समकालीन हिंदी साहित्य' भारतीय समाज के परिवर्तित रूप और विचारधाराओं का प्रतिबिंब है। यह साहित्य न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह हमारे समय की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक एवं मानवीय स्थितियों, व्यक्तिगत मुद्दों को भी अभिव्यक्त करता है। समकालीनता किसी विशेष समय में घटित सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों की साक्षात् अनुभूति और समझ को व्यक्त करती है। यह न केवल किसी रचनाकार द्वारा अपने समय को देखने और समझने का तरीका है बल्कि उस समय की जटिलताओं, अंतर्विरोधों और बदलावों को साहित्य में समाहित करने की चेतना भी है। अतः समकालीनता वह बौद्धिक और रचनात्मक चेतना है जो अपने वर्तमान समय के प्रश्नों, संघर्षों और संभावनाओं को पहचानते हुए उसे सृजन के केंद्र में लाती है। समकालीन हिंदी साहित्य में समाज के विविध पहलुओं जैसे जातिवाद, धर्म, लैंगिक समानता और राजनीति पर गंभीर विचार विमर्श किया गया है। समकालीन हिंदी साहित्य समाज के बदलते हुए स्वभाव और समस्याओं को बारीकी से उजागर करता है। इसके साथ ही हमें यह भी समझने का अवसर प्रदान करता है कि कैसे साहित्य समय के साथ-साथ विकसित हुआ और विभिन्न सामाजिक परिवर्तन, राजनीतिक उथल-पुथल और नई विचारधाराओं का सामना करते हुए नई दिशा की ओर अग्रसर हुआ । वास्तव में समकालीन हिंदी साहित्य भारतीय समाज, संस्कृति और राजनीतिक परिवर्तनों का दर्पण है। यह साहित्य न केवल आज के समय की सोच और दृष्टिकोण को व्यक्त करता है, बल्कि यह साहित्यिक परंपराओं का भी पुनर्विलोकन करता है। समकालीन हिंदी साहित्य में विभिन्न प्रवृत्तियाँ, विमर्श, आधुनिकता और पौराणिकता एवं पर्यावरणीय चिंताएँ प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त साहित्य में तकनीकी उन्नति और डिजिटल युग की प्रतिक्रियाएँ भी देखने को मिलती हैं। समकालीन लेखकों की लेखनी ने आम आदमी की मानसिकता, सामाजिक असमानताओं और शोषण के विरुद्ध जागरूकता फैलाने का काम किया है। परिवर्तन सृष्टि का नियम है, समय परिवर्तित होता है, समाज परिवर्तित होता है और साथ-साथ समाज में व्याप्त समस्याएं भी परिवर्तित होती रहती हैं। समकालीन युग वैश्वीकरण, औद्योगिकरण, मशीनीकरण, उदारवाद और बाजारवाद का युग है। आज के उत्तर आधुनिक समय में मनुष्य विविध समस्याओं से जूझ रहा है चाहे वह आदर्श समाज के ढांचे का विघटन हो या पारिवारिक संबंधों का विघटन तथा इसी कारण आज का मनुष्य तनाव, पीड़ा एवं संत्रास ग्रस्त है। वर्तमान भौतिकतावादी युग में मनुष्य स्वार्थांधता के कारण संवेदनहीनता की ओर अग्रसर हो रहा। समकालीन साहित्यकार अपने काल की समस्याओं, संघर्षों एवं चुनौतियों के प्रति सजग है और इसकी यथातथ्य अभिव्यक्ति समकालीन साहित्य में दर्शनीय है। समकालीन हिंदी साहित्य में इतिहासबोध और भविष्य की संभावनाओं का वर्तमान बोध के साथ सुंदर सामंजस्य दिखाई देता है। यह साहित्य केवल मनोरंजन या भावनाओं की अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें समाज के यथार्थ, संघर्ष, और संभावनाओं का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। बदलते समय के साथ साहित्य ने अपनी परंपरागत सीमाओं को तोड़ते हुए नए प्रतिमानों को अपनाया है। प्रस्तुत पुस्तक में समकालीन हिंदी साहित्य की विविध विधाओं और विभिन्न साहित्यकारों के युगबोध का गहनता से अकृययन कर अपने पाठकों के समक्ष वर्तमान युग की नवीन समस्याओं को चित्रित करने का प्रयास किया गया है। हिंदी साहित्य समाज का आईना है और यह पुस्तक उस आईने को साफ करके हमें समाज की छवि स्पष्ट रूप से दिखाने का कार्य करती है। 'समकालीन हिंदी साहित्य' में विषयों और दृष्टिकोणों की व्यापकता है। इसमें ग्रामीण भारत की समस्याएँ, शहरीकरण, पर्यावरणीय संकट, स्त्रीवाद, दलित साहित्य, आदिवासी जीवन और ग्लोबलाइजेशन जैसे मुद्दे शामिल हैं। इस पुस्तक का उद्देश्य हिंदी साहित्य की उन प्रवृत्तियों को उजागर करना है, जो समकालीन समाज के महत्वपूर्ण प्रश्नों को संबोधित करती हैं।
