पुस्तक परिचय
'कहते-कहते लड़की सरला के पास आकर उसके घुटनों से सट कर सरला के हाथों की चूडियों से खेलने लग गई थी। कौन कौन है तुम्हारे घर में, सरला ने पूछा । सरला के प्रश्न का उत्तर दिए बिना उसने प्रश्न पूछ लिया, आप मेरी माँ हो ?'
लेखक परिचय
गगन पन्तनई दिल्ली में जन्म और शिक्षा। बपचन में ही फुटबॉल से प्रेम और क्रिकेट से लगाव । वेंकटेश्वर कॉलेज से स्नातक । स्नातकोत्तर से पूर्व ही जीवन यापन हेतु भारत सरकार के विभिन्न मन्त्रालयों से सम्बद्ध। शिक्षा के दौरान ही आकाशवाणी में अस्थाई उद्घोषक और विभिन्न वार्ताओं, प्रश्नोत्तरी के कार्यक्रमों का प्रस्तुतीकरण। गद्य व पद्य लेखन तथा अनुवाद में रुचि । रूसी, संस्कृत और जापानी भाषा का अध्ययन यूरोप के कुछ देशों और जापान में इच्छानुरूप वास । उपन्यास 'तू या मैं' व 'तू और मैं' प्रकाशित तथा कविता संग्रह 'तुम लौट आओ' प्रकाशन प्रक्रिया में।
प्रस्तावना
मेरे बचपन में समाज में एसा माहौल था कि उस समय के सुख-दुख पड़ीसियों को भी भाई सम बना देते थे। शायद यही कारण था कि जिस हवेली जैसे घर में हम रहते थे, उस में रहने वाले अन्य सभी परिवारों के लोग अपने घर के सदस्यों की तरह ही लगते थे। उस घर में बच्चों की संख्या काफी थी और खेलों में सभी की रुचि थी। तब के खेलों में अतिरिक्त साधनों की अधिक आवश्यकता नहीं होती थी। खो-खो, पिट्टू, लैंगड़ी टाँग, संगली, छुपन-छुपाई, ऊँच-नीच और क्रिकेट, फुटबाल आदि प्रमुख खेल थे। दिन भर की कूद-फाँद के बाद सान्ध्य-समय में सब बच्चे एक जगह मिल बैठते। घर में बच्चों को शाम के समय खेल-कूद की मनाही थी। वह घर जाने का समय भी होता था, इसलिए सब एक जगह एकत्र हो जाते। किसी सभा प्रमुख की तरह छत पर या बरामदे की सीढियों में बैठ कर में अक्सर सभी हम उम्र बच्चों को कहानी सुनाता। सूर्य ढलने से अन्धेरा छा जाने तक, कभी याद रही कहानियां और कभी मनगढन्त कहानी सुनाया करता। साहित्य समाज का दर्पण होता है। अतः, मेरा मानना है कि जिस प्रकार हम शीशे में अपने को देख कर सुन्दर बनने का प्रयास करते हैं, उसी प्रकार साहित्य में भी समाज की सुन्दरता को निखारने का प्रयास होना चाहिए । लेखन का उद्देश्य रंजन और रेचन ही होना चाहिए केवल समाज की छवि उतारना उद्देश्य नहीं होना चाहिए। यह मेरा पहला कहानी संग्रह है। मेरे परिवार के लोगों का भी इसे लिखने में जो अकथनीय और अप्रकाशित, अनमोल योगदान रहा और लेखन उपरान्त पठन-पाठन द्वारा जो दिशा और समर्थन मिला, उसके लिए में परिवार के सभी सदस्यों का ऋणी रहूँगा। पठन उपरान्त यदि पाठक को इन्द्रधनुषीय आनन्द के साथ आत्मीय सुख की अनुभूति हुई होगी तभी इस कृति को मैं अपनी सफलता समझेंगा।
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