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भारतीय वाङ्मय एवं कला में सरस्वती: Bharatiya Vanmaya Evam Kala Mein Sarasvati

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Specifications
Publisher: RESEARCH INDIA PRESS
Author Saroj Bhargav
Language: Hindi
Pages: 205 (with Color Illustrations)
Cover: HARDCOVER
11.0x9.0 Inch
Weight 840 gm
Edition: 2026
ISBN: 9789348309747
HCH423
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Book Description

भूमिका

     

 

भारतीय वाड्मय एवं कला में सरस्वती पुस्तक वाग्देवी, ज्ञान प्रदायिनी, वीणा वादिनी देवी सरस्वती विषय पर लिखी गयी एक शोधपरक पुस्तक है। परमात्मा ब्रहा ने जीवों पर अपनी अनुकम्पा बनाए रखने के उद्देश्य से सृष्टि का सृजन किया तथा देवों एवं देवियों को अलग-अलग कार्यभार सौंप दिया। ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती को ज्ञान एवं बुद्धि-वितरण का कार्य दिया गया। देवी सरस्वती ने ऋषि, महर्षियों, ज्ञानियों, बुद्धिमानी, कवियों के माध्यम से सर्वदा तथा सर्वथा ज्ञान का प्रसार किया। देवी सरस्वती की अनुकम्पा ऋक् आदि संहिताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों, आरण्यकों, उपनिषदों, पुराणों, रामायण, महाभारत, महाकाव्यों तथा भारतीय वाङ्मय एवं कला में अनवरत दृष्टिगत होती रही है। आज भी सभी मानव देवी सरस्वती की कृपा दृष्टि के अभिलाषी बन प्रार्थना करते हैं-

"या मेधां देवगणः पितरश्चोपासते ।

तया मामद्य मेधाविनं कुरु स्वाहा।।

भारतीय वाङ्मय में देवी सरस्वती के विविध रूपों के जिज्ञासुओं की संतुष्टि के उद्देश्य को पूर्ण करने में सक्षम यह पुस्तक महत्त्वपूर्ण एवं सराहनीय योगदान देगी ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है। अपने आंचल में संजोये ग्रन्थों का ज्ञान, सरस्वती का पृथ्वी पर विविध रूपों में अवतरण, सरस्वती के विविध नाम, उनका रूप व सौंदर्य, आभूषण, वेशभूषा उनके विभिन्न आसन व मुद्राएं, उनकी पूजा विधि, उनकी अर्चना मंत्र आदि का विशद वर्णन प्रस्तुत पुस्तक में सन्निहित है। इसके साथ ही संग्रहालयों में स्थापित मूर्तियों के चित्र तथा चित्रकारों द्वारा निर्मित वर्णनानुरूप कलात्मक चित्रों का संकलन इस पुस्तक को अधिकाधिक शोधपरक एवं उपयोगी बनाने में सक्षम है। इस अनमोल पुस्तक की लेखिका डॉ. सरोज भार्गव, अवकाश प्राप्त अध्यक्षा (कला-विभाग) तथा प्राचार्या (बैकुण्ठी देवी कन्या महाविद्यालय आगरा) सभी के लिए प्रेरणा स्रोत है, जिन्होंने अपनी आयु व शारीरिक बाधाओं को अनदेखा करके अपनी लगन, निष्ठा, परिश्रम, शोधपरक दृष्टि एवं बुद्धि का परिचय देते हुए इस ज्ञानपरक पुस्तक को प्रस्तुत कर कीर्तिमान स्थापित किया है। मैं अल्पज्ञ आपकी प्रखर बुद्धि को नमन करती हुई अवनत हूँ तथा आपकी पुस्तक संरचना की प्रशस्ति कर गौरवान्वित हूँ।

 

लेखक परिचय

 

डॉ. सरोज भार्गवः प्रस्तुत ग्रन्ध की लेखिका डॉ. सरोज भार्गव का जन्म भारत की सीमा लांघ कर ईरान में हुआ। बचपन से ही आपको कला अध्ययन के साथ-साथ प्राचीन भारतीय संस्कृति एवं इतिहास में गहरा अनुराग रहा। चित्रकला के अतिरिक्त कथल्क नृत्य में भी अभिरुचि थी। दयालबाग शिक्षण संस्थान डब्ल्यू टी.सी. जो कि अब डीम्ड विश्वविद्यालय है से स्नातक तक की शिक्षा ग्रहण की। 1967 में आगरा कॉलेज आगरा से चित्रकला में एम.ए. किया व 1978 में आगरा विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। 1967 में बैकुण्ठी देवी कन्या महाविद्यालय में प्रवक्ता, 1975 में स्नातकोत्तर कक्षायें खुल जाने पर अध्यक्ष, 2002 से 2006 तक प्राचार्य का पद संभाला। 2008 में डॉ. बी.आर. अंबेडकर विश्वविद्याय के कुलपति के आमन्त्रण पर ललित कला संस्थान में दो वर्ष निदेशक के पद पर कार्य किया। डॉ. बी.आर अंबेडकर विश्वविद्यालय में ललित कला संकाय की डीन रहीं। राज्य ललित कला अकादमी लखनऊ की तीन वर्ष सक्रीय सदस्या रही। अन्वेषणरत अनुसंधानकर्ताओं का मार्ग दर्शन किया जिनकी संख्या आज 50 से अधिक है। अनेकों शीर्षस्थ विश्वविद्यालय की बोर्ड ऑफ स्टडीज व रिचर्स डिग्री समिति आर.डी.सी. की परामर्शदात्री समिति में रही। राष्ट्रीय व अन्र्तराष्ट्रीय कार्यशालाओं में, सेमीनार, वर्कशॉप आदि में अनेकबार भाग लिया। फोटोग्राफी में विशेष रूचि के कारण आपको राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुआ है। महाविद्यालय में आपने यूजी. सी. की सहायता लेकर स्टील फोटोग्राफी को बी.ए. का एक विषय बनाया। नगर व देश की अनेकों संस्थाओं ने आपको सम्मानित किया। जिसमें कला शिल्पी, शिक्षक रत्न पुरस्कार सरस्वती सम्मान व रत्ना पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। आप कुशल प्रशासिका अपने विभाग की अध्यक्षा व महाविद्यालय प्राचार्य रही। एक सक्रीय चित्रकार है सामूहिक प्रदर्शनी में भाग लेती रहीं हैं। आगरा आर्टिस्ट एसोसिएशन 'थ्री-ए' की संस्थापक सदस्य हैं। 2012/2013 में यू.जी.सी. की फैलोशिप में आपने दयालबाग डीम्स विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया और अब दयालबाग Women's Polly Technique में सेवा में प्रवक्ता पद पर कार्यरत हैं। एक स्तक सौन्दर्यबोध व ललित कलायें व 20 शोध पत्र प्रकाशित कर चुकी हैं। 2024-25 में एक विशाल एकल चित्रकला प्रदर्शनी का आयोजन किया जिसका उद्घाटन माननीय महाविद्यालय सचिव मोहित गुप्ता जी व आधुनिक कला वीथिका के जनरल डायरेक्टर डॉ. संजीव गौतम ने किया। 2024-25 में राज्य ललित कला अकादमी उ.प्र. द्वारा प‌द्मश्री बाबा योगेन्द्र कला सम्मान प्राप्त हुआ। पुस्तकें 1. सौन्दर्य बोध व ललित कलायें 2. भारतीय कला का इतिहास हिन्दी अंग्रेजी 3. आगम कला मंच 4. अजन्त में रूप सौंदर्य 5. आलेखन कला

 

पुस्तक परिचय

 

वैदिक काल में देवी सरस्वती का प्रादुर्भाव सरस्वती नाम की नदी से हुआ। यह नवीन काल में हिमालय के हिमशिखरों से निकलकर सपासिंचन क्षेत्र में प्रवाहित होती थी तथा दक्षिणपूर्व समुद्र में गिरती थी। इसी नदी के प्राकृतिक परिवेश में ऋषियों ने अपने आश्रम बनाकर सर्वप्रथम विद्या, बुद्धि, ज्ञान और आध्यात्मिकता के क्षेत्र में उन्नति की थी। वहीं ऋग्वेदीय ऋचाओं का राजन किया गया। पैची, नृपों, मारुतों ने यहीं वज्ञ किये। अतः यह पुण्यस्थली देवभूमि के नाम से विख्यात हुई। इसी आधार पर नवी के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रदर्शन करते हुए तटवारियों ने सरस्वती नदी को देवी पद प्रदान किया और उसे विद्या, बुद्धि ज्ञान प्रदायिनी देवी माना गया। इस प्रकार नदी की परिणिति देवी रूप में हुई। ऋग्वेद के मन्त्रों में इसे भारती और सरस्वती, त्रिदेवियों को सम्मिलित और प्रथम रूप से यज्ञ की निर्विघ्न समाप्ति के लिए आमन्त्रित किया गया है। सरस्वती का देवी रूप में परिणत होने पर वेदकालीन अन्य देवों से भी सम्बन्ध रहा, जिनमें इन्द्र मारूत एवं अश्वनी प्रमुख है। ऋग्वेदीय वर्णन के अनुसार सरस्वती ने नमूचों द्वारा इन्द्र का सोमपान करने पर उसे दण्डित करने के लिए गाज प्रदान की। इन्द्र की तपस्या से उत्पन्न ज्योति पुंज से पीड़ित होने पर सरस्वती के आग्रह पर अश्वनियों ने सोत्रमणि यज्ञ कर इन्द्र की चिकित्सा की तथा सरस्वती ने अपने दुग्धवत् जल से पोषण किया. जिससे वह पुनः ओजवान बन सके। सरस्वती की लोकप्रियता से प्रभावित होकर जैनियों ने भी सरस्वती को अपनी पूजा अर्चना में सम्मिलित कर लिया। बौद्धों ने भी ब्राह्मण धर्म के देवी देवताओं को अपने पथ के प्रसार के लिए अपना लिया। इनमें सरस्वती का प्रमुख स्थान है। इन देवी देवताओं के रूपों को अपने अनुरूप परिवर्तित कर मूर्ति शास्त्र की रचना की। फलस्वरुप सरस्वती की पूजा भारत से बाहर चीन, जापान, कम्बोडिया, जावा आदि में पहुंची। बौद्धों में सरस्वती की संख्या सर्वाधिक है। पुराणों में सरस्वती का विशद् विवरण है। पुराणों के अनुसार सरस्वती ब्रह्मा की सहधर्मिणी के रूप में सृष्टि निर्माण में उनकी प्रेरणादायनी बनी। ब्रह्मा के अंतःकरण में पूर्व कल्प की स्मृति को जागृत कर उनके मुखों से वेदों का उद्घोष कराती हैं। विष्णु की सहचरी बन विश्व के भरण पोषण के दायित्व निर्वाह की सहयोगिनी बनी। शिवा शक्ति के रूप में राक्षसों के संहार में योगदान कर देव पूज्या बनीं। उपरोक्त वर्णन के अनुसार सरस्वती विद्या, बुद्धि, ज्ञान, संगीत प्रदायिनी देवी के साथ-साथ सृष्टि सृजन पालन, दुष्टों के संहार के दायित्वों को पूर्ण करती हुई पूर्ण सात्विक, पावन और सदाचारिणी बनी रही। सरस्वती की महिमा अपरम्पार है। आठ अध्यायों में विभक्त यह विषय भारतीय पृष्ठभूमि में सरस्वती (वाक्‌देवी) की अ‌द्भुत शक्ति एवं स्वरूप का सम्पूर्ण ज्ञान कराने में सक्षम सिद्ध होगा। मैंने इसे यथामति समझने का प्रयास किया है। इस प्रकार सरस्वती रूप विन्यास का अध्ययन जो अभी तक नहीं हुआ है, करना चाहती हूँ। मेरे मतानुसार भारतवर्ष के विभिन्न संग्रहालयों में सरस्वती रूप विन्यास की चर्चा होगी।

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