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वृन्दावन की समाज गायन परम्परा: The Community Singing Tradition of Vrindavan

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A Survey Based on the Samaj Gayan Tradition of Vrndavanaa the Samaj Series of Specific Sites, Subject-Wise Manuscripts from Institutional Collections, Oral Tradition, and Musical Aspects

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Specifications
Publisher: VRINDAVAN SHODH SANSTHAN
Edited By Ganga Priya
Language: HINDI AND BRAJ
Pages: 283 (Glossy Color Illustrations)
Cover: Hardcover
9.0x6.0 Inch
Weight 490 gm
Edition: 2026
ISBN: 9788197338274
BA2604
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Book Description
पुस्तक परिचय

वृन्दावनी उपासना के परिप्रेक्ष्य में रस, रसिक, और रसोपासना साधारण शब्द नहीं एक भावस्थिति है। समाज गायन के माध्यम से यह भाव-त्रयी साधक का स्व- इष्ट से साक्षात्कार कराती है। यह महत्त्वपूर्ण है कि रसिक साधक जब समवेत स्वर में युगल की निकुंज लीलाओं का भाव केन्द्रित सामूहिक गायन करते हैं तो उसके मूल में प्रायः पूर्व पीढ़ी के रसिक-साधकों द्वारा प्रकटित भावपरक रचना अथवा रचित वाणी होती हैं। इस धरातल पर वाणी जी का भाव गहरा है। काव्य रचना का गुण भौतिक जगत के लिये वैशिष्ट्य हो सकता है पर साधकों के लिये यह स्व आराध्य की लीलाओं के मध्य समुपस्थित रहकर पुनः-पुनः चिंतन से निसृत वह नवनीत है, जिसका सान्निध्य प्राप्त कर वह तत्काल मानसी सेवा के माध्यम से स्व आराध्य प्रियालाल जू के परिकर में प्रवेश का अधिकारी बनता है। रसिक संत मुखोद्‌गीर्ण भावपरक ब्रजभाषा पदावलियों के भाव पगे अक्षरों का समवेत गायन श्यामा-श्याम के साकार रूप का प्राकट्य करने वाला है। यह भाव भौतिक जगत की वाह-वाह से दूर, वाणी-अक्षर रूपी पालकी के माध्यम से साधक को उस दिव्य निकुंज के पथ का पथिक बनाकर वहाँ समुपस्थ्ति रखने की सामर्थ्य रखता है, जहाँ प्रियालाल का नित्य विहार है और सपरिकर नित्य नूतन लीलाएं- अक्षर धुरि की पालकी, आई सु रसिकनि लैंन। वाह-वाह करि रह गए, चढै सु पहुँचे ऍन ॥ समाज गायन परम्परा के अन्तर्गत वाणी के रूप में सम्बोधित पोथी का यह वैशिष्ट्य हमारा ध्यान इससे जुड़ी उस समृद्ध लिखित परम्परा की ओर इंगित कराता है, जो मुद्रण पूर्व हस्तलिखित ग्रंथों के युग में समाज गायन से जुड़ी है। यह परम्परा विभिन्न वैष्णव परम्पराओं यथा- निम्बार्क, राधावल्लभ, हरिदासी आदि के विगत कोई पाँच शताब्दियों से विस्तार पाती रही है। समाज गायन के परिप्रेक्ष्य में पोयी का 'वाणी जी' सम्बोधन तथा इससे जुड़ा सांस्कृतिक परिदृश्य स्वयं को एक बड़े फलक पर स्थापित करता है। रसिक संतों के पीढी दर पीढी चिंतन से फलित पोथिर्यो की समृद्ध श्रृंखला हमें परम्पराओं के प्रति गौरव बोध कराती है। वृन्दावनस्थ रसिक आचार्यों की त्रिवेणी हरित्रयी (गो हरिवंश, स्वामी हरिदास और रसिक संत हरिराम व्यास जी) इसके मूल में हैं। वृन्दावन शोध संस्थान सहित देश-विदेश के विभिन्न पाण्डुपि ग्रंथागार और परम्पराबद्ध सुधीजनों के निजी संग्रहाँ में विद्यमान पद संग्रह तथा उत्सव सम्बन्धी ब्रजभाषा पदावलियों (वर्षोत्सव) की पोथियाँ समाज गायन से जुड़ी लिखित पराम्परा के सुदृढ़ धरातल को दर्शाती हैं। साधकों की दृष्टि से समझें तो इस उपासना में पीढी दर पीढी रचे-पगे रसिक संतों की वाणियों से प्राप्त अनुभूति ही श्यामा-श्याम की उन निकुंजस्थ लीलाओं से साक्षात्कार कराने में समर्थ है जो वृन्दा-विपिन में अनवरत हैं और रहेगी- बैननि के नैननि सौं, दरस्यौ युगल स्वरूप। नैननि के बैनानि सौं, वरन्यौ वरन अनूप ।। प्रस्तुत ग्रंथ में डॉ गंगाप्रिया के द्वारा विभिन्न अध्यार्यों के अन्तर्गत वृन्दावन की समाज गायन परम्परा से जुड़े महत्त्वपूर्ण पक्षों पर प्रकाश डाला गया है। परम्पराबद्ध सुधीजनों के साक्षात्कार द्वारा संकलित सामग्री से ग्रंथ की उपादेयता बढी है। ग्रंथ के सम्पादन एवं प्रकाशन हेतु डॉ० गंगाप्रिया को बहुत-बहुत मंगलकामनाएं। विश्वास है यह पुस्तक संस्कृति प्रेमी विज्ञ जनों के लिये उपयोगी होगी

