गूजरात विद्यापीठ के भारतीय भाषा संस्कृति केन्द्र के उर्दू विभाग की ओर से बजाज भवन में दिनांक २७ अगस्त १९९७ को एक मुशायरे का आयोजन किया गया था, जिसमें अहमदाबाद के १० शायर आमंत्रित थे। उस मुशायरे में मुझे शुरू से आखिर तक उपस्थित रहने का अवसर मिला था। मैंने देखा कि बड़ी संख्या में उपस्थित लोगों ने शायरों की ग़ज़लों को तल्लीन होकर सुना और सराहा।
मुशायरे के बाद यह विचार आया कि अगर ये शायर इजाज़त दें तो इनकी चुनी हुई दस-दस गजलों को नागरी और उर्दू दोनों लिपियों में विद्यापीठ की ओर से प्रकाशित किया जा सकता है। ऐसा करने से एक साथ हिन्दी और उर्दू की सेवा तो होगी ही, महात्माजी की 'हिन्दुस्तानी' भाषा नीति का भी अमल होगा।
मझे यह देखकर खुशी हो रही है कि 'महात्मा गाँधी हिंदुस्तानी चेयर' के प्रोफेसर और 'भारतीय भाषा संस्कृति केन्द्र' के नियामक डॉ. अम्बाशंकर नागर और उर्दू केन्द्र के अध्यापक जनाब रहमत अमरोहवी जी के संयुक्त प्रयास से अहमदाबाद के उर्दू शायरों का यह गजल संग्रह अब दोनों लिपियों में प्रकाशित हो रहा है।
कहा जाता है कि गुजरात की भूमि पर ही उर्दू को प्रारंभ में साहित्यिक स्वरूप प्राप्त हुआ था। उर्दू शायरी के बाबा आदम वली अहमदाबाद के थे। उनकी मज़ार भी अहमदाबाद में है। अगर यह सही है, तो गुजरात और अहमदाबाद के लिए बड़े फरत्र की बात है। इस संग्रह से उर्दू के अदीबों को यह पता चलेगा कि तब से लेकर अब तक गुजराती-भाषी गुजरात में खासकर अहमदाबाद में उर्दू शायरी ने क्या और कितनी प्रगति की है।
राज़ल एक लोकप्रिय काव्य प्रकार है, इस लिए मुझे विश्वास है, हिन्दी-उर्दू के पाठक इस संकलन का स्वागत करेंगे।
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