भूमिका
छायावाद का संक्षिप्त परिचय
छायावाद हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण काव्य-आंदोलन है, जिसका उदय बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में हुआ। इसे हिन्दी कविता का प्रथम सशक्त आधुनिक आंदोलन माना जाता है। छायावादी काव्य में कवि की आत्मानुभूति, भावनात्मक संवेदना, कल्पनाशीलता और रहस्यात्मक चेतना का प्रधान स्थान है। यह काव्यधारा बाह्य यथार्थ से अधिक अंतर्जगत की अभिव्यक्ति पर बल देती है। छायावाद के माध्यम से हिन्दी कविता में व्यक्तिवाद, सौंदर्यबोध और आध्यात्मिकता का नया आयाम स्थापित हुआ।
हिन्दी काव्य-परंपरा में छायावाद का स्थान
हिन्दी काव्य-परंपरा में छायावाद का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। भक्तिकाल और रीतिकाल के पश्चात हिन्दी कविता जिस संक्रमणकाल से गुजर रही थी, छायावाद ने उसे नवीन दिशा और चेतना प्रदान की। जहाँ भक्तिकाल में ईश्वर-भक्ति और रीतिकाल में श्रृंगार की प्रधानता थी, वहीं छायावाद ने मानव-मन की सूक्ष्म भावनाओं, पीड़ा, विरह, आनंद, आकांक्षा और अस्मिता-बोध को काव्य का केंद्र बनाया।
"छायावाद" शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी और जयशंकर प्रसाद के समय में प्रचलित हुआ। इसका अर्थ है काव्य में अंतरात्मा की सूक्ष्म, रहस्यमयी और भावमय छाया का प्रस्फुटन। यह आंदोलन भारतीय संस्कृति, प्रकृति, प्रेम, सौंदर्य और रहस्यात्मकता के संगम का परिणाम है। छायावाद ने हिन्दी में खड़ी बोली कविता को पूर्णतः प्रतिष्ठित कर दिया। इसके बाद ब्रजभाषा हिन्दी काव्यधारा से बाहर हो गई। इसने हिन्दी को नए शब्द, प्रतीक तथा प्रतिबिंब दिए। इसके प्रभाव से इस दौर की गद्य की भाषा भी समृद्ध हुई। इसे 'साहित्यिक खड़ीबोली का स्वर्णयुग' कहा जाता है।
आधुनिक हिन्दी कविता का आरम्भ भारतेन्दु युग से माना जाता है। उससे पूर्व हिन्दी में यत्र-तत्र खड़ी बोली कविता का आभास करवाने वाली फुटकल काव्य-पंक्तियों को नजरअंदाज कर दिया जाए, तो खड़ी बोली में आधुनिक हिन्दी कविता की अविच्छिन्न परम्परा का आरम्भ वस्तुतः भारतेन्दु से ही हुआ। इसलिए विकास की दृष्टि से भारतेन्दु युग खड़ी बोली हिन्दी कविता का आरम्भिक युग है।
कई पड़ावों से होती हुई खड़ी बोली हिन्दी कविता का स्वरूप निरन्तर प्रौढ़ और कलात्मक होता गया। खड़ी बोली हिन्दी कविता की विस्तृत भूमिका और सुदृढ़ पीठिका भारतेन्दु युग में ही निर्मित हुई। द्विवेदी युग में उसका विस्तार और परिष्कार हुआ। अगले चरण, अर्थात् छायावादी युग में खड़ी बोली हिन्दी कविता का पूर्ण विकास और कलात्मक उत्कर्ष दिखाई देता है। काव्य-सौन्दर्य और साहित्यिकता के अनुरक्षण की दृष्टि से छायावादी काव्य में आधुनिक हिन्दी कविता का उत्कृष्ट और उन्नत स्वरूप दृष्टिगत होता है।
आधुनिक हिन्दी कविता में छायावाद को एक ऐसे आन्दोलन के रूप में जाना जाता है, जिसे आलोचना-प्रत्यालोचना, प्रशंसा और निन्दा दोनों स्थितियों का सर्वाधिक शिकार होना पड़ा। छायावाद की प्रशंसा करनेवालों में यदि नन्ददुलारे वाजपेयी, डॉ. नगेन्द्र, शान्तिप्रिय द्विवेदी आदि का उल्लेख किया जा सकता है, तो आलोचना करनेवालों में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, रामविलास शर्मा, डॉ. देवराज और मुक्तिबोध आदि का नाम लिया जा सकता है। छायावाद के प्रशंसकों ने जहाँ एक ओर व्यापकता और प्रभाव में छायावाद को भक्तिकाल के समकक्ष माना, उसे आधुनिक हिन्दी कविता का स्वर्णयुग