भूमिका
हिन्दू धर्म सत्य पर आधारित है और सतत् सत्य की खोज है। यह प्रत्येक काल में नूतनता लिये हुए भी सत्य और न्याय की कसौटी पर खरा उतरता है। यह बात ईसाइयत और इस्लाम में कभी नहीं हो सकती क्योंकि ईसाइयों की मान्यता है कि बाइबल ईश्वरीय पुस्तक है और हजरत ईसा ईश्वर का इकलौता पुत्र है, उधर मुसलमानों की मान्यता है कि कुरान ईश्वरीय पुस्तक है और हजरत मोहम्मद अन्तिम रसूल हैं, जबकि बाइबल और कुरान की कई बातें स्पष्ट न्याय तथा तथ्यों के विरुद्ध दिखाई देती हैं जिससे उनके प्रबुद्ध अनुयायियों के मनों में भी संदेह होना स्वाभाविक है। हिन्दुओं के सभी मतों के धर्माचार्य यदि समय-समय पर गोष्ठियों में तर्क का सहारा लेते हुए सौहार्दपूर्ण वातावरण में सत्य के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान कराते रहें और हिन्दुओं में वैदिक वर्ण-व्यवस्था के, जो जन्मना न होकर गुण-कर्म और स्वभाव पर आधारित है, क्रियान्वयन की दिशा में आवश्यक कदम उठाते रहें और इसका प्रचार भी जनसाधारण में करते रहें छुआछूत, जो विश्व हिन्दू परिषद् के कथनानुसार जघन्य पाप है, के अभिशाप से यदि हम हिन्दू मुक्त हो जायें और प्रत्येक हिन्दू घर वापसी में रुचि लेने लग जाये तो मैं अपने दीर्घ काल के अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि भारत में अगले 50 वर्षों में आधे और 150 वर्षों में लगभग सारे ईसाई और मुसलमान बन्धु, जिनके क्रमशः अठानबे दशमलव पन्द्रह और सौ प्रतिशत पूर्वज कभी हिन्दू थे और जो भय या लोभ के कारण अथवा हम हिन्दुओं में जाति-भेद और किसी अन्य परिस्थितिवश हमें छोड गये थे, पुनः हिन्दू धर्म में लौट सकते हैं। तब हिन्दू-मुसलमान साम्प्रदायिक दंगे और मंदिर, मस्जिद जैसी समस्याएँ भी कुछ वर्षों में समाप्त हो जायेंगी। घर वापसी केवल प्यार से अपने सद्व्यवहार से समझा-बुझाकर हिन्दू संस्कृति और राष्ट्रीय भावनाओं को जागृत करके किया जा सकता है। घृणा का इसमें कोई स्थान नहीं है। प्रत्येक हिन्दू अपने जीवनकाल में कम से कम पाँच ईसाई व मुसलमानों को आसानी से हिन्दू बना सकता है और जो अपने धर्म को छोड़ रहा हो उसे छोड़ने से रोक सकता है। इस कार्य को करने के लिए इस पुस्तक "घर वापसी - क्यों और कैसे में जितनी जानकारी दी गयी है उतनी भी घर वापसी करने वाले व्यक्ति के मूल ज्ञान के लिए पर्याप्त है। घर वापसी एक राष्ट्रीय कार्य है। मेरे लिए मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति द्वेष का तो प्रश्न ही नहीं उठता क्योंकि वे भारतीय हैं। हम से ही विछुड़े हैं मुझे उनसे प्यार है। हिन्दू धर्म में वापस आना देश और उनके अपने हित में है। यदि भारत में राज्य - सत्ता उपर्युक्त विचारों की पोषक हो, चाहे वह सत्ता किसी भी राजनीतिक पार्टी के हाथ में हो तो सारी दुनिया अगले 500 वर्ष में हिन्दू धर्म को अपना लेगी। परन्तु यदि हिन्दू का वैचारिक और समाजिक ढाँचा आज जैसा ही चलता रहा और भारत की राजसत्ता परिवार नियोजन को कानून, प्रोत्साहनों एवं निरुत्साहनों द्वारा, भारत में तमाम जातियों पर व्यापक रूप से लागू न कर सकी और 'कामन सिविल अधिसंख्य कोड' (समान नागरिक संहिता) न बना सकी आज भी 8.4 प्रतिशत मुसलमान बहु विवाह करते हैं तो हिन्दू अगले 50 वर्षों में भारत के तमाम राज्यों में राजनीतिक तौर पर अल्पमत हो जायेंगे, इस देश में 2151 ई. तक गली-गली में हिन्दुओं और मुसलमानों में गृह-युद्ध हो जायेगा। सारे भारत में फिर जल्दी ही हिन्दू अल्पमत हो जायेंगे और यहाँ इस्लामी राज्य स्थापित हो जायेगा। फिर विस्थापित