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गोंड आदिवासी लोक और चित्रकला: Gond Adivasi Lok aur Chitrakala

$26
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Specifications
Publisher: LITTLE BIRD PUBLICATIONS, DELHI
Author Kusumlata Singh
Language: Hindi
Pages: 115
Cover: PAPERBACK
8.5x5.5 Inch
Weight 180 gm
Edition: 2026
ISBN: 9789363060050
HCL063
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Book Description
भूमिका

अतीत से वर्तमान तक गोंड कला की सृजनशील पगडंडी पर चलते हुए जीवन में कोई भी अनुभव अर्थहीन नहीं होता और छोटी-से-छोटी घटना भी नियति का प्रकटीकरण है। यह बात मैं इसलिए कह रही हूँ कि मेरी लोक कलाओं में शुरू से रुचि रही है। संयोग बना कि मेरा आदिवासी क्षेत्र बस्तर में जाना हुआ और वहाँ जनजातीय कलाकृतियों को निकट से देखा और आदिवासी कलाकारों की सृजनात्मक शक्ति और योग्यता को जानने का मौका मिला। अब सोचती हूँ तो लगता है कि इस पुस्तक की पूर्वपीठिका नियति ने वहीं से तय कर दी थी। बस्तर से लौटने के साथ ही मेरे मन में जनजातीय चेतना पर केंद्रित एक पत्रिका के प्रकाशन की योजना आकार लेने लगी और कुछ महीनों बाद दिल्ली से 'ककसाड़' मासिक पत्रिका जो जनजातीय चेतना, संस्कृति, कला और साहित्य विषय पर थी, उसका प्रकाशन शुरू किया। उसमें एक स्तंभ जनजातीय कलाकारों की कला से जुड़े विषय पर बातचीत के लिए मैंने निर्धारित किया। इसी सिलसिले में मैं जनजातीय चित्रकारों के संपर्क में आई। उन दिनों सन 2013 के आसपास जनजातीय चित्रकला संग्रहालयों, यदाकदा बड़े पाँच सितारा होटलों की दीवाल पर या व्यावसायिक संस्थानों में भले ही मिल जाए पर उतनी लोकप्रिय नहीं थी जितनी आज फैशन में आ गई है। तब तक यह समझ में आ गया था कि यदि मुझे आदिवासी कला की बारीकियों को समझना है तो कलाकारों के बीच जाना चाहिए। मैं भोपाल रह चुकी थी और यह अंदाजा था कि भारत-भवन में जनजातीय कलाओं को प्रदर्शित किया जाता है तो वहाँ मुलाकात हो सकती है अतः कलाकारों से मिलने के लिए, उनके काम करने की शैली देखने के लिए वहाँ गई। और वहाँ सफलता मिली। कई लोगों से मुलाकात हुई बातचीत हुई। फिर समय-समय दूसरे क्षेत्रों की यात्रा की जहाँ चित्रकारों के बीच बैठकर बात की जा सकती थी। वस यहीं से हम व्यक्तिगत रूप चित्रकारों से जुड़ते गए। उनसे बात की। कई बार की गई बातचीत ककसाड़ में साक्षात्कार के स्तंभ में प्रकाशित हुई। कुछ दूसरी पत्रिकाओं में छपी और कुछ मेरी डायरी में रहीं जिनका जिक्र मैंने इस पुस्तक में किया है। यह भी सुखद संयोग रहा कि शुरू-शुरू में मुझे अधिकतर गोंड चित्रकार मिले। दूसरे आदिवासी समुदाय के चित्रकारों से भी मुलाकात होती रही। इन सबमें एक बात समान थी कि वे अपने चित्रों के बारे में बताते हुए बहुत संकोच करते और कम बोलते थे। उनसे जब मैं पूछती कि आप की रुचि इस कला में कैसे है तो उनका रटा-रटाया उत्तर होता कि यह तो हमारे संस्कार में हैं। जहाँ हम जन्म लेते हैं वह धरती और आकाश हमारे लिए इसलिए महत्वपूर्ण होता है कि हमारे संस्कार वहीं से बनते हैं और वही संस्कार संस्कृति का निर्माण करते हैं। जिन परम्पराओं और आस्थाओं में बचपन बीतता है वह परम्परा और आस्था का प्रभाव हमारे भीतर पूरी तरह घुल-मिल जाता है। इसीलिए मनुष्य संस्कृति की निर्माता है और उसका सजग संवाहक भी है। यह भी सच है कि संस्कृति और सभ्यता दोनों में समय सापेक्ष बदलाव आते हैं। संस्कृति का मूल उद्देश्य मनुष्य के आंतरिक गुणों का विकास करना है। विभिन्न संस्कारों के द्वारा उसकी प्रतिभा और योग्यता को उजागर करना है। इसी में पल्लवित होती है लोक संस्कृति । लोक का अभिप्राय सर्वसाधारण जनता से है, जिसकी व्यक्तिगत पहचान न होकर सामुहिक पहचान है। किसी भी समाज का अतीत बहुत महत्वपूर्ण होता है और उसी से जुड़ी होती है लोक संस्कृति। लोक में वह सब कुछ है जो मनुष्य के अंदर है और बाहर है। मनुष्य अंदर की वस्तु को बाहर लोक में निरूपित करता है और उसे संस्कार और संस्कृति से संबोधित करता है। मिट्टी, पत्थर, गुफा-कंदरा आदि में उकेरे विभिन्न शिल्प जातीय रूपाकार मनुष्य के लोक संस्कार और ऐतिहासिक संस्कृति के सबूत ही तो है। लोक संस्कार की यही मूल प्रवृत्ति हमारी जनजातीय चित्रकलाओं में मिलती है। कला कोई भी हो वह हमेशा से ही मानवीय रुचि का विषय रही है, कला की दुनिया विश्वास और आस्था की दुनिया मानी जाती है जो हमारे कलाकारों के तप और साधना से खड़ी होती है। यह कलाएं ही हैं जो सारे देश को एक सूत्र में नाथकर उसकी संस्कृति और सभ्यता को एकरूपता देती हैं। यह सर्वकालिक सत्य है कि कला-साधना के लिए प्रकृति को समझना पड़ता है उसकी गहराई में उतरना पड़ता है। प्रकृति के साथ एकात्मबोध का अनुभव करना होता है और यही बीज हमें जनजातीय चित्रकला में मिलता है। यह इसलिए भी है कि आदिवासियों के विचार, जीवन के ध्येय और मूल्यों का ढांचा सरल है। आदिवासी समाज अपनी सामाजिक संरचना में भी बाकी गैर आदिवासी समाजों से बहुत भिन्न है। आदिवासी संस्कृति, सोच और दृष्टि, गैर आदिवासी समाज की व्यक्तिवादी, सामंती, साम्राज्यवादी व कहीं राजतंत्रवादी सोच व दृष्टि के एकदम विपरीत है। वे व्यक्तिपरक नहीं, सामुहिक सोच, सामुहिक जीवन-शैली, सामुहिक जिंदगी जीते हैं। यह समाज लोकतंत्र का पोषक है। इनके पास पूरी की पूरी प्रकृति का असीम आयाम और उनके पूर्वजों की पूरी कतार है। वही इनकी आस्था है और शक्ति है। जो इनकी कल्पना में इनकी कलाकृतियों में विभिन्न रूपों में दिखाई देती हैं। इस पुस्तक में जिन कलाकारों से बातचीत की गई है वह उनके जीवन संघर्ष, उनके पूर्वजों के इतिहास, जीवन शैली के विस्तार को समेटे हुए है। गौर से देखने पर इनके चित्रों में जटिल से जटिल अनुभतियाँ भी सहजतापूर्वक अभिव्यक्त हो जाती हैं। अतीत से वर्तमान तक गोंड आदिवासी कला की सृजनशील पगडंडी पर चलते हुए यहाँ आदिवासी कला क्या है? उसका प्रयोजन क्या है? उसपर बात करती हूँ। सभी कलाएं संस्कृति और संस्कारों की संवाहक होती हैं।

