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इतिहास पुरुष डॉ. नारायणसिंह भाटी (संस्मरण विशेषांक): Dr. Narayan Singh Bhati a Man of History (Special Commemorative Issue)

$30
Includes any tariffs and taxes
Specifications
Publisher: Royal Publications, Jodhpur
Author Aidan Singh Bhati
Language: Hindi
Pages: 272
Cover: PAPERBACK
8.5x5.5 Inch
Weight 370 gm
Edition: 2024
ISBN: 9788119645220
HCE919
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Book Description

भूमिका

     

 

महापुरुष की प्रति वर्ष जयंती मनाई जाती है। डॉ. श्री नारायणसिंह जी भाटी महापुरुष एवं एक युग प्रेरक पुरुष थे। वो मेरे से उम्र में करीब 2-3 वर्ष बड़े थे। मैंने हिन्दी साहित्य में एम.ए. जसवंत कॉलेज जोधपुर से उनके साथ ही वर्ष 1952 में डिग्री प्राप्त की थी। उनकी प्रतिभा का परिचय हिन्दी साहित्य में देखा था। जब उनकी ही पुस्तक 'सांझ' हमें क्लास में पढ़ाई जाती थी। प्रतिभा का दूसरा परिचय था, पढ़ाई के साथ ही बास्केटबॉल जसवंत कॉलेज के टीम के कप्तान रहे एवं कई टूर्नामेन्ट उन्होंने जीते थे। उन्होंने एम.ए. एवं एल.बी.बी. की डिग्री जसवन्त कॉलेज जोधपुर से 1953 में एक साथ प्राप्त की थी जो कि एक साधारण कार्य नहीं था। उनमें एक ग्रामीण आँचल की प्रतिभा थी। मात्र 25 वर्ष की उम्र में उन्होंने एक संस्था राजस्थानी शोध संस्थान, चौपासनी, जोधपुर में खड़ी करके उसे लगातार 38 वर्ष तक सुचारू रूप से चलाकर अपनी प्रतिभा का परिचय डॉ. नारायणसिंह भाटी ने दिया था। 'परम्परा' शोध पत्रिका के लगातार 101 अंक निकालकर भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया एवं उनके जो आलोचक थे, अपने श्रेष्ठ कार्यों से उनका भी मुँह उन्होंने बन्द करवा दिया। मैंने कॉलेज स्तर पर ही देखा कि डॉ. नारायणसिंह भाटी राजनीति एवं प्रतिष्ठा से दूर रहते थे। उन्होंने राजस्थानी साहित्य एवं इतिहास के शोध में खूब कार्य किया था। इतिहास के दृष्टि से उन्होंने संस्था में 17000 करीब ग्रंथ, बहिया, रूक्के, परवाने एकत्रित करके उन्हें संस्था में सुरक्षित रखा। उन्हें नष्ट होने से बचाया था। सरकार  से अनुदान लाकर संस्था चलाना आसान कार्य नहीं था। प्रेस एवं साधन के अभाव से जूझते हुए भी उन्होंने शोध संस्थान की प्रगति को रुकने नहीं दिया था। कई बार में अकेली बैठी सोचती हूं कि एक अकेला व्यक्ति महज 65 वर्ष की आयु तक इतना कार्य कैसे कर सकता है। उन्होंने अपने जीवन में जो भी कार्य किया वो ठोस काम किया। 'परम्परा' में लोकगीत, गोरा-हटजा, जैसलमेर री ख्यात, महाराजा जसवन्त सिंह, जैसाणे रा पखेरू गीत, अलवर री षटरितु झमाल, हेमाणी अंक, हरिवलास शारद अंक, निकालकर अपने कार्य की श्रेष्ठता सिद्ध की तथा इतिहास में मारवाड़ रा परगना री विगत, ऐतिहासिक ग्रन्थों का सर्वेक्षण (तीन भाग), पाबू प्रकाश, महाराजा तख्तसिंह री ख्यात, महाराजा मानसिंह री ख्यात का प्रकाशन करके इतिहास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसलिए डॉ. नारायणसिंह भाटी को राजस्थानी साहित्य एवं इतिहास के पुरोधा कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। डॉ. नारायणसिंह भाटी ने अपने नाम के साथ परिवार एवं गाँव का नाम भी रोशन किया। इनके गाँव मालूँगा में सरपंच पद एवं बी.एस.एफ. के पदों पर भी गाँव के लोग रहे परन्तु वो लोग न तो अपना नाम गाँव में रोशन कर सके और न ही गाँव के बाहर अपना नाम कमा सके। डॉ. नारायणसिंह भाटी के कार्य का अंदाज आप इसी बात से लगा सकते हैं कि 50 वर्ष पूर्व उनके द्वारा संपादित 'परम्परा' के अंक की महत्वत्ता आज भी बनी हुई है। राजस्थानी शब्द कोष के संपादन में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। इसके संपादन में आई कठिनाइयों का एक बार जिक्र उन्होंने मेरे सामने किया था। वित्तीय प्रबंधन एवं छपाई तथा प्रूफ संशोधन में काफी कठिनाइयों का सामना किया था।