हुए कश्मीरी बन्धुओं की भाँति भावी हिन्दू संतानें खून के आँसू बहा कर हमें कोसेंगी और कहेंगी कि हमारे पूर्वज बड़े ही मूर्ख व अदूरदर्शी थे, उन्होंने समयानुसार अपना सामाजिक रूढ़िवाद न छोड़ा, ईसाइयों, मुसलमानों को हिन्दू धर्म में दीक्षित नहीं किया, दुनिया में अपना एक मात्र सुनहरा महान् देश भारत खो डाला। और जो भय और किसी लौट सकते २. मस्जिद -बुझाकर कया जा दू अपने भासानी हो उसे स्तक श्री है लिए नों वे में फिर यहाँ पाकिस्तान की तरह कोई भी राम, कृष्ण व अन्य हिन्दू महापुरुषों का नामलेवा बाकी नहीं रहेगा। इस प्रकार हिन्दू धर्म अन्य मजहबों से उच्चतर होने के बावजूद भारत और सारी दुनिया से मिट जायेगा। यदि बाद में कभी हिन्दू धर्म की सत्यता संसार के सामने आयी भी तो विकृत रूप में ईसाई या इस्लाम का मुखौटा पहने हुए होगी। मेरे बड़े भाई लुभाया राम जी दिल्ली में सरकारी नौकरी में थे वे 1928 में पूज्य माता-पिता, भाइयों सहित सारे परिवार को दिल्ली ले आये। मैंने 1929-32 में आर्य समाज की ओर से शास्त्रार्थ चुनौती पोस्टर पढ़कर पंडित रामचन्द्र देहलवी इत्यादि से मुसलमानों एवं ईसाइयों के साथ कुछ शास्त्रार्थ सुने।
लेखक परिचय
श्री राजेश्वर जी का जन्म 25 फरवरी, 1916 को जलालपुर किकना, जिला झेलम (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। वह बाबा काली कमली वाले (ऋषिकेश) के वंश से ताल्लुक रखते थे, जो उनके दादा के बड़े भाई थे। 1928 में, उनका परिवार दिल्ली आ गया। 1936 में, उन्होंने हिंदू कॉलेज से विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त की और कॉलेज में प्रथम स्थान प्राप्त किया। अखिल भारतीय प्रतियोगिता में चौथा स्थान प्राप्त करने के बाद, उन्होंने सरकारी सेवा में प्रवेश किया। 1941 में उनका विवाह हुआ, और उनकी पत्नी श्रीमती चंद्रकांता ने उनके आदर्शों को अपनाया। 1946 में, उन्होंने सरकारी सेवा से इस्तीफा दे दिया और एडवर्ड केर्वेटर्स (प्राइवेट) लिमिटेड में महाप्रबंधक के रूप में शामिल हो गए। जब सेठ रामकृष्ण डालमिया ने इस कंपनी का अधिग्रहण किया, तो श्री राजेश्वर जी अपनी प्रशासनिक क्षमताओं और परिणामोन्मुख प्रदर्शन के कारण डालमिया समूह की 13 सार्वजनिक उपक्रमों और निजी सीमित कंपनियों के कार्यकारी निदेशक बने। सामाजिक वातावरण और कार्य श्री राजेश्वर जी आर्य समाज के प्रसिद्ध विद्वान पंडित रामचंद्र देहलवी और श्री बुद्ध देव विद्यालंकार (स्वामी समर्पणानंद) के विचारों से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने हिंदू धर्म के लिए काम करने का संकल्प लिया और परिवर्तित लोगों को उनके मूल धर्म में वापस लाने के लिए काम किया। वह विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ जुड़े और इसके अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। उन्होंने परिवर्तित हिंदुओं को वापस हिंदू धर्म में लाने के लिए एक अभियान चलाया और इस कार्य में सफलता प्राप्त की। उन्होंने 1972 से 1993 तक इंद्रप्रस्थ विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया और 1971 से अपनी मृत्यु तक वीएचपी के ट्रस्टी के रूप में कार्य किया। वह 1981 से दक्षिण दिल्ली इकाई के आरएसएस विभाग संघचालक भी थे। उन्होंने 1991 में अपनी संपत्ति से चंद्रकांता राजेश्वर धर्मार्थ ट्रस्ट की स्थापना की, ताकि उनकी मृत्यु के बाद भी उनका लक्ष्य जारी रह सके। 11 फरवरी, 1999 को उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली।
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