पादप और पत्थर में परमात्मा के दर्शन करने वाली भारतीय पृष्ठभूमि में धर्म एवं प्रकृति का संयोग एवं संबंध सर्वत्र मिलता है। भारत के आदितम् सभ्य मनुष्यों ने प्रकृति एवं उसके उपादानों, पशु-पक्षियों, पादपों आदि को आध्यात्मिक रूप प्रदान करके, भारतीय धर्म एवं प्रकृति का संयोग एवं संबंध अभिन्न रूप से जोड़ दिया है। प्राक् धार्मिक जीवन-पद्धति एवं धर्म का विकास प्रकृति एवं उसकी विभिन्न शक्तियों से प्रभावित होकर हुआ। इसी कारण चिरकाल से ही भारतीय पृष्ठभूमि में धर्म एवं प्रकृति का संयोग एवं संबंध का चिंतन भारतीय सांस्कृतिक जीवन में स्थायी रूप से समाहित रहा।
प्राचीन भारतीय मनीषियों ने हमारी दिनचर्या को धर्म से जोड़कर धर्म एवं प्रकृति का संयोग एवं संबंध की भावना की परिपाटी को विकसित करने एवं उसको बढ़ाने का प्रयास किया। प्रातः काल अरुणिमा में उठकर सरोवरों या सरिताओं में स्नान करना एवं स्नान के समय एवं उसके बाद में मंत्रोच्चारण कर पूजा-पाठ करना आदि से मन शान्त एवं वातावरण शुद्ध होता हैं। यज्ञादि की आहुतियों से उत्पन्न धुएँ से वातावरण शुद्ध होता है। हवन एवं पूजा पाठ के समय मंत्रोच्चार की ध्वनि तरंगों के साथ ही शंख-ध्वनि एवं घंटियों आदि के बजाने से उत्पन्न तरंगों से मानव मस्तिष्क शरीर एवं संपूर्ण वातावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। हमारे धार्मिक क्रियाकलापों एवं त्यौहारों में वृक्ष एवं पशु-पूजा का विशिष्ट महत्व सदा से रहा है। हमारे धर्म एवं संस्कृति में नदियों, पर्वतों, पत्थरों तथा वृक्षों से लेकर माटी तक की पूजा का विधान करके भारतीय पृष्ठभूमि में धर्म एवं प्रकृति का संयोग एवं संबंध स्थापित करने का प्रयास किया गया है।
भारतीय इतिहास के अनुशीलन से विदित होता है कि, चिरकाल से ही प्रकृति एवं पर्यावरण के विभिन्न रूपों को धर्म एवं संस्कृति में समाहित कर संरक्षण प्रदान किया गया है। गायत्री मंत्र में "ॐ भूर्भुवः स्वः" में प्रार्थना है कि, जो सूर्य, पृथ्वी, भुवः और स्वर्ग तीनों लोकों को प्रकाशमान करता है, वह मेरी बुद्धि को भी दिव्य और प्रखर करे। सूर्य के तेज को बुद्धि के तेज से जोड़ने की कामना प्रकृति के तत्वों को संस्कृति से जोड़ने की कामना ही तो है। हड़प्पा कालीन धर्म एवं संस्कृति में पवित्र पशुओं, वृक्षों एवं नदियों का संकेत हम पाते हैं। हड़प्पा सभ्यता में पीपल, बबूल, नीम, खजूर ताड़ आदि वृक्षों तथा वृषभ, नाग आदि पशुओं एवं जल-पूजा आदि के साक्ष्य मिले हैं।
प्रारम्भिक आर्य प्रकृति की विविध शक्तियों को देवत्व का रूप मानकर उनकी उपासना किया करते थे। वैदिक आर्यों के देवताओं को हम प्रकृति के विभिन्न रूपों में देख सकते हैं। द्यौ-आकाश का देवता, पृथ्वी-भूमि की देवी, वरूण-व्यापक आकाश, इन्द्र-वर्षा का देवता, सूर्य, सविता, मित्र, पूषन् या विष्णु के रूप में, मरुत-वायु का देवता, दो अश्विन - सांयकाल के दो तारे और उषा-भोर की देवी ये सब प्रकृति के अभिन्न रूप हैं। इस प्रकार प्रकृति के तत्वों का दैवीकरण करके हमारे प्राचीन बुद्धिजीवी मनीषियों ने प्रकृति एवं धर्म को अभिन्न रूप से एकीकृत कर दिया है।
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