जीवन देवता को काव्यांजलि
ऐसा कोई भी भारतीय भाषा का कवि नहीं होगा, जिसने श्रीकृष्ण पर अपनी कलम नहीं चलायी होगी। श्रीकृष्ण के करीब पाँच हजार साल के बाद महात्मा गाँधीजी एक ऐसी ही विभूति पैदा हुई कि उनके जीवन और कार्य से प्रभावित हुए बिना दुनिया का कोई साहित्यकार शायद ही बचा हो ।
मेरी साहित्य में रुचि है। उसमें भी मेरी मातृभाषा गुजराती को छोड़कर मुझे ज्यादा पसंद हिन्दी भाषा है। मेरी अभिलाषा थी कि गुजराती और हिन्दी दोनों में गाँधीजी के बारे में जो काव्य लिखे गये हों उसमें से चुने हुए श्रेष्ठ काव्य का संचय प्रकाशित हो, इसलिए मैंने मेरे गुरुवर्य आदरणीय श्री अम्बाशंकरजी नागर को, जो हमारे गूजरात विद्यापीठ के भारतीय भाषा संस्कृति भवन के निदेशक है, उनसे प्रार्थना की तो आदरणीय नागरजी ने मेरा प्रस्ताव खूब प्रेम से स्वीकार किया। उसकी फलश्रुति-स्वरूप इस गाँधी काव्यायन की प्राप्ति हमें हुई है।
मेरी इच्छा पूरी हुई, इसलिए मैं आरणीय नागरजी का और शशिजी का बड़ा कृतज्ञ हूँ। उसे पढकर मेरी खुशी नहीं समाती ।
इस उम्र में भी, आदरणीय नागरजी को कितनी श्रद्धा गाँधीजी के लिए रही होगी, कि जिससे यह कठिन काम सम्पन्न हुआ। पाठक-भावक जब यह काव्यायन पढ़ेंगे तब उन्हें भी खुशी होगी कि इसमें कितनी सुन्दर कविताएँ हैं। हिन्दी के जाने-माने कवियों को गाँधीजी के जीवन का कोई न कोई पहलू झकझोर गया है, जो काव्य बनकर फूट पड़ा ।
वैसे तो गाँधीजी परंपरित अर्थ में कवि नहीं थे, अपितु उनका जीवन ही काव्य था। वह स्वयं ही एक घूमती फिरती कविता थे जो हर कवि को लुभाती थी। उनकी कलम से भी कई गद्य कविताएं सहसा निकल आई हैं ऐसा कई संशोधकों का मत है।
इस काव्यायन में जो कविताएँ हैं, उनमें जो काव्यत्व है, वह गाँधी-काव्यत्व है। गाँधीजी के भव्य जीवन और कार्य में कविता भरी हुई थी। उसका दर्शन कवि हृदय को कैसा कैसा स्पर्श करता है, उसकी मिसाल ये कविताएँ है। गाँधीजी का प्रत्येक किया-कलाप अनूठा था, अनोखा था, जिसमें से सरस काव्यतत्त्व का झरना बहता दिखता था। काव्य, हृदय और दृष्टि की लीला है। आम आदमी को जो स्थूल दिखता है, वही कवि को अलौकिक विस्मय की अनुभूति से भरा दिखता है।
कवि तो प्रभु का लाड़ला है। परमात्मा ने कवि को दिव्य दृष्टि दी है, जो हममें नहीं है। वह चर्मचक्षु से नहीं दिखता, दिव्य चक्षु से दिखता है। काव्य-सर्जन के क्षण में कवि सिर्फ कवि ही होता है। सर्जन समाप्त होते ही वह हमारी तरह धरातल पर उतर आता है।
गाँधी की खूबी यह थी कि वे प्रतिपल प्रभुपल समझ कर एक ही आसन पर अडोल रहते थे। रसज्ञ पाठकों को इस काव्य ग्रंथ में देखने को मिलेगा कि इसमें सिर्फ गाँधी का यशोगान ही नहीं है, किन्तु उनके भव्य जीवन और कार्य में कहीं किसी रूप में वैशिष्ठय था, जो कवि को झकझोरता है और उसे काव्य में अवतरित करने के लिए उसे बाध्य करता है।
कविवर रवि ठाकुर भी बापू के जीवन से बहुत प्रभावित थे। वे कहते थे कि यज्ञ को मनुष्य का रूप लेने की इच्छा हुई और वह गाँधी बनकर आया ।
गाँधी का जीवन सदा जलती यज्ञ की अग्निशिखा था, जो स्वयं जलकर औरों को आलोकित करता था, ऐसे थे वे जीवन देवता ।
ऐसा आलोक इन कविताओं में भरा पड़ा है। जो पढ़नेवाले को भी आलोकित करेगा-ऐसा मुझे विश्वास है। इस भव्य दिव्य कार्य को संपन्न करनेवाले आदरणीय नागरजी को मैं भावपूर्वक प्रणाम करता हूँ और शशिजी को भी अभिनंदन देता हूँ।
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