पुस्तक परिचय
समकालीन कविता की बात जब भी की जाएगी एक ऐसे शख्स को जरूर याद किया जाएगा जिन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन और लेखकीय कार्य में विसंगतियों को समकालीन कविता की ही तरह डोया है। अपने आप को उन्होंने एक छद्म नाम से साहित्य में अंकित किया। जीवन भर वे शिक्षा व परिवार, समाज व भूगोल, राजनीति व आर्थिक नीति के चक्करों में फसे रहे लेकिन उनकी रचना को और उनकी कलम की नौक को कोई भी चक्कर तोड़ नहीं पाया। धूमिल समकालीन कविता के आकाश में उभरे हुए नक्षत्र हैं। धूमिल ने अपनी अलग पहचान बनाने के साथ-ही-साथ समकालीन कविता को भी साहित्य पटल पर एक नए रूप में उजागर किया है। सन् साठ के बाद जब धूमिल कविता में आए तो उनकी गद्यमयी भाषा ने आलोचना का मुख कविता की ओर मोड़ दिया। कविता को नई दिशा और नए रूप में ढालना धूमिल के अभिव्यक्ति पक्ष को दर्शाता है। उनका अभिव्यक्ति पक्ष उनकी अनुभूतियों का परिणाम है। सुदामा पांडे 'धूमिल' ने अपने समकालीन साहित्य के परम्परागत ढरें को तोड़ते हुए, नए साहित्यिक प्रयोग किए और अपनी साहित्यिक एवं समकालीन सोच से समकालीन कविता में बदलाव की झंकार बजा दी। महज 37 वर्ष 2 माह जीवन यापन करने के बावजूद भी नौजवान युवा कवि धूमिल ने अपनी बहुत थोड़ी सो कविताओं द्वारा अपने समकालीन साहित्यकारों में अपनी अलग पहचान बनाई है। धूमिल समझौतावादी नहीं बल्कि सुधारवादी कवि रहे हैं। धूमिल कविता की 'भाषा में आदमी होने की तमीज' वाली सोच को लेकर ही काव्य क्षेत्र में आए थे। धूमिल को अपनी सोच के अनुसार साहित्यिक कार्य करने का ज्यादा समय तो नहीं मिला। लेकिन जितना मिल पाया उसी समय में इन्होंने इस कार्य को काफी हद तक पूरा किया है। काव्य-रचना करना एक श्रम-साध्य कार्य है। इस कार्य में रचनाकार को अपने आँख कान के साथ-साथ बुद्धि और विवेक के दरवाजे भी हमेशा खुले रखने पड़ते हैं। इसी के साथ-साथ जब भी कोई रचनाकार काव्य-रचना करता है तो उसके पीछे उसका कोई-न-कोई प्रयोजन अवश्य छिपा होता है। यही प्रयोजन उसका उद्देश्य भी कहलाता है एवं साथ ही उसकी काव्य-रचना को प्रासांगिकता भी प्रदान करता है। रचनाकार की प्रासांगिकता ही काव्य-रचना के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को घोषित करती है। धूमिल ने अपनी रचना-प्रक्रिया में काव्य या कविता को ही क्यों चुना एवं इसके पीछे उनका क्या प्रयोजन रहा है। इसका सही उत्तर उनके ही शब्दों में दिया जा सकता है। "यह जानते हुए भी कि कवि होना कितना हास्यास्पद है, कविताएँ लिखी जा रही हैं। यद्यपि यह न तो मेरी विवशता है और न मैं इसके लिए बाध्य हूँ। यह मेरी लत है ठीक दातौन और ताश के पत्तों की तरह और इसी हद तक मैं चीजों के निकट हूँ। मेरी रचना-प्रक्रिया एक ऐसी ऊब है, जो मुझे दूसरी रचना के आरम्भ से जोड़ती है, और प्रत्येक अंत के बाद मेरे लिए हर रचना व्यर्थ हो जाती है और मेरा अकेलापन मेरे आसपास से फिर जोड़ देता है, एक दूसरी रचना के लिये"। समकालीनता में राजनीतिक पहलू सर्वोपरि रहा है। समाज में परिव्याप्त