 

पुस्तक परिचय

 

साहित्य एवं इतिहास की धरोहर : डॉ. नारायणसिंह भाटी डॉ. नारायणसिंह जी भाटी ने उस कालखण्ड में एम.ए., एल.एल.बी. की थी, जिस समय मेरा जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी प्रतिभा का परिचय 'परम्परा' शोध-पत्रिका के 101 अंक निकाल कर दिया था और राजस्थानी शोध संस्थान चौपासनी को लगातार 38 वर्षों तक सुसंगत ढंग से चलाकर अपनी प्रतिभा संसार के सामने प्रकट की थी। डॉ. नारायणसिंह जी भाटी ने 'परम्परा' के माध्यम से लोकगीत, जैसलमेर री ख्यात, जैसाणे रा पंखेरू गीत, गोरा हट जा, अलवर री षट्ऋतु झमाल, राजस्थानी कविता का हेमाणी अंक आदि निकालकर कविता-साहित्य की समृद्ध बातें पाठकों को सौंप दी थी। केवल साहित्य ही नहीं राजस्थान के ऐतिहासिक ग्रंथों का भी सम्पादन प्रकाशन करके अपनी ऐतिहासिक ज्ञान की महत्ता पाठकों को सौंप दी थी थी। डॉ. भाटी न केवल राजस्थानी के प्रतिष्ठित विद्वान थे अपितु अंग्रेजी, हिन्दी और संस्कृत का भी उन्हें अद्भुत ज्ञान था। राजस्थानी शब्द कोष का निर्माण भी उनकी भूमिका के बिना पूरा नहीं होता, ऐसा मेरा मत है। वे राजस्थानी के कवि साहित्यकार होने के साथ ही इंसान के प्रति आत्मीय भाव वाले सहज व सरल व्यक्ति थे। इतिहास के क्षेत्र में 'मारवाड़ री परगना री विगत' तीन भागों में प्रकाशित करके इतिहास के शोध के लिए उपयोगी प्रकाशन किया। यह एक बहुत ही विशाल एवं जटिल तथा श्रमसाध्य काम था, परन्तु उन्होंने अपनी लगन एवं सूझबूझ से कार्य करके उसे लोगों के सामने प्रस्तुत किया। यह पुस्तक आज भी इतिहास के क्षेत्र में एक उपयोगी ग्रंथ माना जाता है। डॉ. श्री रघुवीर सिंह जी सीतामऊ भी उनसे इतिहास एवं साहित्य विषय पर चर्चा किया करते थे। इतिहास के प्रो. आर.पी. व्यास एवं हिन्दी के प्रोफेसर डॉ. रामप्रसाद जी दाधीच एवं राजस्थानी के प्रो. डॉ. श्री शक्तिदान जी कविया आदि भी उनसे सलाह एवं सुझाव लेते थे। उन्होंने आजीवन राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए संघर्ष एवं आन्दोलन किया था।

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