तक कहने का आग्रह किया और कामायनी जैसी सुकुमार कृति में महाकाव्य तक के स्वर सुने, वहीं उसकी कटुआलोचना करनेवालों ने उसे 'बाहरी चटक मटक पर अधिक ध्यान देनेवाली शैलीमात्र', 'कुंठा का काव्य', 'रीतिकाल का पुनरागमन' के साथ ही प्रसाद को' बूज्र्जाजी का अन्तिम मुमूर्ष कवि' के रूप में याद किया; कतिपय आलोचकों ने अपने आक्रोशित स्वर की भी अभिव्यक्ति की। प्रशंसा और आलोचना के विवादों से छायावाद का नाता सम्भवतः सबसे अधिक रहा। बावजूद इनके आधुनिक हिन्दी कविता का उत्कृष्ट कलात्मक रूप छायावादी काव्य में ही दिखाई देता है। भाषा, भाव, कथ्य, शिल्प आदि सभी दृष्टियों से छायावादी कविता एक कलात्मक अभिव्यक्ति के रूप में रेखांकित की जा सकती है। कल्पना, विद्रोह, भावप्रवणता, प्रेम, सौन्दर्य, निराशावाद, पलायनप्रवृत्ति, प्रतीकात्मकता, रहस्यपरकता, कोमल भावाभिव्यक्ति आदि रोमांटिक एवं स्वछन्दतावादी काव्यप्रवृत्तियों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति के कारण छायावादी काव्य को 'रोमांटिक काव्य' अथवा 'स्वछन्दतावादी काव्य' कहने का आग्रह किया गया, जिसका स्वाभाविक विकास द्विवेदीयुगीन आदर्शवादी काव्याभिव्यक्ति के पश्चात् हुआ।
आधुनिक हिन्दी कविता के साहित्यिक विकास और कालक्रम की दृष्टि से छायावाद का उदय द्विवेदीयुगीन काव्य-रचना की व्यापक पूर्वपीठिका पर हुआ। माना जाता है कि द्विवेदीयुगीन काव्यरचना में स्थूलता का अधिक निर्वाह दिखाई देता है। इस काल में विकसित होनेवाली काव्यप्रवृत्तियों में घोर उपयोगितावाद, अतिआदर्शवाद, अतिकथात्मकता आदि के कारण उसमें इतिवृत्तात्मकता की प्रवृत्ति अधिक थी। इतिवृत्तात्मक का उस काल की कविता में कथनों की अधिकता से है। कथनों से परिपूर्ण काव्य को इतिवृत्तात्मक माना जाता है। द्विवेदीयुगीन हिन्दी कविता में काव्यसौन्दर्य और साहित्यिक संवेदना की मार्मिक अभिव्यक्ति के अभाव की चर्चा आलोचकों ने बार-बार की है। एक भावुक कवि-कलाकार को आकृष्ट करने में हृदय की मार्मिक अनुभूति और कोमल संवेदना से रहित काव्यसर्जन समर्थ नहीं होता। द्विवेदीयुगीन कविता में नैतिकता और आदर्श पर व्यापक जोर था, वैयक्तिक अनुभूतियों से सम्पृक्त आन्तरिक भावाभिव्यक्तियों का आग्रह कम था। इनका एकदम से अभाव तो नहीं था, पर अधिकांशतः नैतिकता और आदर्श पर बल देने के कारण इतिवृत्तात्मकता और स्थूलता के आरोप को सिरे से नकारा भी नहीं जा सकता। अतिभावुकता, अतिकोमलता, अतिकल्पनाशीलता और अतिवैयक्तिकता के प्रति विशेष आग्रह के कारण छायावादी कविता में जो सूक्ष्मता, आन्तरिकता एवं मार्मिकता भरी हुई थी, उससे पूर्व, द्विवेदी युग में इसका नितान्त अभाव था। इसी कारण छायावाद को द्विवेदीयुगीन कविता की प्रतिक्रिया कहा गया। इसका आरम्भआचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ही किया। उन्होंने ' इतिवृत्तात्मकता की प्रतिक्रिया', 'इस (द्विवेदीयुगीन काव्य) परिस्थिति के विरुद्ध गहरा प्रतिवर्तन, इतिवृत्तात्मक कविता के विरुद्ध', 'स्थूल के प्रति सूक्ष्म की प्रतिक्रिया' आदि कथनों के माध्यम से छायावादी काव्य को द्विवेदीयुगीन कविता की प्रतिक्रिया कहा। आगे चलकर डॉ. नगेन्द्र ने शुक्ल जी के उक्त कथन का बहुत प्रांजल और भड़कीला स्वरूप प्रस्तुत कर, छायावादी काव्य को, 'स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह कहा, जिसे छायावाद के सन्दर्भ में आज प्रायः उद्धृत किया जाता है।
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