भूमिका
कुछ कहना है आपसे यूँ तो साहित्य की हर विधा की अपनी अलग बानगी होती है। पर कहानी ... कहानी विधा के तो कहने की क्या ? कहानी शब्दों में डूबती उतराती जिन्दगी है। कोई घटना, स्थिति, चरित्र, भाव अथवा विचार कभी यादों के सहारे तो कभी अनुभूति या चिन्तन के सहारे भीतर उतर जाते हैं और फिर एक नया रूप धारण कर शब्दों के सहारे वापस आ जाते हैं, मेरी समझ में वही कहानी होती है। उन्हीं कहानियों में कभी हम कल्पना के झरोखे से सच तलाशते हैं तो कभी सच के झरोखे से कल्पना। कहानी कोरे पृष्ठ पर फैली स्याही की एक बूँद है जो थोड़ा हिलाने से फैलकर एक आकृति का रूप पा लेती है। मुझे लगता है कहानी एक धूप का टुकड़ा है। हवाओं में समायी ठंडक है फूलों में ठहरी हुई खुशबू है। मैं अपनी बात करूँ, तो लगभग चौदह-पन्द्रह साल की आयु में मैंने अपनी पहली कहानी लिखी थी 'कैक्टस; एक प्यासी जिन्दगी'। उम्र जब करवट ले रही होती है तो बहुत कुछ बदलने लगता है। हर भाव अपनी जगह से विचलित सा प्रतीत होता है। यह कहानी उम्र के उसी पड़ाव की है जो बाद में कॉलेज में आने के बाद कॉलेज की पत्रिका वाणी में छपी। सोचा था कि वो कहानी मिल जायेगी तो उसी से इस संग्रह की शुरुआत करूँगी। पर वो मिली नहीं, खैर ... इस कहानी के बाद मेरे भीतर का लेखक काफी दिनों तक चुप बैठा रहा। शायद वाहर कोई हलचल नहीं थी तो भीतर भी खामोशी थी। केवल इन दिनों पढ़ाई में ध्यान दिया। मेरे पापा मेरी जिन्दगी के केन्द्र में थे। उनके प्रभाव से अच्छा साहित्य खूब पढ़ा। पर साथ ही सस्ता साहित्य भी खूब पढ़ा, दोनों भाइयों और अपनी अपनी एक सखी की बदौलत गुलशन, नन्दा, राजहंस, राजवंश, कर्नल रंजीत आदि। घर में 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' और धर्मयुग' पत्रिकाएँ नियमित आती थीं। 'आपका चंटी', 'मेरे संधि पत्र', 'कृष्ण कली', 'शमशान चम्या' जैसे धारावाहिक उपन्यासों को इन्हीं पत्रिकाओं में पढ़ा था। विमल पत्र, शरत चन्द्र को भी पढ़ा। एम. ए. में आने के बाद एक लघु उपन्यास 'स्मृतियों के घेरे में' लिखना शुरू किया। पूरा कब हुआ, वो याद नहीं। 'आकाशवाणी' के लिए भी कहानी लिखी पर कुछ सँभाल कर नहीं रखा। मुझे लगता था कि ये सब लेखन स्वान्तः सुखाय है तो इसे सार्वजनिक करने का क्या मतलब? पर इन दिनों विनय मेरे से बार-बार कहते कि जो लिखती हो, उसे लोगों के सामने लाओ। इसलिए मैं कह सकती हूँ कि इस संग्रह के पीछे विनय (मेरे पति) की ही प्रेरणा रही है। पारिवारिक दायित्वों का निर्वाह और अपना अध्यापन कार्य करते हुए यदा-कदा लिखती रही। आलोचनाएँ भी लिखीं। शोध पत्र लिखे, लेकिन कहानी कहीं न कहीं मेरी त्वचा के नीचे रेंगते कीड़े की तरह मुझमें बेचैनी पैदा करती रही। बीच-बीच में रुकावटों के साथ कुछ कहानियाँ लिखीं पर कभी सोचा नहीं कि इन्हें प्रकाशित कराऊँर्गी। विनय अगर न चाहते तो मैं कभी सोचती भी नहीं। इससे पहले अपना शोध कार्य भी प्रकाशित कराने के पीछे विनय और मेरे दोनों भाईयों का ही हाथ है। पापा का साथ और उनकी प्रेरणा तो मेरे जीवन के हर क्षण में मेरे साथ है। मेरा हर कार्य यही सोच के साथ होता है कि पापा खुश होंगे यह सोच तब भी थी जब पापा थे और अब भी जब पापा मेरे पास साकार रूप में नहीं हैं खैर... पापा की बात और नहीं करूँगी वर्ना शब्द गीले हो जायेंगे और मिटे हुए गीले शब्दों से एक महाकाव्य की रचना हो जायेगी। पापा मेरे आदर्श थे और किसी जमाने में मैं अपनी जिन्दगी भी कहती थी उन्हें पर... ये बेशर्म साँसे तो अब तक चल रही हैं
लेखक परिचय
डॉ० रेखा पतसारिया जन्म- 24 सितम्बर 1959, आगरा (उ०प्र०)। शिक्षा- एम०ए०, एम० फिल०, पी-एच०डी०, आगरा विश्वविद्यालय, आगरा (उ०प्र०)। प्रकाशन- आधुनिक कथा साहित्य में चित्रित औद्योगीकरण। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अनेक शोध लेख प्रकाशित। रेडियो नाटक लेखन। एक उपन्यास का लेखन । सम्प्रति - एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, आगरा कालेज, आगरा (उ०प्र०)।
पुस्तक परिचय
एक दिन... सिर्फ अपने लिये यू तो साहित्य की हर विधा की अपनी अलग बानगी होती है। पर कहानी... कहानी विधा के तो कहने की क्या ? कहानी शब्दों में डूबती उतराती जिन्दगी है। कोई घटना, स्थिति, चरित्र, भाव अथवा विचार कभी यादों के सहारे तो कभी अनुभूति या चिन्तन के सहारे भीतर उतर जाते हैं और फिर एक नया रूप धारण कर शब्दों के सहारे वापस आ जाते हैं, मेरी समझ में वही कहानी होती है। उन्हीं कहानियों में कभी हम कल्पना के झरोखे से सच तलाशते हैं तो कभी सच के झरोखे से कल्पना।
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