भूमिका
डॉ राम भरोसे की पुस्तक-पाण्डुलिपि, 'दलित-विमर्श तथा प्रेमचंद-साहित्य' शीर्षकान्तर्गत, मेरे समक्ष है। डॉ. राम भरोसे को उक्त पुस्तक की भूमिका लिखना मेरे लिए इन अथों में सौभाग्य की बात है कि यह हिन्दी के एक ऐसे नवहस्ताक्षर के लिए लेखनी चलाना है, जिसकी सांस्कारिक जड़ें बहुत गहरी हैं। इस सांस्कारिक पल्लव ने डॉ. राम भरोसे को परिपक्वता और इस परिपक्वता को व्यावहारिक-परहितता प्रदान की है। ऐसा लेखक जब अनुसन्धानात्मक दृष्टि से किसी ग्रंथ का प्रणयन करता है, तो उसमें सशक्त सम्पूर्णता का आना अत्यन्त स्वाभाविक है, जिसकी सुनिश्चितता डॉ. राम भरोसे कृत 'दलित-विमर्श तथा प्रेमचन्द-साहित्य' के पठन से होती है। डॉ. राम भरोसे ने इस पुस्तक में दलित वर्ग पर उसकी अस्मिता से अपना चिंतन प्रारम्भ किया है। उक्त सन्दर्भ में प्रतिष्ठित साहित्यकारों के मतों को समीचीन रूप से प्रस्तुत कर दलित वर्ग के अभिप्राय को सुस्पष्ट किया जाना डॉ. राम भरोसे के तत्सम्बद्ध अध्ययन को रेखांकित करता है। डॉ राम भरोसे की पुस्तक-पाण्डुलिपि, 'दलित-विमर्श तथा प्रेमचंद-साहित्य' शीर्षकान्तर्गत, मेरे समक्ष है। डॉ. राम भरोसे को उक्त पुस्तक की भूमिका लिखना मेरे लिए इन अथों में सौभाग्य की बात है कि यह हिन्दी के एक ऐसे नवहस्ताक्षर के लिए लेखनी चलाना है, जिसकी सांस्कारिक जड़ें बहुत गहरी हैं। इस सांस्कारिक पल्लव ने डॉ. राम भरोसे को परिपक्वता और इस परिपक्वता को व्यावहारिक-परहितता प्रदान की है। ऐसा लेखक जब अनुसन्धानात्मक दृष्टि से किसी ग्रंथ का प्रणयन करता है, तो उसमें सशक्त सम्पूर्णता का आना अत्यन्त स्वाभाविक है, जिसकी सुनिश्चितता डॉ. राम भरोसे कृत 'दलित-विमर्श तथा प्रेमचन्द-साहित्य' के पठन से होती है। डॉ. राम भरोसे ने इस पुस्तक में दलित वर्ग पर उसकी अस्मिता से अपना चिंतन प्रारम्भ किया है। उक्त सन्दर्भ में प्रतिष्ठित साहित्यकारों के मतों को समीचीन रूप से प्रस्तुत कर दलित वर्ग के अभिप्राय को सुस्पष्ट किया जाना डॉ. राम भरोसे के तत्सम्बद्ध अध्ययन को रेखांकित करता है। विगत लगभग दो दशकों से दलित-विमर्श जातीय आधार पर पर्याप्त चर्चित और अन्ततः विवादास्पद भी हुआ है। डॉ. राम भरोसे ने अपनी इस पुस्तक में दलित-विमर्श के इस जातीय उन्माद को 'हवा न देकर' साहित्य की सात्विकता में श्रीवृद्धि की है, जो उन जैसा संस्कारी व्यक्ति ही कर सकता है। प्रस्तुत पुस्तक का मूल प्रतिपाद्य दलित-विमर्श की उपस्थिति प्रेमचन्द जी के साहित्य में देखने का है। प्रेमचन्द-साहित्य की दलित-चेतना अपने युगविशेष की स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी, इस स्वीकारोक्तिपूर्ण निष्कर्ष को डॉ. राम भरोसे द्वारा प्रस्तुत पुस्तक में उपस्थित करना एक बड़ी बात है। इसमें दो मत नहीं मना कर सकता है? डॉ. राम भरोसे की इस पुस्तक में प्रेमचन्द की कहानियों और उपन्यासों के परिप्रेक्ष्य में जिस विस्तार और गहनता से दलित-विमर्श को प्रस्तुत किया गया है, वह अब तक अद्वितीय है और भविष्य में अप्रतिम रहेगा, इसकी उद्घोषणा मैं आश्वस्त होकर कर सकता हूँ। कारण, पुनरोक्ति न समझा जाए तो, लेखकीय अध्ययन; चिंतन-मनन; अध्यवसाय; समुचित संसाधन आदि सब जुटाये जा सकते हैं, परन्तु पैतृक-संस्कारों की जो थाती डॉ. राम भरोसे को मिली है, वह किसी बिरले को ही मिल पाती है। डॉ. राम भरोसे की यह पुस्तक दलित-विमर्श और प्रेमचन्द साहित्य की सुगठित प्रस्तुति है। शोधार्थियों हेतु हितकारी होने के साथ-साथ यह पुस्तक वर्तमान दलित-विमर्श में प्रेमचन्द-साहित्य को तथा प्रेमचन्द साहित्य में दलित-विमर्श को उदार-स्वरूप में प्रस्तुत करेगी, इसका विश्वास है !
लेखक परिचय
जन्म तिथि/स्थानः 19 जुलाई, 1983 / हरिद्वार-उत्तराखण्ड * शिक्षाः एम.ए. हिन्दी, यू.जी.सी. नेट (2008), पी-एच.डी. (2012) * प्रकाशनः विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित * प्रसारणः आकाशवाणी नजीबाबाद से वार्ताओं का प्रसारण सम्प्रतिः बी.एस.एम.पी.जी. कॉलेज रुड़की में असिस्टेंट प्रोफेसर (हिन्दी विभाग) के पद पर कार्यरत ।
पुस्तक परिचय
डॉ. राम भरोसे की इस पुस्तक में प्रेमचन्द की कहानियों और उपन्यासों के परिप्रेक्ष्य में जिस विस्तार और गहनता से दलित-विमर्श को प्रस्तुत किया गया है, वह अब तक अद्वितीय है और भविष्य में अप्रतिम रहेगा, इसकी उद्घोषणा मैं आश्वस्त होकर कर सकता हूँ। यह पुस्तक दलित-विमर्श और प्रेमचन्द साहित्य की सुगठित प्रस्तुति है। शोधार्थियों हेतु हितकारी होने के साथ-साथ यह पुस्तक वर्तमान दलित-विमर्श में प्रेमचन्द-साहित्य को तथा प्रेमचन्द-साहित्य में दलित-विमर्श को उदार-स्वरूप में प्रस्तुत करेगी, इसका विश्वास है !
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