लेखक परिचय
अपर्णा झा एम.ए. (राजनीतिशास्त्र), एम.एड (शिक्षाशास्त्र), नेट (राजनीतिशास्त्र एवं शिक्षाशास्त्र) बहुत ही अनुभवी शिक्षिका हैं। जिन्होंने शिक्षा जगत में अपना बहुमूल्य योगदान दिया है। वर्तमान में सिद्धो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका से राजनीतिशास्त्र विषय से संबंधित विषय संथाल परगना में शहरी स्थानीय स्वशासन की कार्यप्रणाली एक व्यष्टि अध्ययन, पर शोध कार्य कर रही हैं तथा एक सफल सहायक प्राध्यापिका के रूप में 2016 से हिन्दी विद्यापीठ शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान में कार्यरत है। प्रकाशन के क्षेत्र में इन्होंने कई शोध पत्र भारत के विभिन्न शैक्षणिक पत्रिकाओं में प्रकाशित किये है। लेखन में शिक्षण के सभी बिन्दुओं पर चर्चा की गई है तथा पुस्तक को छात्रों के लिए उपयोगी बनाने का प्रयास किया गया है। फिर भी अपूर्णता तथा त्रुटि करना मानव की प्रकृति है अतः संशोधनार्थ आपके मार्गदर्शन एवं सुझावों की प्रतिक्षा है।
प्रस्तावना
नागरिकशास्त्र मनुष्य को समाज में रहकर आदर्श नागरिक बनने का पथ प्रदर्शित करता है। मनुष्य का दैनिक जीवन विभिन्न क्रिया-कलापों में व्यतीत होता है। अतः आदर्श नागरिक बनने हेतु अन्य शास्त्रों की भी जानकारी जरूरी है। बहुत से सामाजिक शास्त्र तो ऐसे हैं, जिनमें विभेद करना कठिन है, जैसे नागरिकशास्त्र एवं राजनीतिकशास्त्र, नागरिकशास्त्र एवं सामाजिकशास्त्र, इतिहास आदि। शास्त्रों को सामान्यतः दो वर्गों में विभक्त किया जाता है। प्राकृतिकशास्त्र एवं सामाजिकशास्त्र । प्राकृतिकशास्त्रों में भौतिक एवं रसायनशास्त्र आदि आते हैं। सामाजिकशास्त्रों में नागरिकशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, इतिहास, अर्थशास्त्र एवं समाजशास्त्र आदि हैं। नागरिकशास्त्र एक सामाजिक शास्त्र है इसलिए इसका अन्य सामाजिक शास्त्रों से सम्बन्ध होना जरूरी एवं स्वाभाविक है। नागरिकशास्त्र शिक्षण में पाठ्य-पुस्तकों का स्थान शिक्षक की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है। शिक्षक के अव्यवस्थित ज्ञान को नागरिकशास्त्र की पाठ्य-पुस्तकें ही व्यवस्थित करती हैं। पाठ्य-पुस्तकों के द्वारा शिक्षक को नवीन बातों का ज्ञान विशद ढंग से प्राप्त होता है। अतः अगर हम छात्रों में नवीन ज्ञान, अच्छे नागरिक गुणों का विकास करना चाहते हैं तो विद्यालय में पाठ्य-पुस्तकों के महत्त्व को नहीं नकार सकते हैं। राजनीतिशास्त्र या राजनीति विज्ञान अत्यन्त प्राचीन विषय है। प्रारंभ में इसे स्वतंत्र विषय के रूप में नहीं स्वीकारा गया। राजनीति विज्ञान का अध्ययन नीतिशास्त्र, दर्शनशास्त्र, इतिहास, एवं विधिशास्त्र आदि की अवधारणाओं के आधार पर ही करने की परम्परा थी।
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