने की ज़रूरत नहीं है जब तक कि इसे एक स्थूल परिवेश, नस्ल और क्षण यथार्थवादी नियतवाद (पॉजिविस्टिक डिटर्मिनिज्म) में नहीं बदला जाता। यदि साहित्यिक इतिहास को वर्गीकरण से आगे बढ़ना है, तो इसका प्रमुख उद्देश्य एक समय की कृति और किसी दूसरे समय की कृति के बीच के संबंधों को समझना होना चाहिए, और उनके उत्पन्न होने की स्थितियों को जानना होगा। ये संबंध केवल भाषाई और शैलीगत इतिहास के बीच पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं किए जा सकते, बल्कि उन लोगों के सामान्य इतिहास में खोजने चाहिए जो उस साहित्य को महत्त्व देते हैं।
ललित मोहन शिक्षा: एम.ए., एम.फिल्, पीएच.डी. दिल्ली विश्वविद्यालय से। विशेषज्ञता : भारतीय साहित्य, मध्यकालीन कविता, काव्यशास्त्र, भाषा विज्ञान एवं दलित साहित्य। डॉ. ललित मोहन के एम.फिल् शोध-प्रबंध का विषय 'पल्लव और परिमल की भूमिका का तुलनात्मक अध्ययन' है। आपके पीएच.डी. का शोध विषय 'मध्यकालीन हिंदी कवयित्रियों के काव्य में सामाजिक चेतना' रहा। यूजीसी की वृहद् शोध परियोजना के अंतर्गत किया गया शोध कार्य, जिसका विषय है- 'दलित साहित्य की अवधारणा और उसके अंतर्विरोध'। पुस्तक : मध्यकालीन हिंदी कवयित्रियों की सामाजिक चेतना। प्रोफ़ेसर (डॉ.) ललित मोहन के शोध परक लेख राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं।
Hindu (हिंदू धर्म) (14079)
Tantra (तन्त्र) (1053)
Vedas (वेद) (732)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2142)
Chaukhamba | चौखंबा (3458)
Jyotish (ज्योतिष) (1637)
Yoga (योग) (1212)
Ramayana (रामायण) (1310)
Gita Press (गीता प्रेस) (714)
Sahitya (साहित्य) (25495)
History (इतिहास) (9407)
Philosophy (दर्शन) (3729)
Santvani (सन्त वाणी) (2599)
Vedanta (वेदांत) (120)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist