सूर्य का अवतरण अंधकार का नाश करता है एवं चन्द्रमा का अवतरण आह्लाद प्रदान करता है। ६ मई १९४२ को काल ने एक महापुरुष को जन्म दिया। इस महापुरुष का जन्म भी सूर्य के समान अधर्मरूपी अंधकार का नाश कर सनातन धर्मराज्य (ईश्वरीय राज्य, हिन्दू राष्ट्र) की स्थापना करने के लिए और चन्द्रमा के समान साधकों एवं भक्तों पर गुरुकृपा का आह्लाददायी वर्षाव कर उन्हें मोक्ष प्रदान करने के लिए हुआ। इस महापुरुष का, अर्थात सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत बाळाजी आठवलेजी (गुरुदेवजी) का यह संक्षिप्त चरित्र ! 'अखिल मानवजाति को गुरुदेवजी का माहात्म्य ज्ञात हो तथा उनकी सीख के अनुसार साधना कर सब आनन्दित हो', यह इस ग्रन्थ का प्रधान हेतु है।
गुरुदेवजी के व्यक्तित्व, कर्तृत्व एवं अवतारत्व के विविध पहलू !
विख्यात सम्मोहन उपचार विशेषज्ञ रहे डॉ. आठवलेजी की आरम्भ में अध्यात्म में विशेष रुचि नहीं थी; किन्तु अध्यात्म का महत्त्व ज्ञात होने पर उन्होंने अध्यात्मशास्त्र का अध्ययन एवं साधना की। उनकी लगन के कारण उन्हें वर्ष १९८७ में इन्दौर के महान सन्त प.पू. भक्तराज महाराजजी के रूप में गुरुप्राप्ति हुई। उन्होंने गुरुचरणों में तन-मन-धन अर्पित कर परिपूर्ण सेवा की। गुरु ने उनका आध्यात्मिक अधिकार विविध प्रकार से दर्शाया, उदा. वर्ष १९९२ में गुरु ने कहा, '(साधको,) आपको डॉक्टरजी को सन्त एवं गुरु मानना चाहिए !' डॉ. आठवलेजी की 'साधक' से 'उत्तम शिष्य' तक की बोधप्रद यात्रा इस ग्रन्थ के माध्यम से ज्ञात होती है।
गुरु ने डॉ. आठवलेजी को समष्टि साधना के लिए, अर्थात धर्मप्रसार के कार्य के लिए अनेक आशीर्वाद दिए । इसके पश्चात डॉ. आठवलेजी ने धर्मप्रसार का कार्य अनेक गुना बढाया । उन्होंने अध्यात्म, राष्ट्र एवं धर्म से सम्बन्धित बहुविध अंगों से जो कार्य किया, उसकी कोई तुलना नहीं है। अध्यात्मप्रसार शीघ्रता से होने के लिए वर्ष १९९९ में उन्होंने 'सनातन संस्था' की स्थापना की। उनके द्वारा किए गए अथक परिश्रम का फल ही है कि आज सनातन संस्था का कार्य दिन दोगुना चार चौगुना बढ रहा है ! जिज्ञासुओं को अध्यात्मशास्त्र में उच्च शिक्षा प्राप्त होकर ईश्वरप्राप्ति के विविध मार्गों के विषय में मार्गदर्शन प्राप्त हो, इसके लिए वर्ष २०१४ में गुरुदेवजी ने 'महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय' की स्थापना की। गुरुदेवजी से प्रेरणा लेकर 'हिन्दू जनजागृति समिति एवं 'मन्दिर महासंघ', ये संस्थाएं भी स्थापित हुई हैं तथा वे भी अत्यन्त सक्रिय हैं।
गुरुदेवजी ने धर्म, अध्यात्म, धर्मरक्षा, हिन्दू राष्ट्र की स्थापना जैसे विभिन्न विषयों पर अप्रैल २०२५ तक २७० ग्रन्थ-लघुग्रन्थों का स्वयं संकलन किया है एवं ९६ ग्रन्थ-लघुग्रन्थों के संकलन सेवा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। गुरुदेवजी ने अभी और ५,००० से अधिक ग्रन्थ प्रकाशित होंगे, इतना लेखन संग्रहित भी किया है। 'अध्यात्म विज्ञान की परिभाषा में समझाना', यह इन ग्रन्थों की प्रमुख विशेषता है।
गुरुदेवजी ने वर्ष १९९८ में आध्यात्मिक अधिष्ठान पर आधारित हिन्दू राष्ट्र की स्थापना की घोषणा की ! भारत में 'धर्मनिरपेक्षतावाद' के अतिरेक के काल में उन्होंने सर्वप्रथम यह सिंहगर्जना की थी ! इसके लिए उन्होंने सार्वजनिक सभाएं लेना, 'सनातन प्रभात' पत्रिकाएं आरम्भ करना, सन्तों का संगठन करना आदि कार्य किए। प.पू. स्वामी गोविंददेव गिरिजी ने भी गुरुदेवजी के विषय में निम्नलिखित प्रशंसात्मक उद्गार व्यक्त किए हैं, 'परम श्रद्धेय डॉ. आठवलेजी, इस सत्पुरुष ने गोवा में बैठकर तपस्या आरम्भ की एवं सम्पूर्ण राष्ट्र को व्याप्त करनेवाली ऊर्जा एवं चैतन्य का निर्माण किया। इसलिए राष्ट्र में सनातन धर्म के जयघोष का आरम्भ हुआ है !'
गुरुदेवजी को राष्ट्र एवं धर्म से सम्बन्धित किसी भी प्रकार का कार्य करनेवालों के प्रति आत्मीयता अनुभव होती है। इसलिए ऐसे लोगों को भी गुरुदेवजी साधकों के समान मार्गदर्शन कर सकते हैं। गुरुदेवजी पर श्रद्धा होने के कारण आज अनेक धर्मप्रेमी, राष्ट्रप्रेमी, हिन्दुत्वनिष्ठ आदि उन्हें गुरुरूप में मानने लगे हैं।
इसके साथ ही गुरुदेवजी ने साधकों को शीघ्र ईश्वरप्राप्ति होने के लिए 'गुरुकृपायोग' नामक अभिनव योगमार्ग का निर्माण, आश्रमों का निर्माण कार्य जैसे विविध कार्यों का सारांश इस ग्रन्थ में लिया गया है। गुरुदेवजी के इन सभी कार्यों की फलश्रुति क्या है ? गुरुदेवजी के मार्गदर्शन के अनुसार साधना कर १०.४.२०२५ तक १३१ साधक सन्त हुए हैं एवं १,०५३ साधक सन्त बनने के मार्ग पर हैं! वैसे ही सहस्रों साधक राष्ट्र एवं धर्म के कायों में अग्रणी भी हैं। विविध साम्प्रदायिक, धर्मप्रेमी, राष्ट्रप्रेमी, हिन्दुत्वनिष्ठ आदि को भी गुरुदेवजी के ये सभी कार्य निश्चित रूप से प्रेरक एवं मार्गदर्शक सिद्ध हो रहे हैं।
यह गुरुदेवजी के स्थूल स्तर के कार्यों के विषय में हुआ। उनका स्थूल स्तर का कार्य ३० प्रतिशत है एवं सूक्ष्म स्तर का कार्य ७० प्रतिशत है ! 'सूक्ष्म' अर्थात पंचज्ञानेन्द्रिय, मन एवं बुद्धि से जानने के परे का विषय । 'गुरुदेवजी ईश्वर के साथ एकरूप होते जा रहे हैं, इसलिए उनका कार्य भी ईश्वर के समान अधिकाधिक सूक्ष्म स्तर पर, ब्रह्माण्डव्यापी कैसे बनता जा रहा है ? हिन्दू राष्ट्र स्थूल रूप से स्थापित होने में सबसे बड़ी बाधा बननेवाली अनिष्ट शक्तियों से गुरुदेवजी सूक्ष्म स्तर पर युद्ध कैसे कर रहे हैं?' आदि से गुरुदेवजी के सूक्ष्म स्तर के कार्यों का परिचय होता है।
गुरुदेवजी की साधना के कारण उनमें बढा हुआ चैतन्य एवं निर्गुण तत्त्व के कारण उनकी देह, उनके उपयोग की वस्तुएं एवं वे जहां रहते हैं वह वास्तु, इनमें भी पंचतत्त्वों के स्तर पर बुद्धि-अगम्य परिवर्तन हो रहे हैं। ऐसे परिवर्तनों का शोधपरक अध्ययन करनेवाले गुरुदेवजी एकमात्र हैं! ये परिवर्तन व उसका अध्यात्मशास्त्र, यह भी इस ग्रन्थ की अद्वितीय विशेषता है।
'नाडीभविष्य (नाडीपट्टिका वाचन)' एक प्रगल्भ ज्योतिषशास्त्र है। इन नाडीपट्टिकाओं में सहस्रों वर्ष पूर्व ही गुरुदेवजी का अवतारमाहात्म्य लिखकर रखा गया है। गुरुदेवजी का यह अवतारमाहात्म्य अर्थात उनके चरित्र में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा, ऐसा ही अध्याय है!
'गुरुदेवजी का हिन्दू राष्ट्र की स्थापना का ध्येय साध्य न हो', इसके लिए अनिष्ट शक्तियों ने वर्ष १९८२ से गुरुदेवजी पर आक्रमण आरम्भ किए एवं अनेक बार उनपर महामृत्युयोग के संकट भी लाए; किन्तु सन्त एवं नाडीपट्टिकाओं के माध्यम से प्राचीन महर्षियों ने गुरुदेवजी की समय-समय पर सहायता की। अनिष्ट शक्तियों के आक्रमणों के कारण कुछ वर्षों से गुरुदेवजी को बहुत थकावट होना आदि विभिन्न शारीरिक कष्ट हो रहे हैं। ऐसा होते हुए भी केवल समष्टि (समाज) के कल्याण के लिए वे सक्रिय हैं। इससे भी उनकी दिव्यता का प्रमाण मिलता है।
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