लेखक परिचय
डॉ. ओम निश्चल कवि, आलोचक और भाषाविद् हैं। इनका जन्म 15 दिसंबर, 1958 को प्रतापगढ़, उ.प्र. में हुआ। इन्होंने हिंदी व संस्कृत में एम.ए., पीएच.डी. व पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा की उपाधि हासिल की है। इनकी उल्लेखनीय कृतियों में शब्द सक्रिय हैं, मेरा दुख सिरहाने रख दो, ये जीवन खिलखिलाएगा किसी दिन, कोई मेरे भीतर जैसे धुन में गाए व ये मन आषाढ़ का बादल हुआ है- काव्यकृतियाँ तथा द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी : सृजन और मूल्यांकन, शब्दों से गपशप, कवि विवेक जीवन विवेक, कुँवर नारायणः कविता की सगुण इकाई, चर्चा की गोलमेज़ पर अरुण कमल, रामदरश मिश्र : जीवन और साहित्य, मैं अषाढ़ का पहला बादल, कविता का भाष्य और भविष्य और भाषा की खादी, हिंदी का समाज, समाज की संस्कृति आदि मौलिक व संपादित 75 कृतियाँ शामिल हैं। डॉ. निश्चल हिंदी अकादमी युवा पुरस्कार, हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद्र शुक्ल आलोचना पुरस्कार, शान-ए-हिंदी खिताब, अज्ञेय भाषा सेतु सम्मान, कल्याणमल लोढा साहित्य सम्मान, गंग-देव सम्मान, रामस्वरूप चतुर्वेदी आलोचना सम्मान एवं कैरेक्टर ट्री आदि अनेक सम्मानों से विभूषित हैं।
पुस्तक परिचय
साहित्य लेखन के क्षेत्र में बच्चों के लिए लिखने में बड़े लेखकों को प्रायः संकोच होता रहा है लेकिन फिर भी विनकर, माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्राकुमारी चौहान, सोहनलाल द्विवेदी, निरंकारदेव सेवक, हरिकृष्ण देवसरे और डॉ. श्रीप्रसाद जैसे दिव्य लेखकों की पंक्ति में कहीं न कहीं एक नाम प्रमुखता से चमकता रहा है और वह नाम है द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी का। आगरा में जन्मे माहेश्वरी जी शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश से जब जुड़े तो बच्चों के पठन-पाठन के क्षेत्र में बुनियादी काम चल रहा था; यहाँ तक कि प्रार्थना गीत तक बच्चों के लिए न थे। उन्होंने बड़े लेखकों को बच्चों के साहित्य लेखन की ओर मोड़ा तथा बुनियादी शिक्षा और शिक्षण का एक प्रशस्त वातावरण तैयार किया। स्वयं माहेश्वरी जी ने पहले पहल तो कविताएँ ही लिखीं, गीत लिखे, खंड काव्य व प्रबंध काव्य लिखे जो माध्यमिक पाठ्यक्रमों में पढ़ाए भी जाते रहे, किन्तु बच्चों के लिए जब उद्देश्यपरक शिक्षण सामग्री का अभाव देखा तो स्वयं इस क्षेत्र में कमर कस कर आ गए और चालीस से ज्यादा बालगीतों व कहानियों के संग्रह प्रकाशित हुए। आजादी के तुरंत बाद 1949 में 'कातो और गाओ' के गीत लिख कर वे बच्चों के गाँधी कहलाने लगे। 'हम सब सुमन एक उपवन के', 'इतने ऊँचे उठो', 'यदि होता किन्नर नरेश मैं' से लेकर 'तितली रानी' जैसे गीत लिख कर वे बच्चों की स्मृति का अनन्य हिस्सा बन गए। अपने बाल साहित्य के अवदान के लिए वे 1977 में उ.प्र. हिंदी संस्थान से सम्मानित किए गए तो 1992 में वे अपने बाल साहित्य के अवदान के लिए वे 1977 में उ.प्र. हिंदी संस्थान से सम्मानित किए गए तो 1992 में वे हिंदी संस्थान द्वारा ही सर्वोच्च पुरस्कार बाल साहित्य भारती से सम्मानित हुए। कविता, गीत, बालगीत, बाल कथाओं व नवसाक्षरोपयोगी साहित्य के उनके समग्र अवदान पर 1985 में उन पर डॉ. ओम निश्चल की कृति 'द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी : सृजन और मूल्यांकन' आई तो इसे बाल साहित्यकार पर पहली आलोचनात्मक कृति के रूप में सराहा गया तथा विद्यानिवास मिश्र ने इस प्रयास की खुल कर सराहना की। इस बीच 1998 में आई उनकी आत्मकथा को भी बाल साहित्यकार की पहली आत्मकथा माना गया। यह संवर्धित अनुशीलन उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का समग्र समालोचन है।
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