मातापिता स्वातंत्र्य सेनानी और पिताजी तथा बड़े भाई नवजीवन संस्था में ४० साल सेवक रहे और मैं भी विद्यापीठ में करीब ४० से अधिक साल से हूँ, इसी लिए स्वाभाविक रीति से गांधीविचार लहू में एकरस हो गया है।
सन् १९७४ में विद्यापीठ की 'गांधीविचार पारंगत' की उपाधि प्रथम वर्ग में प्राप्त करने के बाद उस समय के उस विभाग के अध्यक्ष मान. मु. श्री मगनभाई जो. पटेल ने मुझे उसी साल से 'गांधीविचार पारंगत' की कक्षाओं में एक प्रश्नपत्र का अध्यापन कार्य सौंपा, जिसका विषय था गांधीजी के प्रेरक, समकालीन और साथी। सालों तक इन सब पर अध्यापन कार्य किया। इसके परिपाक के रूप में यह प्रथम पुस्तिका है।
इसके लिए सबसे पहले मान. मगनभाई जो. पटेल का हृदयपूर्वक आभार प्रकट करता हूँ, क्योंकि उन्होंने यह विषय सौंपा, इसलिए इसके बारे में अधिक से अधिक मेरा पढ़ना-सोचना रहा। दूसरा आभार गूजरात विद्यापीठ के 'विद्यापीठ' सामयिक के अधिपति और संस्था के कुलनायक श्री रामलालभाई का मानता हूँ कि जिन्होंने 'विद्यापीठ' में इन सबके बारे में मेरे लेखों के रूप में छापा और अन्त में दो स्वतंत्र पुस्तिकाओं के रूप में विद्यापीठ प्रकाशित करेगा, ऐसा स्वीकार किया और निवेदन लिख दिया ।
पुस्तक की प्रस्तावना के लिए विश्व साहित्य के अभ्यस्त मान. यशवंतभाई शुक्ल से बिनती की। उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया और बहुत कम समय में लिखकर दी, जिसमें उन्होंने पाँचों प्रेरकों के बारे में बहुत संक्षेप में महत्त्वपूर्ण बातें प्रस्तुत की हैं, इसलिए उनका भी हृदयपूर्वक आभार प्रकट करता हूँ। गांधीजी ने हमेशा अपने आँख कान खुले रखकर जीवन जीया है। जहाँ कहीं से जो कुछ अच्छा मिला, उसका स्वीकार किया है, इसमें कभी देशी-परदेशी का भाव नहीं रहा है। सत्य हमेशा सनातन और देशकाल से परे होता है।
महात्माजी ने अनेकों से अनेक अच्छी चीजें ग्रहण की थीं। उनमें से सबसे अधिक उनके लिए प्रेरक ऐसे पाँच महानुभावों को चुनकर उनके जीवन और कार्य तथा उनके गांधीजी पर पडे प्रभाव पर लिखने का इस पुस्तिका में नम्र प्रयास है।
गांधी को भी प्रेरणा देनेवाले ये महापुरुष कितने महान थे, यह तो उनका अध्ययन करने पर पता चल सकता है। कुछ इस दृष्टि से विद्यार्थियों के मार्गदर्शन के लिए अध्यापन कार्य किया, जो यहाँ लेखों के रूप में प्रस्तुत है।
आज की नई पीढ़ी को तथा अनेकों को यह लाभप्रद होगा, ऐसा मानकर उसे पुस्तिका के रूप में प्रकाशित करते हुए आनन्द का अनुभव करता हूँ। आशा करता हूँ कि पाठकों को भी ऐसी ही तृप्ति का अनुभव होगा।
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