लेखक परिचय

डॉ गंगा प्रिया शैक्षिक उपलब्धियां - संयोत प्रभाकर, एम. ए. (संगीत यायच) राजामाचोर संत एवं काला विश्वविद्यालय, ग्वालियर मध्य प्रदेश पैट/जे. आर. एकर पीएर डी. (संगीत गायन संगीत एवं ललित कला संकाय, दिल्ली विश्वविद्यालय O-level कोयूटर पुरस्कार/अध्येतावृत्ति (फैलोशिप) - विश्वविद्यालय अनुदान आयोग [DGC] द्वारा प्रदान की गई जूनियर रिसर्च फेलोशिय (2018) और सीनियर रिसर्च फेलोशिप (2023) नाद चर्तन जपल ऑफ एंड म्यूजिक द्वारा वर्ष 2024 के लिए 'कृष्ट श्ोध पत्र पुरस्कार से सम्याचित। वृंदावन को समाज-गायन परंपरा में महत्वपूर्ण योगदान हेतु श्रहित परमानन्द शोध संस्थान द्वारा 10वाँ श्री हितनिधि सम्मान-2025 से सम्मानित। ICSSR, शिक्षा मंत्रालय द्वारा पोस्ट डॉक्टोरल फैलोशिप के लिए चयनित (2026) शास्त्रीय संगीत प्रशिक्षण एवं गुरु शिष्य परम्परा- ख्याल गायकी: इंदौर किराना घराने के डरें इाहिम अली जी के वरिष्ठ शिष्य, गुरु श्री बिशन सिंह जी (इंदौर-किराना घराना से प्रशिक्षण 12 वर्ष। ध्रुपद गायको : गुरु श्री दीपबंधु शरणदेव जी महाराज (हरिदासी सोप्रदाय, कुंदावन) से प्रशिक्षण-3 वर्ष। ख्याल गायकी का उन्नत प्रशिक्षणः गुरु श्रीअलचटर्जी जी पंडित अजयचक्रवती जो के वरिष्ठ शिष्य) 2024 से निरंतर प्रकाशित शोध पत्र - वृंदावन की देवालयी दैनदियी समाज गायन परंपरा की वर्तमान स्थिति श्री हरिदासी संप्रदाय के 'अपुराय संगीत' की 'समाज गायन' परंपरा। अभिरुचि - वृन्दावन के रसिकाचार्यों की वाणियों, ग्रंथों एवं जज की शास्त्रीय सांगीतिक विधाओं का शोधपरक अनुशीलन। शास्त्रीय संगीत के भक्ति पक्ष के सरेक्षण प्रचार एवं प्रसार की योजनाओं में सक्रिय सहयोग।

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