"ऋषिप्रवर मार्कण्डेय आठवें मनु को पूर्व कथा के माध्यम से नृपश्रेष्ठ सुरथ एवं वणिक् श्रेष्ठ समाधि को पात्र बनाकर मेधात्रऋषि के मुख से भगवती महामाया के जिन स्वरूपों का वर्णन किया है वही सप्तशती का मूल आख्यान है।"
अव्यक्त जन्मा ब्रह्मा जी ने मधु-कैटभ-संहारक के रूप में तमोगुण की अधिष्ठात्री देवी योग निद्रा की जिस रूप में स्तुति की है वह स्वयं में नारी (शक्ति) के वास्तविक स्वरूप की उज्ज्वल झाँकी है।
सौम्या सौम्य तरा शेष सौम्येभ्यस्त्वति सुन्दरी । - अध्याय १, श्लोक-७०
'देवि तुम सौम्य और सौम्यतर तो हो ही, परन्तु इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य पदार्थ है, तुम उन सबमें सबकी अपेक्षा अधिक सुन्दरी हो ।'
पापात्मा-पुण्यात्मा और सत्पुरुषों तथा कुलीनों के अन्तःकरण का विश्लेषण करते पराशरनन्दन भगवान् व्यास महिषमर्दिनी का यशोगान किस सारगर्भित ढंग से किया है- हुए या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेश्वलक्ष्मीः पापात्मानां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः ।
श्रद्धा सतां कुलजन प्रभवस्य लज्जा, तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि ! विश्वम् ।।४-५ ।।
जो पुण्यात्माओं के गृहों में लक्ष्मी पापात्माओं के यहाँ दरिद्ररूपा शुद्ध अन्तः करणवाले पुरुषों के हृदय में सुबुद्धि रूप सत्पुरुषों में श्रद्धा तथा कुलीनों में लज्जा रूप में निवास करती है, उस देवी को मैं नमस्कार करता हूँ।
शक्ति-शक्तिमान दोनों दो नहीं, एक ही है। शक्ति सहित पुरुष शक्तिमान कहलाता है। जैसे 'शिव' में 'इ' शक्ति है। यदि 'इ' को निकाल दें तो 'शिव' शव बन जायेंगे । जब प्रलय होता है, तो भगवान् समस्त संसार को समेट कर उदरस्थ कर लेते हैं। पुनः कालान्तर में जब सृजनकाल समुपस्थित होता है तब सङ्कल्प शक्ति द्वारा भगवान या भगवती एक से अनेक बन जाते हैं। एकोऽहंबहु श्याम् ।
भगवान् प्रकृति योगमाया या अविद्या का आश्रय लेकर पुनः जगत् प्रपञ्च को चलाते ही रहते हैं। इस प्रकार प्रवाह रूप से यह संसार नित्य है। सृष्टि प्रलयकाल के अनुसार होते है अतः काल भी नित्य है। जिस प्रकृति के स्वभाव के कारण यह संसार चक्र चल रहा है,
वह प्रकृति महामाया ही नित्य है। सब कुछ नित्य ही नित्य है, अनित्य कुछ भी नहीं। यो कहिये कि अनित्य भी नित्य है, जगत् में कोई देवी को मानते है तो कोई देवता को ।
ब्रह्मवैवर्तपुराण के गणेशखण्ड में बताया गया है कि सृष्टि के समय एक बड़ी शक्ति
पाँच नामों से प्रकट हुई। ये पाँच नाम है- राधा, पद्मा, सावित्री, दुर्गा और सरस्वती ।
साच शक्तिः सृष्टिकाले पञ्चधा चेश्वरेच्छया । राधा पद्मा च सावित्री दुर्गा देवी सरस्वती ।।
- गणेश खण्ड ४०/६१
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