पुस्तक परिचय
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र सर्वतोमुखी प्रतिभा सम्पन्न रचनाकार रहे हैं। उन्होंने अपने व्यक्तित्व तथा कृतित्व से सम्पूर्ण युग को आच्छादित किया है। यद्यपि उन्होंने काव्य-सिद्धान्तों की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति की अपेक्षा काव्य रचना की ओर अधिक ध्यान दिया, तथापि उनके सिद्धान्त इतने सबल और व्यापक हैं कि उनसे उस समय के सभी कवि प्रभावित रहे हैं। उनकी शास्त्रीय मान्यताओं से अवगत होने पर संकेत-रूप में सम्पूर्ण भारतेन्दु युग की विचारधारा का परिचय प्राप्त किया जा सकता है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र आधुनिक हिन्दी आलोचना के पहले महत्त्वपूर्ण कवि-आलोचक माने जाते हैं। उसके बाद आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी आलोचना को उन्नति के शिखर पर पहुंचाया। 'आलोचना' के इस प्रारम्भिक युग में ये दो ही ऐसी प्रतिभाएं हुईं जिन्होंने हिन्दी-आलोचना साहित्य के वर्तमान स्वरूप को निर्धारित करने में अत्यधिक योगदान दिया। भारतेन्दु के प्रभावशाली व्यक्तित्व होने के कारण और साहित्य क्षेत्र में नेतृत्व प्रदान करने के कारण इस युग का नाम युग पुरुष भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से अभिहित किया जाता है। उन्होंने जीवन और साहित्य को मध्ययुगीन पौराणिक वातावरण से बाहर निकालकर उसे आधुनिक रूप प्रदान करने की निरन्तर चेष्टा की। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र नवयुग के अग्रदूत और हिन्दी साहित्य में आधुनिकता के जन्मदाता थे। भारतेन्दु न तो व्यवसाय से आलोचक थे न ही आलोचना उनका मुख्य कर्म था बल्कि उनकी आलोचना रचनाकर्म के भीतर से ही उपजी हुई थी। उन्होंने आधुनिक हिन्दी साहित्य में कवि-आलोचक के रूप में ख्याति अर्जित की।भारतेन्दु हरिश्चन्द्र आधुनिक हिन्दी के जनक कहे जा सकते हैं। हिन्दी गद्य का प्रवर्तन इन्हीं के नाटकों से हुआ। यही नहीं, गद्य में भावानुकूल, पात्रानूकूल एवं प्रवृत्ति-अनुकूल अभिव्यंजना की क्षमता सर्वप्रथम इन्हीं की कृतियों में प्राप्त होती हैं। इनके अतिरिक्त मधुर, संक्षिप्त एवं वास्तविकतापूर्ण गीत नाटककार की अमूल्य देन हैं। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी में आधुनिकता के अग्रदूत माने जाते हैं। गद्य के क्षेत्र में यद्यपि उनसे पहले विविध-विषय-संबन्धी साहित्य का सृजन हो चुका था, तो भी उसमें ललित साहित्य का प्रणयन भारतेन्दु द्वारा ही हुआ। उन्होंने केवल साहित्य के प्राचीन युगों का ही प्रतिनिधित्व नहीं किया, वरन् नवोत्थानकालीन भारत को स्वर प्रदान किया; उसकी आशाओं तथा आकांक्षाओं की पूर्णरूपेण अभिव्यंजना की। साहित्य कों उन्होंने विविध-विषय-संपन्न बनाया। गद्य में खड़ीबोली को प्रोत्साहन दिया और काव्य में ब्रजभाषा का परिष्करण और परिमार्जन किया।भारतेन्दु के आगमन से हिन्दी साहित्य में नये युग का सूत्रपात हुआ माना जाता है। भारतेन्दु युग में गद्य के विकास के साथ ही आलोचना अथवा समीक्षा एक स्वतन्त्र विधा के रूप में विकसित हुई। हिन्दी की आधुनिक समीक्षा जीवन-मूल्यों की उपज है। इसका व्यावहारिक पक्ष पश्चिम से जुड़ जाता है। किन्तु पश्चिम का व्यावहारिक पक्ष ग्रहण करने पर भी उसे भारतीय रसवादी दृष्टि व्यवहृत करती है। भारतेन्दु युग में पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशित होने के साथ ही आधुनिक आलोचना का सूत्रपात माना जाता है।
लेखक परिचय
जन्म : 21 दिसंबर सन् 1965 को हिमाचल प्रदेश के जिला सोलन की तहसील-अर्की के अंतर्गत गांव-बड़ोग में। शिक्षा : बी.ए., बी.जे.एम.सी., एम.ए. (हिन्दी) पीएच.डी. (हिन्दी), PGDPM & LW, योग में PG डिप्लोमा। प्रकाशन : विभिन्न समाचार पत्रों एवं साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में आलोचनात्मक, समीक्षात्मक एवं अनुसंधानात्मक शोध-पत्रों का प्रकाशन। * अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठियों में पत्र-वाचन। सम्प्रति : अतिरिक्त परीक्षा नियंत्रक, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय समरहिल, शिमला-171005 (हि.प्र.) स्थाई पता : चौहान कॉटेज, समीप राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला समरहिल, शिमला-171005 (हि.प्र.) संपर्क सूत्र : 9459738887, 7018518157 E-mail: nantram.chauhan6@gmail.com
भूमिका
भारतेन्दु हरिश्चंद्र सर्वतोमुखी प्रतिभा सम्पन्न रचनाकार थे। आधुनिक हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं के समान ही उन्होंने आलोचना के विकास में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। भारतेन्दु हरिश्चंद्र आधुनिक हिन्दी आलोचना के पहले महत्त्वपूर्ण कवि-आलोचक माने जाते हैं। उसके बाद महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी आलोचना को उन्नति के शिखर पर पहुंचाया। 'आलोचना' के इस प्रारम्भिक युग में ये दो ही ऐसी प्रतिभाएं हुई जिन्होंने हिन्दी-आलोचना साहित्य के वर्तमान स्वरूप को निर्धारित करने में अत्यधिक योगदान दिया। भारतेन्दु के प्रभावशाली व्यक्तित्व होने के कारण और साहित्य क्षेत्र में नेतृत्व प्रदान करने के कारण इस युग का नाम युग पुरुष भारतेन्दु हरिश्चंद्र से अभिहित किया जाता है। उन्होंने जीवन और साहित्य को मध्ययुगीन पौराणिक वातावरण से बाहर निकालकर उसे आधुनिक रूप प्रदान करने की निरन्तर चेष्टा की। भारतेन्दु हरिश्चंद्र नवयुग के अग्रदूत और हिन्दी साहित्य में आधुनिकता के जन्मदाता थे। भारतेन्दु न तो व्यवसाय से आलोचक थे न ही आलोचना उनका मुख्य कर्म था बल्कि उनकी आलोचना रचनाकर्म के भीतर से ही उपजी हुई थी। उन्होंने आधुनिक हिन्दी साहित्य में कवि-आलोचक के रूप में ख्याति अर्जित की। हिन्दी आलोचना का आधुनिक रूप वर्तमान काल में विकसित हुआ किन्तु इससे पूर्व हिन्दी-साहित्य में आलोचना की एक झीनी-सी परम्परा प्रचलित थी जिसका सीधा सम्बन्ध संस्कृत काव्य आलोचना से था।
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