डॉ. सूर्यबाला 25 अक्टूबर, 1943 वाराणसी में जन्मीं और काशी विश्वविद्यालय में पी.एच.डी. तक की शिक्षा पूर्ण करने वाली सूर्यबाला समकालीन कथा-लेखन में एक विशिष्ट और अलग अंदाज के साथ उपस्थित हैं। यह अंदाज मर्मज्ञ पाठकों के साथ उनकी आत्मीयता का है। जो दशक दर दशकर निरंतर प्रगाढ़ होती गई हैं। धर्मयुग में धारावाहिक प्रकाशित होने वाला उनका पहला उपन्यास 'मेरे संधिपत्र' आज भी पाठकों की चहेती कृति है तथा अब तक का अंतिम उपन्यास 'कौन देस को वासी.... वेणु की डायरी' अनवरत पाठकों की सराहना अर्जित कर रहा है। अपने छः उपन्यास, ग्यारह कथा-संग्रह, चार व्यंग्य-संग्रह, तथा 'अलविदा अन्ना' जैसी स्मृति कथा और 'झगड़ा निपटारक दफ्तर' शीर्षक बालहास्य उपन्यास की लेखिका सूर्यबाला, तमाम साहित्यिक उठापटकों, विमर्शी घमासानों और बाजार की मांगों से निर्लिप्त रहकर चुपचाप लिखने वाली रचनाकार हैं। वैचारिक गहनता के बीचोंबीच सहज संवेदना की पगडंडी बना ले जाने में सूर्यबाला की कहानियां बेजोड़ हैं। जीवन के जटिल और बौद्धिक पक्षों को भी नितांत खिलंदड़े अंदाज में बयान करती उनकी कहानियां अपनी मार्मिकता पर भी आंच नहीं आने देतीं।
रंजना अरगडे (11-1-1957 दाहोद, गुजरात) कवि-लेखक-अनुवादक-शिक्षाविद् शिक्षा: एम.ए. पीएच.डी (हिंदी भाषा-साहित्य भवन, गुजरात विश्वविद्यालय के निदेशक के रूप में निवृत्त। सृजन-कविता, कहानी, आलोचना, अनुवाद, निबंध तथा ब्लॉग लेखन प्रकाशन-विभिन्न स्तरीय पत्र पत्रिकाओं में कविता, कहानी, समीक्षा तथा अनुवाद प्रकाशित। पुस्तकें-सम्पादन-शमशेर रचनावली (छः खंड) तथा अन्य पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य- बौद्ध विद्वान धर्मानंद कोसम्बी की आत्मकथा निवेदन का मराठी से हिंदी में अनुवाद, साखी प्रकाशन, बनारस विशेष- हिंदी, मराठी, अंग्रेजी तथा गुजराती में लेखन एवं अनुवाद संप्रति- स्वतंत्र लेखन
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