'समकालीन हिंदी साहित्य' की विविध विधाओं और विभिन्न साहित्यकारों के युगबोध का गहनता से अध्ययन कर अपने पाठकों के समक्ष वर्तमान युग की नवीन समस्याओं को चित्रित करने का प्रयास किया गया है। हिंदी साहित्य समाज का आईना है और यह पुस्तक उस आईने को साफ करके हमें समाज की छवि स्पष्ट रूप से दिखाने का कार्य करती है। 'समकालीन हिंदी साहित्य' में विषयों और दृष्टिकोणों की व्यापकता है। इसमें ग्रामीण भारत की समस्याएँ, शहरीकरण, पर्यावरणीय संकट, स्त्रीवाद, दलित साहित्य, आदिवासी जीवन और ग्लोबलाइजेशन जैसे मुद्दे शामिल हैं। इस पुस्तक का उद्देश्य हिंदी साहित्य की उन प्रवृत्तियों को उजागर करना है, जो समकालीन समाज के महत्वपूर्ण प्रश्नों को संबोधित करती हैं। स्त्री विमर्श, दलित साहित्य, आदिवासी चेतना, वैश्वीकरण, पर्यावरण और तकनीकी विकास जैसे विषयों ने साहित्य में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। यह पुस्तक इन सभी पहलुओं को समग्रता में समझने और उनको प्रासंगिकता को उजागर करने का प्रयास है। यह पुस्तक समकालीन हिंदी साहित्य में उभरते विषयों, विचारधाराओं और उनके समाज पर प्रभाव को समझने का एक प्रयास है। यह न केवल साहित्य की परंपराओं को चुनौती देता है, बल्कि नई धाराओं को भी प्रस्तुत करता है। इस पुस्तक का उद्देश्य समकालीन हिंदी साहित्य को नई प्रवृत्तियों एवं लेखन शैली की गहराई से पड़ताल करना है, ताकि पाठक इस दौर के साहित्य को बेहतर ढंग से समझ सकें साथ ही समकालीन साहित्य का विश्लेषण कर, यह भी दर्शाया गया है कि यह साहित्य भविष्य की पीड़ियों के लिए किस प्रकार मार्गदर्शक हो सकता है। हमें विश्वास है कि यह पुस्तक पाठकों को समकालीन हिंदी साहित्य को समझने और उससे जुड़ने का नया दृष्टिकोण प्रदान करेगी। समकालीन हिंदी साहित्य आज की पीढ़ी के लिए सामाजिक और सांस्कृतिक संदभों का दर्पण है। यह पुस्तक न केवल इन संदर्भों का विवेचन करती है, बल्कि पाठकों को साहित्य की नई प्रवृत्तियों से अवगत कराने का प्रयास करती है। हमें आशा है कि यह प्रयास साहित्य प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी सिद्ध होगा। यह प्रयास पाठकों को समकालीन हिंदी साहित्य की व्यापकता और उसके महत्व को समझने में सहायक सिद्ध होगा।
डॉ. कमलेश कुमारी सह-आचार्य, हिंदी विभाग मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान संकाय, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़, हरियाणा शिक्षा: डी. लिट., पीएच. डी., एम. फिल., यूजीसी नेट-जेआरएफ (हिंदी) प्रशासनिक एवं अकादमिक दायित्व सदस्य, हिंदी सलाहकार, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय, भारत सरकार सदस्य, हरियाणवी भाषा उत्थान समिति, हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, पंचकूला, हरियाणा सरकार हिंदी अधिकारी, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़, हरियाणा पाठ्यक्रम लेखक, दूरस्थ एवं ऑनलाइन शिक्षा निदेशालय, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़, हरियाणा शोध निर्देशन : पीएच.डी.: शोध निर्देशन उपाधि प्रदत्त-4, विपंजीकृत-5 एम. ए. परियोजना कार्य: एम. ए., हिंदी, एम. ए. हिंदी अनुवाद विशेषज्ञता : लोक साहित्य, कथा साहित्य अध्यापन अनुभव : 18 वर्ष शोध-पत्र / आलेख: यूजीसी केयर सूचीबद्ध एवं पीअर रिव्यूड पत्रिकाओं एवं पुस्तकों में लगभग पचास शोध पत्र प्रकाशित : पुस्तक प्रकाशन : आलोचनात्मक पुस्तक : 2 संपादित पुस्तक : 2 शीघ्र प्रकाश्य : 3 सम्मेलन / संगोष्ठी / कार्यशाला विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनओं, संगोष्ठियों एवं कार्यशालाओं में प्रतिभागिता / व्याख्यान अध्यक्षता की तथा संयोजन भी किया।
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