किसी भाषा का शैक्षणिक व्याकरण उस भाषा के सिद्धांतपरक वैज्ञानिक व्याकरण एवं पाठ्य पुस्तक केंद्रित विशिष्ट व्याकरण से रूप एवं क्षेत्र में भिन्न होता है। वास्तव में यह अध्येता उन्मुख और व्यवहार केंद्रित व्याकरण है, जिसका प्रयोजन अध्येता की संप्रेषण क्षमता को विकसित करना है। इसका उद्देश्य अध्येता को ऐसा विशिष्ट व्याकरण देना है, जो उसे विभिन्न भूमिकाओं के लिए तैयार कर सके तथा जिससे वह भाषायी व्यवहार के विभिन्न कौशलों के प्रशिक्षण द्वारा सामाजिक स्थितियों को नियंत्रित कर सके। यद्यपि शैक्षणिक व्याकरण विषय एवं अंतर्दृष्टि के लिए निश्चित रूप से वैज्ञानिक एवं विशिष्ट व्याकरण का आश्रय लेता है तथापि इसका अपना परिप्रेक्ष्य और अपनी विशिष्टताएँ हैं। यह भाषा शिक्षण के उद्देश्यों और प्रयोग की तकनीक द्वारा नियंत्रित होता है। इस संबंध में हमें सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह नहीं भूलना चाहिए कि शैक्षणिक व्याकरण शिक्षण पद्धति के अनेक साधनों में से एक है। इसीलिए इसका अनुस्तरण सदैव वैज्ञानिक व्याकरण के व्याकरणिक नियमों के अनुस्तरण के समरूप नहीं होता। इस बात पर बल देना भी आवश्यक है कि विशिष्ट शिक्षण पद्धतियाँ भाषा वैज्ञानिक व्याकरण के तथ्यों को एक विशिष्ट रूप देती हैं। इसके अतिरिक्त इसमें भाषा वैज्ञानिक तथ्यों एवं अंतर्दृष्टि के प्रस्तुतीकरण का अपना संदर्भ होता है, जो वैज्ञानिक व्याकरण में प्रयुक्त औपचारिक नियम प्रस्तुतीकरण तकनीक से भिन्न होता है।
द्वितीय या विदेशी भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण से संबद्ध सामग्री पर ध्यान देने से यह स्पष्ट हो जाता है कि शैक्षणिक व्याकरण संबंधी पुस्तक लिखने की एक लंबी परंपरा रही है। इन पुस्तकों में रूप एवं सामग्री की दृष्टि से पर्याप्त विभिन्नता है। अतः इन्हें विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत वर्गीकृत किया जा सकता है।
Hindu (हिंदू धर्म) (13782)
Tantra (तन्त्र) (1014)
Vedas (वेद) (731)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2112)
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