लेखक परिचय

कुसुमलता सिंह की नवीनतम पुस्तक 'गोंड आदिवासी लोक और चित्रकला' महज ड्राइंगरूम में बैठ कर लिखा गया कलावादी आख्यान नहीं है वरनू लेखिका के लम्बे अध्ययन और आदिवासी जनजातियों की पारम्परिक कलाओं का विस्तृत आकलन करने का परिणाम है। पच्चीस गोंड कलाकारों से प्रत्यक्ष संवाद में कुसुमलता सिंह की रचनात्मक तैयारी, जिज्ञासा और सराहना का कदम-कदम पर परिचय मिलता है। लेखिका अपने शोध में यह तथ्य तनिक नहीं भूलती कि सबसे पहले महान चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन ने गोंड कला के विकास पर ध्यान दिया। उन्होंने युवा जनगढ़ सिंह श्याम को मिट्टी की दीवार पर चित्रकारी करते देखा और उसके चित्रों से प्रभावित हो उसे अपने साथ घर ले आए। गोंड समुदाय में अपनी लोक कला के लिए रचनात्मक गौरव जगदीश स्वामीनाथन ने जगाया और इससे एक सुप्त-लुप्त पड़ी हुई कला-परम्परा की आँख खुली। पुस्तक में सुनियोजित आठ अध्याय हैं जिनमें छठां विशेष रूप से आकर्षक है। सुंदर चित्रों से सुसज्जित यह अध्याय गोंड कलाकारों के सोच, संघर्ष, तैयारी और तन्मयता का दस्तावेज़ है। जनजातीय कलाओं को आप यों ही खारिज नहीं कर सकते। उनके द्वारा खींची गई हर बिन्दु व रेखा का सांस्कृतिक महत्व है। मानसिंह व्याम की कही यह बात ध्यान देने योग्य है, कि गोंड पेंटिंग में आँखें हमेशा बाद में बनाई जाती हैं, क्योंकि आँखें बनाने के बाद कलाकृतियाँ जिन्दा हो जाती हैं। प्रत्येक वार्तालाप में चित्रकार की सादगी और विनम्रता, भोलापन और मौलिकता पढ़ने से ताल्लुक रखती है। बहुत से आदिवासी कलाकारों पर जनगढ़ सिंह श्याम का जबर्दस्त प्रभाव दिखाई पड़ता है हालाँकि जनगढ़ श्याम को बहुत कम आयु मिली। ये सभी कलाकार बाज़ार के समीकरण व अतिक्रमण को समझने लायक चतुर नहीं हैं। वे प्रकृति के उपासक हैं और उनमें अपूर्व धैर्य है। कई कलाकारों पर कला संस्थानों की दृष्टि गई है और वे ख्याति पा सके हैं किन्तु लेखिका की उचित चिंता है कि विकास की अंधी दौड़ में हम जिस तरह जल, जंगल और जमीन की अवहेलना कर रहे हैं, हमारी पारम्परिक कलाएं कितनी सुरक्षित रह पायेंगी। इस अत्यंत उपयोगी और महत्वपूर्ण शोध-ग्रंथ के लिए कुसुमलता सिंह बधाई की पात्र हैं।

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