हर समस्या के पीछे का कारण ही राजनीति नजर आती है। धूमिल इस राजनीतिक शोषण से मुक्ति और सामाजिक समरसता स्थापन के पक्षधर कवि रहे हैं। राजनीतिक समझदारी उनके काव्य का खाद-पानी रही है। असल में धूमिल एक ऐसे चरित्र निर्माण को निर्मित करना चाहते थे जिसमें जीवन के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता, कर्त्तव्य परायणता, ईमानदारी और जमीन से जुड़े होने का अहसास कूट-कूट कर भरा हो
लेखक परिचय
जन्म 15 नवम्बर, 1988 (हिमाचल प्रदेश के जिला हमीरपुर की तहसील सुजानपुर के अंतर्गत बजरोल के दूधला गाँव में)। शिक्षा : बी.एड., एम.ए. (हिन्दी); एम.फिल. (हिन्दी), हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला से। शोध व प्रकाशन : * कवि धूमिल की साहित्यिक सोच शीर्षक से लघु शोध-प्रबंध। * रचनाकारों की सृजनशीलता (सह-संपादन)। * विभिन्न समाचार पत्रों एवं साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में आलोचनात्मक, समीक्षात्मक एवं अनुसंधानात्मक शोध पत्रों का प्रकाशन। अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठियों में वक्ता व शोध पत्र वाचन। सम्प्रति : असिस्टेंट प्रोफेसर (हिन्दी विभाग), हिमाचल प्रदेश सरकार उच्चतर शिक्षा विभाग। स्थाई पता : 'मंगलम निवास' दरसाल, पत्रालय-चरोट, तहसील-सुजानपुर, जिला-हमीरपुर (हि०प्र०) पिन-176110 संपर्क सूत्र : 9418142767 E-mail: rbhanwal1511@gmail.com
भूमिका
काव्य-रचना करना एक श्रम-साध्य कार्य है। इस कार्य में रचनाकार को अपने आँख कान के साथ-साथ बुद्धि और विवेक के दरवाजे भी हमेशा खुले रखने पड़ते हैं। इसी के साथ-साथ जब भी कोई रचनाकार काव्य-रचना करता है तो उसके पीछे उसका कोई-न-कोई प्रयोजन अवश्य छिपा होता है। यही प्रयोजन उसका उद्देश्य भी कहलाता है एवं साथ ही उसकी काव्य-रचना को प्रासांगिकता भी प्रदान करता है। रचनाकार की प्रासांगिकता ही काव्य-रचना के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को घोषित करती है। धूमिल ने अपनी रचना-प्रक्रिया में काव्य या कविता को ही क्यों चुना एवं इसके पीछे उनका क्या प्रयोजन रहा है। इसका सही उत्तर उनके ही शब्दों में दिया जा सकता है। "यह जानते हुए भी कि कवि होना कितना हास्यास्पद है, कविताएँ लिखी जा रही हैं। यद्यपि यह न तो मेरी विवशता है और न मैं इसके लिए बाध्य हूँ। यह मेरी लत है ठीक दातौन और ताश के पत्तों की तरह और इसी हद तक मैं चीजों के निकट हूँ। मेरी रचना-प्रक्रिया एक ऐसी ऊब है, जो मुझे दूसरी रचना के आरम्भ से जोड़ती है, और प्रत्येक अंत के बाद मेरे लिए हर रचना व्यर्थ हो जाती है और मेरा अकेलापन मेरे आसपास से फिर जोड़ देता है, एक दूसरी रचना के लिये"। समकालीनता में राजनीतिक पहलू सर्वोपरि रहा है। समाज में परिव्याप्त हर समस्या के पीछे का कारण ही राजनीति नजर आती है। धूमिल इस राजनीतिक शोषण से मुक्ति और सामाजिक समरसता स्थापन के पक्षधर कवि रहे हैं। राजनीतिक समझदारी उनके काव्य का खाद-पानी रही है।
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